एक बहू की समझदारी – निभा राजीव “निर्वी”

सौम्या ने फोन पर नर्म स्वर में अपनी ननद वर्षा को समझाने का प्रयास कर रही थी,”- देखो वर्षा, पति-पत्नी में तो ऐसे छोटे-छोटे नोक झोक होते ही रहते हैं लेकिन बात को इतना बढ़ाना नहीं चाहिए। शांति दिमाग से चीजों को सोचो समझो और उन्हें सुलझाने का प्रयास करो।

उसकी बात पर उधर से वर्षा का चिढ़े हुए स्वर में उत्तर आया, “- ओफ्फो भाभी, आपसे तो बात करना ही बेकार है। आप माँ को फोन दो।”

हार कर सौम्या ने फोन ले जाकर अपनी सासू मां निर्मला जी के हाथों में पकड़ा दिया। उनके हेलो बोलते ही उधर से वर्षा का भर्राया हुआ स्वर फूट पड़ा, “-मां तुमने मुझे यह कौन से घर में भेज दिया है। सौरभ के मां-बाप तो जैसे हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए हैं। यह मत करो, वह मत करो, ऐसे करो, वैसे करो और सौरभ तो जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते हैं। मैं कुछ भी कहूं तो उल्टा यही कहने लगते हैं कि मां पापा तुम्हारे अच्छे के लिए ही तुम्हें समझ रहे हैं। मेरा तो दम घुटने लगा है इस घर में।”

         उसकी बात सुनते ही निर्मला जी ने धीमे स्वर में समझाना शुरू कर दिया, “-अरे इतना दब कर रहने से नहीं होता है बेटी, तू अपनी मर्जी से जीवन जीना सीख! इन बुड्ढे बुढ़िया को और कुछ काम तो है नहीं। बस बैठ बैठ कर हुकुम चलाते रहते हैं। अरे तेरी भी अपनी कोई ज़िंदगी है।” 

“-वही तो माँ! सौरभ तो कुछ समझना ही नहीं चाहता है। वर्षा ने रुआंसे स्वर में कहा।

       “-ऐसा कहने से नहीं चलेगा वर्षा, तुझे साम दाम दंड भेद जैसे भी हो, सौरभ को अपनी बात मनवाने ने के लिए विवश करना पड़ेगा वरना तू जीवन भर बुड्ढे बुढ़िया के पैरों तले दब कर रह जाएगी। जा अभी से कुछ दिमाग लगा और सौरभ को समझाने की कोशिश कर। चल अब मैं फोन रखती हूं, पर तू मेरी बात याद रखना।”

             सौम्या रसोई में काम करते-करते भी यही सोच रही थी। जब से ब्याह कर इस घर में आई है, पहले दिन से ही सास ससुर का दबदबा बना हुआ है । कब क्या करना है, कब नहीं करना है इत्यादि इत्यादि। वर्षा का तब विवाह नहीं हुआ था। छोटी होने के कारण माता पिता के लाड़ प्यार में कुछ नकचढ़ी सी ही थी । बात-बात पर जिद करना तो उसकी आदत बन चुकी थी। शुरू में एक आध बार पति अनिकेत ने उसका पक्ष लेते हुए कुछ बोलना चाहा था तो तुरंत ही सास ने उसे जोरू का गुलाम की संज्ञा दे दी। इससे तंग आकर सौम्या ने एकांत में अनिकेत से कहा कि वह अभी उसकी तरफ से कुछ नहीं बोले। वह अपने ढंग से सभी का हृदय जीतने का प्रयास करेगी। और अगर कुछ आवश्यकता पड़ी तो वह उससे अवश्य बोलेगी।

2 साल के बाद नन्हा अंश भी गोद में आ गया परंतु स्थिति में कुछ विशेष सुधार नहीं हुआ था। हां पर इतना अवश्य था कि सौम्या ने अपने मृदुल स्वभाव से इस घर में अपना एक स्थान बना लिया था। 

         शीघ्र हीअच्छा घर वर देखकर वर्षा का भी विवाह कर दिया गया। उसका पति सौरभ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर पदस्थापित था और सास ससुर भी बहुत सौम्य स्वभाव के थे। 

