बहू की समझदारी – अरुणा गर्ग

सुनैना का तीन महीने पहले ही विवाह हुआ था।वह एक सामान्य किन्तु खुली विचारों वाले परिवार की बेटी थी। उसने अपने मायके में अपनी मां को हमेशा परिवार में रहकर भी अपनी अलग पहचान बनाते देखा। वहीं पिता भी बहू बेटी को समान मानते।वह उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।

वह अपने ससुराल में भी सबके साथ मिलकर रहना चाहती थी।ससुर जी को दवाई देने से ख़ान पान तक का ध्यान मां जी ही रखतीं पर अक्सर खुद की दवा भूल जातीं उन्हें उच्च रक्तचाप और पैर दर्द की बहुत समस्या थी। सुनैना के पति दिन में अपनी दुकान पर रहते। उसने एक दिन मां जी से कहा आप अपनी तबीयत पर भी ध्यान दें।

पापा की दवा आदि में संभाल लिया करूंगी।वे पहले तो नहीं मानी पर फिर हां कर दी।अब वह ससुर जी को समय पर दवा देने के साथ सुबह सैर पर भी ले जाने लगी। मां जी बोली बहू यहां पुराने लोग  रहते हैं।तू सीमा में रहे तो अच्छा।वह बोली आप भी चलिए फिर तो ठीक है।सुबह की ताज़ा हवा में सैर करने से दोनों को काफी लाभ हुआ।

अब सुनैना ने दोनों के परहेज, दवा का ध्यान रखना शुरू किया। कुछ दिन के लिए बेटी पीहू आई तो अपने मम्मी पापा को पहले से बेहतर पाया।सब बैठे थे। मां आप पहले से अच्छी दिख रही हैं। पापा भी। मां बोलीं ये तेरी भाभी है ना मानती ही नहीं सुबह सैर पर ले जाती है।हमें फीका खाना देती है।

दवा लेकर सिर पर खड़ी रहती है। पर एक बात बोलूं बहुत सुंदर संस्कार हैं इसके जो हमारी डांट खाकर भी हमारा ध्यान रखती है। पीहू बहुत खुश हुई।ये तो बहुत अच्छी बात है मां। आपकी #बहू की समझदारी से आप दोनों स्वस्थ होने लगे हो।

पहले मुझे वहां आप दोनों की चिंता रहती थी क्योंकि आप दोनों भैया की तो सुनते नहीं थे,तला भुना खाना, दवा में लापरवाही से सेहत बिगड़ी हुई थी।अब कितने फिट लग रहे हो। मां सोच कहूं भगवान ऐसी बहू सबको दे।इतने में सुनैना रसोई से चाय पकौड़े और मीठा लेकर आती है। ससुर जी हाथ बढ़ाने में हिचकते हैं तो वह कहती हैं आप खा सकते हैं पापा क्योंकि ये एयरफरायर में बने हैं बस मीठा थोड़ा सा लेना।

देखा पीहू ये कैसा रोब जमाती है।मजाक में मां ने कहा।पिहू सुनैना को गले लगा कर बोली ऐसी रोब चलाने वाली भाभी मुझे बहुत अच्छी लगी मां।

अरुणा गर्ग 

# बहू की समझदारी

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