शालिनी ने भारी कदमों से चलकर पंखे का रेगुलेटर पांच पर घुमाया, मगर गर्म हवा की थपेड़ों ने माथे पर उभरे पसीने की बूंदों को और बिखेर दिया। उसका सातवां महीना चल रहा था। पैरों की सूजन इतनी बढ़ चुकी थी कि चप्पलें भी तंग लगने लगी थीं और सांस लेने के लिए भी उसे हर चंद मिनट में गहरा दम खींचना पड़ता था। उसने सूती, ढीला-ढाला कुर्ता पहन रखा था, बाल जूड़े में लापरवाही से बंधे थे और चेहरे पर किसी भी सौंदर्य प्रसाधन की जगह केवल थकान की लकीरें थीं।
शाम के करीब सात बजे जब मुख्य दरवाज़ा खुला, तो अनिकेत हाथ में ब्रीफकेस लिए भीतर दाखिल हुआ। एयर-कंडीशनर वाले दफ़्तर से लौटने के बावजूद उसके माथे पर खीझ साफ़ देखी जा सकती थी। उसने जूते उतारकर कोने में पटके और जैसे ही उसकी नज़र शालिनी पर पड़ी, उसकी त्योरियां चढ़ गईं।
“यह क्या हुलिया बना रखा है तुमने शालिनी? घर में घुसते ही ऐसा लगता है जैसे किसी मरीज़ के कमरे में आ गया हूँ। वो पुराने, बेतरतीब कपड़े, बिखरे बाल, चेहरे पर न कोई चमक, न सलीका। अभी हमारी शादी को मुश्किल से डेढ़ साल हुआ है और तुम पैंतालीस साल की अधेड़ औरत जैसी दिखने लगी हो। कोई दोस्त घर आ जाए तो मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है।” अनिकेत ने सोफे पर पसरते हुए बिना सोचे-समझे तीखे शब्दों के तीर चला दिए।
शालिनी के हाथ में पानी का गिलास था, जो उसने अनिकेत की तरफ बढ़ाया था। उन कड़वे बोलों ने उसके सीने में खंजर की तरह चुभन पैदा की। उसने गहरी सांस ली और अपने कांपते हाथों को थामा। “अनिकेत, इस तपती गर्मी में मेरे गर्भ में तुम्हारा बच्चा पल रहा है। मेरा शरीर अंदर से एक नई ज़िंदगी को गढ़ रहा है। रोज़ उल्टियां, कमर का असहनीय दर्द और ये ढीले कपड़े मेरी मजबूरी हैं, शौक नहीं। ऐसे नाज़ुक वक्त में तुम्हें मेरा सहारा बनना चाहिए था, पर तुम मेरे कपड़ों और चेहरे पर तंज कस रहे हो?”
“अरे, तो दुनिया में क्या तुम पहली औरत हो जो मां बन रही हो?” अनिकेत ने तुनककर कहा। “दफ़्तर में मिसेज वर्मा को देखो, प्रेग्नेंसी के आखिरी महीने तक कैसे सज-संवर कर, सलीके की साड़ियों में आती थीं। थोड़ा खुद का ध्यान रखना कोई गुनाह नहीं होता। पर तुम्हें तो बस ढीले चोगे पहनकर सोफे पर पड़े रहने का बहाना चाहिए।”