    वर्षा की विदाई १० दिन भी ठीक से नहीं बीते थे कि एक दिन वर्षा का फोन आ गया। 

        “-भाभी, मैं तो तंग आ गई हूं।। देखो ना मुझे तो सुबह 10:00 बजे सो कर उठने की आदत है और यहां तो 6:30 बजे ही सब सिर पर चढ़ जाते हैं। यह लोग उम्मीद करते हैं कि मैं सुबह उठकर अनिकेत का नाश्ता बनाऊं भाभी,मुझे यह सब नहीं हो सकता आखिर इतने दिनों तक अनिकेत ऑफिस जाता था तो उसकी मां नाश्ता बनाती थी या नहीं??… तो क्या वह नहीं बना सकती है? अगर मैं थोड़ा सा आराम कर लूं तो कौन सा तूफान आ जाएगा !”

       निर्मला जी ने भी चिढ़ते हुए कहा,”- हां यह क्या बात हुई! अभी तो 10 दिन भी नहीं हुए और अभी से शिक्षा दीक्षा चालू हो गई इनकी। जाने दे तू! ज्यादा झुकना मत वरना यह लोग और सर पर चढ़ जाएंगे। तू साफ-साफ बोल देना कि तू सुबह नाश्ता नहीं बना सकती। ज्यादा तकलीफ हो रही है तो रख लें किसी को काम पर। “

           उसके बाद से तो यह आम बात हो गई।वर्षा का जब तब फोन आने लगा और इसी प्रकार की कुछ ना कुछ शिकायतें रहती थी। और निर्मला जी उसे समझाने के बजाय सदैव ऐसी सलाह देती थी, जिससे बात और बिगड़ जाती थी।

         यह सब देखते हुए एक दिन सौम्या ने एकांत में वर्षा को फोन करके समझाने का प्रयास किया।

परंतु वही ढाक के तीन पात! उसका दिमाग इतना खराब हो चुका था कि वह अब कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थी। फिर भी सौम्या ने उसे धैर्य से काम लेने की सलाह देते हुए फोन रख दिया। और आज भी फिर से वही वर्षा की वही शिकायत है और निर्मला जी की वैसी ही सलाह।

        सौम्या ने सोचा कि अब वह अपने सास ससुर से ही बात करेगी। शाम को जब सास ससुर को चाय देने व उनके कमरे में गई तो नम्र स्वर में उसने अपनी बात रखी, “- पिताजी, मुझे लगता है वर्षा छोटी-छोटी बातों पर ज्यादा परेशान हो जाती है। पर ऐसे तो बात और भी बढ़ जाएगी। बात बनने में बहुत समय लगता है परंतु बिगड़ने में एक क्षण भी नहीं लगता। अभी वर्षा को थोड़ा समझदारी से काम लेना चाहिए।”

 इस पर निर्मला जी ने तैश में आकर कहा,”-अरे बिगड़ना है तो बिगड़ जाए। कोई चाहेगा कि मेरी बेटी को अंगूठे के नीचे दबा कर रखे तो ऐसा हम लोग होने नहीं देंगे और तू तो अपनी सलाह अपने पास ही रख। कुछ सही गलत सोचने की बुद्धि तो है नहीं तेरे पास। रसोई में जा और फटाफट नाश्ता तैयार कर। अनिकेत आता ही होगा। मुझे तो लगता है कि तूने अनिकेत का भी दिमाग खराब कर दिया है। वह भी तेरी ही बोली बोलने लगा है आजकल!”

             “-मां , मैं उन्हें क्यों कुछ भी बोलूंगी! सही गलत समझने की बुद्धि उनके पास भी है ना! “..इतना कह कर सौम्या वापस रसोई में चली आई।

            दूसरे दिन सुबह-सुबह घर की घंटी बजी। अनिकेत अपने ऑफिस के लिए तैयार ही हो रहा था

 उसने आगे बढ़कर दरवाजा खोला तो सामने सूटकेस और बैग के साथ वर्षा खड़ी थी! अनिकेत को देखते ही उसके सीने से लगकर सुबक पड़ी-” भैया अब मैं उस घर में नहीं रह सकती। वहां कोई मुझे नहीं समझता। सबके सब जाहिल और गंवार है।”

      “-अच्छा अच्छा इस बारे में आराम बात करते हैं! चल तू अंदर आ बैठ कुछ पानी वानी पी।” हड़बड़ाए हुए अनिकेत ने बात को संभालने की गरज से कहा।

