“हां, तुम्हारी मम्मी तो महान है, सब कुछ कर लेती है, तुम तो उनके गुणगान करोगे ही, पर कान खोलकर सुन लो, मैं कोई मशीन नहीं हूँ!” शिखा के हाथों से सब्जियों की टोकरी स्लैब पर जोर से गिरी और उसकी आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा।
रसोई में पसरा सन्नाटा इस बात का गवाह था कि बात अब रोजमर्रा की नोकझोंक से बहुत आगे बढ़ चुकी थी। शिखा, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एचआर थी, सुबह छह बजे से मशीन की तरह दौड़ रही थी। पांच साल के बेटे आरव को तैयार करना, उसका टिफिन बनाना, खुद के लिए ऑफिस का काम समेटना और शाम को लौटकर फिर से रसोई में घुस जाना। आज जब वह ऑफिस से थकी-हारी लौटी तो गैस पर दूध उबलकर गिर गया था और उसी वक्त उसके पति विकास ने ड्राइंग रूम से चाय की मांग करते हुए एक ताना मार दिया था— “शिखा, थोड़ा ध्यान रखा करो। मेरी माँ को देखो, जॉइंट फैमिली के पच्चीस लोगों का खाना अकेले बनाती थीं, और मजाल है जो कभी उनके माथे पर शिकन भी आई हो। तुम तो तीन लोगों के काम में ही हांफने लगती हो।”
बस यही वह चिंगारी थी जिसने शिखा के भीतर जमे हुए गुबार को ज्वाला बना दिया।
“तुम्हें लगता है कि मैं काम से भाग रही हूँ?” शिखा ने अपनी रुलाई रोकते हुए कहा। “तुम्हारी माँ ने जो किया, मैं उसका सम्मान करती हूँ, लेकिन तुम मेरी तुलना उनसे कैसे कर सकते हो? मेरी भी एक नौकरी है, मेरी भी एक जिंदगी है। तुम ऑफिस से आकर टीवी के सामने बैठ जाते हो, और मैं वापस दूसरे शिफ्ट की नौकरी में लग जाती हूँ। अगर तुम्हें अपनी माँ जैसी परफेक्शन चाहिए, तो मुझसे उम्मीद मत रखो।”
विकास अवाक रह गया। उसका ईगो आहत हुआ था। “मैंने तो बस एक बात कही थी, तुम तो मेरी माँ के ही पीछे पड़ गई। तुम्हें तो हर बात में समस्या नजर आती है,” विकास ने भी ऊंची आवाज में जवाब दिया।
तभी रसोई के दरवाजे पर आहट हुई। विकास की माँ, सुशीला देवी, जो पिछले हफ्ते ही गांव से उनके पास रहने आई थीं, वहां खड़ी थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी शांति थी, लेकिन आँखों में अतीत की कुछ परछाइयां तैर रही थीं। शिखा उन्हें देखकर सहम गई। उसे लगा कि अब सास भी अपने बेटे का ही पक्ष लेंगी और उसे संस्कारी बहू न होने का ताना देंगी।
सुशीला देवी ने बिना कुछ कहे गैस का नॉब बंद किया, बिखरा हुआ दूध साफ किया और शिखा का हाथ पकड़कर उसे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठा दिया। फिर उन्होंने विकास की तरफ देखा।
“विकास, तू सही कह रहा है। मैं महान थी। मैं पच्चीस लोगों का खाना बनाती थी, घर के मवेशियों का ध्यान रखती थी, और तेरे दादाजी के कड़क मिजाज को भी सहती थी।” सुशीला देवी की आवाज बहुत शांत थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी चुभन थी।
विकास ने गर्व से शिखा की तरफ देखा, मानो कह रहा हो कि देखा, मैंने कहा था ना।
लेकिन सुशीला देवी अभी रुकी नहीं थीं। उन्होंने एक गहरी सांस ली और आगे बोलीं, “पर बेटा, तूने उस ‘महानता’ के पीछे की घुटन कभी देखी है? तूने देखा है कि जब मुझे 102 डिग्री बुखार होता था, तब भी मैं रसोई में तपती थी क्योंकि इस घर के मर्दों को औरतों के हाथ का ही गरम खाना चाहिए था? तूने देखा है कि मुझे गाने का कितना शौक था, लेकिन बर्तन मांजते-मांजते मेरी आवाज कहीं उसी सिंक में बह गई? मैं महान इसलिए नहीं थी कि मुझे महान बनना था, मैं महान इसलिए थी क्योंकि मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। डर था मुझे… समाज का, तेरे पिता के गुस्से का, और एक औरत होने की लाचारी का।”
विकास का चेहरा पीला पड़ गया। उसने अपनी माँ को कभी इस रूप में नहीं देखा था।
सुशीला देवी ने शिखा के सिर पर हाथ रखा और विकास से कहा, “मैंने अपनी पूरी जिंदगी एक ढांचे में ढलने में निकाल दी, सिर्फ इसलिए ताकि तुम बच्चों को एक बेहतर कल मिल सके। मैंने अपनी बेटियों को और तुझे इसलिए पढ़ाया-लिखाया ताकि मेरी बहू को मेरी तरह वो घुटन न सहनी पड़े। और आज तू मेरी ही बहू को मेरे उस दुख भरे अतीत का वास्ता देकर ताने मार रहा है?”
शिखा फूट-फूट कर रोने लगी। जिस सास को वह पारंपारिक और सख्त समझती थी, आज वही सास उसके दर्द को अपने दर्द से जोड़ रही थी।
सुशीला देवी ने विकास के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, घर औरतों के त्याग से नहीं, पति-पत्नी की साझेदारी से चलता है। शिखा कोई मशीन नहीं है। अगर वो बाहर जाकर तेरे कंधे से कंधा मिलाकर कमा सकती है, तो तू घर के कामों में उसका हाथ क्यों नहीं बंटा सकता? मेरी परछाई शिखा पर मत थोप। मैं नहीं चाहती कि जब मेरी बहू साठ साल की हो, तो उसके सीने में भी मेरी तरह अधूरे सपनों की टीस हो।”
उस रात घर में कोई बहस नहीं हुई। विकास को अपनी गलती का गहरा अहसास हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि जिसे वह अपनी माँ की ‘सुपरपावर’ समझता था, वह असल में एक पितृसत्तात्मक समाज द्वारा थोपी गई मजबूरी थी। उसने चुपचाप उठकर रसोई में गया, रात का खाना खुद गर्म किया और प्लेटें लगाकर शिखा और अपनी माँ को बुलाया।
अगली सुबह जब शिखा उठी, तो उसने देखा कि विकास आरव का टिफिन पैक कर रहा था और सुशीला देवी उसके लिए चाय बना रही थीं। शिखा की आँखों में आज भी आंसू थे, लेकिन ये आंसू शिकायत के नहीं, बल्कि उस सुकून के थे जो उसे एक सच्ची साझेदारी और एक माँ जैसी सास के प्यार से मिले थे। रिश्तों की मिठास तभी बढ़ती है जब हम एक-दूसरे की कमियों को तुलना के तराजू में तौलने के बजाय, समझदारी के धागे से बुनते हैं।
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क्या आपको भी लगता है कि अक्सर अनजाने में हम अपनी जीवनसाथी की तुलना अपनी माँ से करके उन पर एक अनावश्यक दबाव डाल देते हैं? क्या सुशीला देवी ने जो किया, वह हर सास को अपनी बहू के लिए करना चाहिए? अपने विचार कमेंट करके जरूर बताएं।
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