इतना कहकर अनिकेत हाथ-मुंह धोने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ गया, मगर उसके शब्द कमरे की हवा में ज़हर घोल गए। शालिनी चुपचाप खड़ी रही। उसकी आंखों से दो बूंद आंसू ढुलककर गालों पर बह निकले। उसने अपने पेट पर धीरे से हाथ फेरा। एक औरत जब अपनी कोख में किसी पुरुष के वंश को सींचती है, तो वह अपने शरीर का कण-कण, अपना रूप-रंग और अपनी नींद तक न्योछावर कर देती है। मगर समाज और कई बार खुद पति भी उस बदलाव को समझने के बजाय केवल बाहरी आकर्षण ढूंढते हैं। क्या मां बनने का मूल्य केवल एक खिलौने की तरह सजे-धजे रहने में है? शालिनी ने मन ही मन तय कर लिया कि अब आंसुओं से बात नहीं बनेगी। अनिकेत को सबक सिखाना ही होगा, ताकि वह उस दर्द और जिम्मेदारी को सिर्फ़ लफ़्ज़ों से नहीं, बल्कि अहसास से समझ सके।
अगली सुबह जब चाय की मेज़ सजी, तो शालिनी के चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी। अनिकेत अख़बार पलट रहा था। शालिनी ने प्याली उसके आगे रखते हुए बेहद सहज आवाज़ में कहा, “अनिकेत, कल रात मैंने तुम्हारी हर बात पर ठंडे दिमाग से सोचा। तुम बिल्कुल ठीक कह रहे थे। मुझे भी सुंदर, चुस्त-दुरुस्त और सलीके से रहना चाहिए।”
अनिकेत ने चौंककर अख़बार नीचे किया। उसके चेहरे पर विजय का भाव तैर गया। “देखा! मैं तो तुम्हारी भलाई के लिए ही कह रहा था। आख़िरकार तुम्हें मेरी बात समझ आ ही गई।”
“हाँ, बिल्कुल आ गई,” शालिनी बोली, “लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है।”
“शर्त? कैसी शर्त?” अनिकेत हँसते हुए बोला, “तुम खूबसूरत दिखोगी तो मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर होगी। बोलो क्या चाहती हो?”
“आज रविवार है, तुम्हारा दफ़्तर बंद है। मैं पूरे दिन वैसे ही रहूंगी जैसे तुम चाहते हो—खूबसूरत सिल्क की चुस्त ड्रेस पहनूंगी, हल्का मेकअप करूंगी और बालों को संवार कर रखूंगी। लेकिन इसके बदले तुम्हें सिर्फ़ बारह घंटे के लिए मेरे जैसा बनना होगा।”
अनिकेत की भौंहें सिकुड़ीं, “तुम्हारे जैसा मतलब? मैं कैसे बन सकता हूँ?”
शालिनी भीतर कमरे में गई और भारी सामान उठाने वाली एक पुरानी बेल्ट और करीब पांच किलो वजन वाला पानी से भरा थैला लेकर लौटी। उसने बड़े सलीके से उस थैले को एक कपड़े में लपेटा और अनिकेत के सामने रख दिया। “यह थैला ठीक पांच किलो का है, जितना वज़न इस वक्त मेरे पेट और बच्चे का मिलाकर मेरे शरीर पर पड़ रहा है। तुम्हें इसे अपने पेट पर मजबूती से बांधना होगा और आज सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक इसे बिना उतारे घर के सारे सामान्य काम करने होंगे। अगर तुमने बिना शिकायत के यह कर लिया, तो मैं वादा करती हूँ कि बच्चे के जन्म तक रोज़ तुम्हारी पसंद के मुताबिक सज-संवर कर रहूंगी।”
अनिकेत ठहाका मारकर हंसा, “बस इतनी सी बात? पांच किलो वज़न तो मैं जिम में उंगलियों पर उठा लेता हूँ। यह तो बच्चों का खेल है। बांधो इसे!”