       वर्षा की बात सुनकर अनिकेत के पिता सुधीर जी और मां निर्मला जी दोनों कमरे से बाहर आ गए। निर्मला जी ने लपक कर वर्षा को गले से लगा लिया। वर्षा को रोते देखकर निर्मला जी फिर तैश में आ गई, “-उनकी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को रुलाने की। मैं नाकों चने चबवा दूंगी उन्हें। उन्होंने हमें अभी पहचाना नहीं है। सुनिए जी आप सौरभ को अभी फोन लगाइए।”

          एक क्षण की भी देरी किए बिना सुधीर जी ने सौरभ को फोन लगा दिया। उधर से सौरभ का विनम्र स्वर सुनाई दिया,” प्रणाम पिताजी!”

         परंतु आशीर्वाद देने के स्थान पर सुधीर जी दहाड़े, “- बात क्या है? वर्षा इतनी परेशान क्यों है? कर क्या रहे हो तुम लोग?” 

सौरभ ने फिर शांत स्वर में कहा, “- पिताजी, वर्षा ने आपको क्या बताया है मैं तो नहीं जानता परंतु बात इतनी सी हुई कि कल रात मेरे पिता के एक दोस्त सपरिवार आने वाले थे। घर में उनका खाना बनाना था परंतु वर्षा को जैसे घर के किसी मामले से कोई मतलब ही नहीं है।उसने अपने कमरे में जाकर ईयर फोन लगाकर जो गाने सुनने शुरू किये तो कमरे से बाहर ही नहीं निकली। अब माँ की भी उम्र हो गई है। वह सब कुछ अकेले नहीं कर पा रही थी तो उन्होंने इसके कमरे में जाकर बस इतना कहा कि बेटा खाना बनाने में थोड़ी मेरी मदद कर दो।घर हम सब का है, अतिथि हम सबके हैं। तो हम सभी को मिल बाँटकर काम करना चाहिए। 

परंतु इतना सुनते ही वर्षा भड़क गई उसने कहा,”- आप सब ने मुझे समझ क्या रखा है मैं इस घर की नौकरानी नहीं हूं जो सबके लिए खाना पकाती रहूं और सबका हुकुम बजती रहूँ। “

    मां से उसका इस तरह बदतमीजी से बात करना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा तो मैंने मात्र इतना कहा ,”- देखो वर्षा हम सब इस घर में रहते हैं और हम सभी के अपने-अपने दायित्व हैं जिन्हें हम सभी को मिलकर पूरा करना है।” 

 इस पर वर्षा भड़क गई और कहा ,”- अगर ऐसी बात है तो मुझे इस घर में रहना ही नहीं है”… और फिर नतीजा आपके सामने है।

             इस पर सुधीर जी ने चिढ़ते हुए कहा, “- हां तो क्या गलत कहा वर्षा ने!वह विवाह करके उसे घर में गई है, नौकरानी बनकर नहीं! यह बात तुम सभी को समझनी पड़ेगी, समझे! समय रहते समझ जाओ, यही तुम सबके लिए अच्छा रहेगा।” 

          उनके फोन रखते ही ही अनिकेत ने कहा “-पिताजी मुझे लगता है कि दोनों परिवार आमने-सामने बैठकर बात करें तो शायद कुछ हल निकल सके।अहं का टकराव होने से कभी कुछ भी भला नहीं हुआ है आज तक..”

          “हमें किसी से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है हम कल भी सही थे और हम आज भी सही हैं! उनसे किसी को भी कोई बात करने की आवश्यकता नहीं है और वर्षा तू भी उन लोगों से बात करने का प्रयास मत करना। इन लोगों को दिन में तारे न दिखा दूं तो मेरा नाम बदल देना।” सुधीर जी ने दांत पीसते हुए कहा।

           2 दिन तो इसी प्रकार ठसक में बीत गए परंतु उसके बात धीरे-धीरे वर्षा के चेहरे पर उदासी दिखाई देने लगी।

परंतु अहंकार अभी भी हावी था।

        उस दिन भी वह ऐसे ही बुझी बुझी सी बैठी थी तभी अचानक उसके बचपन की सहेली गोद में गदबदा सा बच्चा लिए आ धमकी, जिसका विवाह वर्षा से एक वर्ष पूर्व ही हुआ था। उसे देखते ही वर्षा खुशी से खिल उठी , “-अरे तू कब आई नंदिनी!”

नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, “-अरे अंदर, जाकर पहले बैठने तो दे। मायके आते ही जैसे ही मुझे पता चला कि तू आई है, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैं झट से तुझसे मिलने आ गई। अब दोनों सहेलियां बैठी देर तक खूब सारी बातें करेंगे।”

            सौम्या भी आकर बहुत प्यार से नंदिनी से मिली और फिर चाय नाश्ता भी करवाया। परंतु नंदिनी के बातों में उसके ससुराल की ही बातें ज्यादा थी, वह अपने सास ससुर और पति के बाप रे प्रेम पर इतराई हुई थी।

      वर्षा ने थोड़े अहं भरे स्वर में कहा, “- तू कैसे कर लेती है अपनी सास ससुर की इतनी सेवा! मैं तो कभी न करूं। “

      इस पर नंदिनी ने मुस्कुरा कर कहा, “-ऐसा नहीं बोलते वर्षा! वह हमारे माता-पिता है, हमें ऐसा नहीं…..”

तब तक में उसके पति रंजन का फोन आ गया। रंजन का नाम फ़्लैश होते ही नंदिनी का चेहरा खिल गया। वह बहुत देर तक रंजन से बातें करती रही।

रंजन ने बताया कि नंदिनी की सासू मां की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है इस पर नंदिनी ने कहा, “- ठीक है मैं कल ही वापस आ जाती हूं!”

लेकिन रंजन ने बड़े प्यार से कहा, “-अरे कोई बात नहीं है! इतने दिनों पर तो गई हो, मैं 2 दिन की छुट्टी ले लूंगा। माँ ठीक हो जाएगी और फिर अगले हफ्ते तुम्हें लेने आ जाऊंगा। तुम्हें उड़द की वड़ियों की सब्जी अच्छी लगती है ना…माँ ने ढेर सारी बनाकर डब्बे में भरकर रखी है तुम्हारे लिए। और जो साड़ी तुम्हें ऑनलाइन पसंद आई थी ना वह माँ ने मंगवा कर रखी है तुम्हारे लिए तीज के लिए।

           यह सब सुनते सुनते वर्षा की आंखें भर आई। एक तो उसने कभी खाना बनाने में अपनी सासू मां की मदद तक नहीं की और उस पर से वह कभी प्यार से उसे कुछ खाने को भी कहती तो यह उलट कर जवाब देती थी और सदा उनका तिरस्कार ही किया। 

तभी नंदिनी ने फोन रखते हुए कहा, “- अरे कहां खो गई तू ! चल मैं चलती हूं, मुन्ने को दूध पिलाने का टाइम हो गया।”

 नंदिनी के जाने के बाद से वर्षा अनमनी सी रही। फिर उसने झिझकते हुए निर्मला जी से पूछा”- मां क्या मैं एक बार सौरभ से बात कर लूं??” 

   मां ने तुरंत पलट कर आंखें तरेरीं, “- कोई आवश्यकता नहीं है किसी से बात करने की, चुपचाप बैठी रह। ” वर्षा अपना सा मुंह लेकर रह गई। बीच-बीच में एक आध बार सौरभ ने फोन भी किया परंतु किसी ने वर्षा को सौरभ से बात नहीं करने दी। सौम्या ने एक बार सासू मां से कहा भी कि कम से कम एक बार तो बात कर लेने दीजिए लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रहीं, उन्होंने कहा, ” अरे तू समझती नहीं है इन लोगों के चोंचले !अभी कुछ दिन वर्षा बात नहीं करेगी ना तो घुटनों के बल आएगा दौड़ा दौड़ा.. तू बस देखती जा…”

               सौरभ तो नहीं आया लेकिन एक हफ्ते के बाद तलाक के कागजात घर पर पहुंच गए। वर्षा को काटो तो खून नहीं उसने तो ऐसा सोचा ही नहीं था। कभी वह तो हमेशा यही सोचती रही कि सौरभ उसके प्रेम में पागल है तो वह जो भी रहेगी वह अवश्य मानेगा आज नहीं तो कल। उसका यह कदम तो उसकी आशाओं से परे था। कागज़ात देखकर घर में जैसे सबको सांप सूंघ गया। वर्षा सिसक पड़ी, मेरा तो घर ही उजड़ गया मां… मैं कह रही थी मुझे एक बार सौरभ से बात करने दो, मगर किसी ने मेरी एक नहीं सुनी…”

दौड़कर वह अपने कमरे में चली गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। कुछ देर तक तो सन्नाटा पसरा रहा, फिर सुधीर जी के अहं ने सिर उठना शुरू कर दिया कर दिया, “- अरे कागजात भेज दिए हैं तो क्या समझता है हम डर जाएंगे। हम भी ईंट से ईंट बजा देंगे। “

        सासू मां ने भी उनकी हां मिलाई लेकिन उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखाई दे रही थी। 

            रात को जैसे तैसे सबने खाना खाया और सब सोने चले गए। सुबह सौम्या सबको चाय दे रही थी तभी दरवाजे की घंटी बजी। सौम्या ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला तो सामने सौरभ खड़ा था।

            सुधीर जी हड़बड़ा कर उठ खड़े हुए लेकिन उनके कुछ बोलने से पूर्व ही वर्षा अंदर से बाहर निकल कर आई और उसके हाथों में उसका सूटकेस और बैग था। निर्मला जी ने अचंभित होकर कहा,”- यह क्या कर रही है वर्षा ?यह सामान क्यों बाँध रखा है? क्या तुझे पता था कि सौरवभ आने वाला है?” 

 “-हां मां, मेरे घर में आग लगने में तो कोई कसर बाकी नहीं रह गई थी और कल मैं बहुत परेशान थी! अपनी सारी गलतियां मुझे याद आ रही थी जिनको बढ़ावा देकर तुमने बातों को और बिगाड़ दिया। उसे दिन नंदिनी का सुखी संसार देखकर मुझे अनुभव हुआ कि मैं क्या खो दिया है परंतु तुम लोग तो मेरी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे। और फिर वही हो गया जिसका डर था। वह तो भला हो भाभी का जो उन्होंने कल उन्होंने मुझे अपने साथ छत पर ले जाकर सौरभ को फोन लगाया और सौरभ से बातें की। मैंने भी सौरभ से बातें की। मैंने‌ सौरभ से अपनी गलतियों की क्षमा मांग ली और सौरभ ने भी कहा कि वह मुझे शांति से और अच्छे से समय देगा ताकि मैं घर परिवार को भली भांति समझ सकूं और अपना सकूं। अब वही घर मेरा संसार है मां। मुझे जाने दो। 

          निर्मला जी ने हारे हुए स्वर में कहा , “-जब तुमने अब सोच ही लिया है वर्षा तो बात करने के लिए कुछ बचता ही नहीं है। ठीक है जैसी तेरी मर्जी! 

        सुधीर जी और निर्मला जी ने वर्षा की मर्जी का कर इसे स्वीकार तो कर लिया परंतु स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि उनके चेहरे पर कितनी शांति थी क्योंकि अंदर ही अंदर शायद कहीं वह भी यही चाहते थे। 

          सौम्या ने मुस्कुरा कर वर्षा को चिकोटी काटते हुए धीरे से कान में कहा, “-ननद रानी जी, मैं समझ रही हूं पिया के घर जाने की बड़ी जल्दी है आपको लेकिन दामाद जी ससुराल आए हैं, कम से कम उन्हें चाय नाश्ता तो कर लेने दो। शर्मा कर वर्षा नंदिनी के गले लग गई। फिर आगे बढ़कर मां से कहा, “- मां तुम हमेशा भाभी को गलत ठहराती रही, आज जो कुछ भी सही हो पाया सब भाभी की समझदारी के कारण ही हो पाया और मेरा हंसता खेलता संसार बच गया। इसका अनुभव तो अब तुम्हें भी हो ही गया होगा।”

             वर्षा की बात सुनकर निर्मला जी की आंखें डबडबा गई । पहली बार निर्मला जी ने सौम्या को खींचकर गले लगा लिया।

# एक_बहू_की_समझदारी

✍️निभा राजीव “निर्वी”

       मुंद्रा, गुजरात

स्वरचित और मौलिक रचना

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