शालिनी ने दुपट्टे और बेल्ट की मदद से उस भारी थैले को अनिकेत के पेट पर कसकर बांध दिया। शुरुआत में अनिकेत सीना ताने मुस्कुराता रहा। उसने कहा, “देखा, कुछ भी तो नहीं हुआ। अब तुम जाओ और तैयार हो जाओ।”
शालिनी मुस्कुराई और कमरे में जाकर तैयार होने लगी। इधर अनिकेत ने सोचा कि वह टीवी देखते हुए रविवार का आनंद लेगा। वह जैसे ही सोफे पर बैठने लगा, पेट पर बंधे भारी थैले ने उसकी पसलियों पर दबाव डाला। उसे झटके से बैठना पड़ा। बैठने के बाद उसकी पीठ में अजीब सी ऐंठन महसूस हुई। जब उसने पैर सीधे करने चाहे, तो पेट के उभार ने उसकी जांघों को दबा दिया।
घड़ी में अभी सुबह के दस ही बजे थे। अनिकेत को प्यास लगी। वह पानी लेने के लिए किचन की तरफ बढ़ा, लेकिन उठते ही उसके घुटनों पर अप्रत्याशित ज़ोर पड़ा। उसके मुंह से अनायास ही ‘उफ़’ निकल गया। पानी पीते वक्त उसका हाथ फिसला और गिलास का ढक्कन फर्श पर गिर गया। अनिकेत ढक्कन उठाने के लिए नीचे झुका, पर जैसे ही वह झुका, पेट पर बंधे थैले ने उसके फेफड़ों की हवा रोक दी। उसका दम घुटने लगा। वह झुक नहीं पाया। घुटने मोड़कर बैठने की कोशिश में उसका संतुलन बिगड़ा और वह दीवार का सहारा लेकर बमुश्किल खड़ा हुआ। माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगी थीं।
शालिनी कमरे से बाहर आई। उसने एक खूबसूरत, चुस्त कुर्ती पहन रखी थी, चेहरे पर हल्का फाउंडेशन और लिपस्टिक थी, और बाल खुले थे। वह बेहद सुंदर लग रही थी, लेकिन चेहरे पर पसीना साफ दिख रहा था क्योंकि उस चुस्त कपड़े में उसकी सांस फूल रही थी।
“अनिकेत, ज़रा बाज़ार से ताज़ी सब्ज़ियां और दूध ले आओगे?” शालिनी ने सामान्य स्वर में कहा।
अनिकेत ने खीझते हुए कहा, “इस हालत में कैसे जाऊं? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे?”
“क्यों, क्या हुआ? मैंने तो तुमसे बाहर जाने को भी नहीं कहा, तुम बस गाड़ी की चाबी लो और नीचे की दुकान से ले आओ। क्या एक होने वाले पिता को इतनी सी जिम्मेदारी में शर्म आ रही है?” शालिनी ने चुटकी ली।
अनिकेत ने जैसे-तैसे घर के भीतर ही टहलना शुरू किया। दोपहर के बारह बजते-बजते सूरज सिर पर चढ़ आया। कमरे का तापमान बढ़ने लगा। अनिकेत के पेट पर बंधा वह थैला अब किसी भारी चट्टान की तरह महसूस हो रहा था। उसकी रीढ़ की हड्डी में लगातार एक मीठा-मीठा दर्द सुलगने लगा था। उसे बार-बार पेशाब की हाज़त महसूस हो रही थी, क्योंकि पेट के निचले हिस्से पर लगातार दबाव था। वह हर दस मिनट में वॉशरूम की तरफ भागता और उठने-बैठने की जद्दोजहद में उसकी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगतीं।
“शालिनी, यह पंखा तेज़ करो! इतनी घुटन क्यों हो रही है?” अनिकेत चिल्लाया। उसकी टी-शर्ट पसीने से तरबतर हो चुकी थी।
शालिनी ने शांति से कहा, “पंखा तो पूरे पांच पर है अनिकेत। जब शरीर के भीतर हार्मोन्स बदलते हैं और दिल को दो जानों के लिए खून पंप करना पड़ता है, तो ऐसी ही गर्मी लगती है। तुम्हें तो सिर्फ़ बाहर से वज़न बंधा है, सोचो जो यह सब अपनी अंतड़ियों के बीच चौबीसों घंटे झेल रहा हो, उसका क्या हाल होता होगा?”
दोपहर के खाने के बाद अनिकेत बिस्तर पर लेटना चाहता था। वह सीधा लेटा, तो भारी वज़न ने उसकी छाती को दबा दिया, जिससे उसे लगा कि उसका दम निकल जाएगा। उसने करवट लेनी चाही, तो पेट का थैला खिसककर एक तरफ झूल गया और कमर में असहनीय खिंचाव हुआ। वह न सीधा लेट पा रहा था, न उल्टा और न ही करवट ले पा रहा था। वह बिस्तर पर तड़पने लगा। उसकी आंखों में बेबसी के आंसू छलक आए। अभी सिर्फ़ शाम के चार बजे थे। बारह घंटे पूरे होने में अभी पांच घंटे बाकी थे।
शालिनी कमरे में आई। उसने अनिकेत की हालत देखी। अनिकेत हांफ रहा था, बाल अस्त-व्यस्त थे, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और वह पूरी तरह बेदम नज़र आ रहा था।
अनिकेत ने कांपते हाथों से उस बेल्ट की गांठ खोलने की कोशिश की, मगर शालिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया। “क्या हुआ अनिकेत? अभी तो सिर्फ़ सात घंटे हुए हैं। अभी तो पांच घंटे बाकी हैं। तुमने तो कहा था कि यह बच्चों का खेल है। और यह तो सिर्फ़ पांच किलो का बेजान थैला है, जो न तो रात को लातें मारता है, न ही तुम्हारी नसों को खींचता है। जब एक दिन का कृत्रिम भार तुम नहीं संभाल पा रहे, तो तुम उस औरत से सजे-धजे रहने की उम्मीद कैसे कर सकते हो जो नौ महीने तक अपनी हड्डियां गलाकर तुम्हारी औलाद को जन्म देने की तैयारी कर रही है?”
शालिनी के शब्द किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक कड़वे सत्य की तरह अनिकेत के ज़मीर पर चोट कर रहे थे। अनिकेत की आंखें भर आईं। उसने हाथ जोड़ लिए।
“बस करो शालिनी… मुझे माफ़ कर दो,” अनिकेत की आवाज़ भर्रा गई। “मैं हार गया। मुझसे यह बोझ एक पल के लिए भी और नहीं सहा जाता। मेरी कमर टूट रही है, मेरी सांस अटक रही है। मुझे समझ आ गया कि मैं कितना स्वार्थी और संवेदनहीन था।”
शालिनी ने धीरे से आगे बढ़कर उस बेल्ट की गांठ खोल दी और भारी थैला ज़मीन पर रख दिया। जैसे ही वह बोझ हटा, अनिकेत ने राहत की एक लंबी सांस ली, मगर उसका दिल अपराधबोध के भारी बोझ से दब चुका था। वह बिस्तर से उठा और शालिनी के सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसने शालिनी के सूजे हुए पैरों को अपने हाथों में थाम लिया।
“मुझे माफ़ कर दो शालिनी। मैं पुरुष होने के अहंकार में यह भूल ही गया था कि एक बच्चे को इस दुनिया में लाना कितना बड़ा बलिदान मांगता है। तुम हर पल एक तपस्या से गुज़र रही हो, और मैं तुम्हारे कपड़ों और चेहरे के रंग-रूप पर नुक्ताचीनी कर रहा था। मुझे सच में नहीं पता था कि मां बनने की कीमत इतनी भारी होती है। तुम जैसी हो, जिस हाल में हो, सबसे सुंदर हो। तुम्हें किसी बनावटी श्रृंगार की ज़रूरत नहीं है।” अनिकेत की आंखों से पश्चाताप के आंसू शालिनी के पैरों पर गिर पड़े।
शालिनी की आंखें भी नम हो गईं, लेकिन इस बार उन आंसुओं में दर्द नहीं, बल्कि एक सुकून था। उसने अनिकेत के कंधे पर हाथ रखकर उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
उस दिन के बाद घर की आबोहवा पूरी तरह बदल गई। अनिकेत अब दफ़्तर से लौटकर शालिनी के रूप पर टिप्पणी नहीं करता था, बल्कि उसके पैरों में तेल की मालिश करता, उसके लिए नारियल पानी लाता और डॉक्टर की हर सलाह का खुद ध्यान रखता। उसने समझ लिया था कि मातृत्व केवल एक स्त्री का कर्तव्य नहीं, बल्कि दोनों की साझी यात्रा है, जिसमें सम्मान और सहानुभूति ही सबसे बड़ा श्रृंगार है।
एक स्त्री जब सृष्टि का सृजन करती है, तो वह अपने अस्तित्व की आहुति देती है। क्या ऐसे समय में एक पति का फर्ज सिर्फ़ कमियां निकालना है या उसकी ढाल बनकर हर दर्द को बांटना? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी सोच से ज़रूर अवगत कराएं।
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल