मूहूर्त 

यह सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया। जो मेहमान कुछ देर पहले तक ताने मार रहे थे, उनकी आँखें शर्म से झुक गईं। सुशीला देवी का सारा गुस्सा, सारा घमंड जैसे किसी बर्फ की तरह पिघल गया। उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई कि वह किन महान लोगों को बुरा-भला कह रही थीं। उनकी आँखों से पछतावे के आंसू छलक पड़े।

घर में मेहमानों की भारी भीड़ थी, धीमी आवाज़ में शहनाई की मधुर धुन बज रही थी और गेंदे के फूलों की सजावट अपनी महक से पूरे आंगन को महका रही थी। आज राधिका की सगाई थी। राधिका अपने कमरे में लाल जोड़ा पहने, हाथों में मेहंदी लगाए बैठी थी, लेकिन उसकी आँखों में खुशी से ज़्यादा एक बेचैनी थी। सगाई का मूहूर्त सुबह ग्यारह बजे का था और अब दोपहर के तीन बज चुके थे। लड़के वालों का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं था। मेहमानों के बीच अब कानाफूसी शुरू हो चुकी थी और यह कानाफूसी राधिका की माँ, सुशीला देवी के कानों तक पहुँच रही थी जो उनके सीने में आग लगा रही थी।

“शांति सुशीला, शांति। पता तो चलने दो कि माजरा क्या है। हो सकता है रास्ते में कोई गाड़ी खराब हो गई हो या जाम में फंस गए हों,” राधिका के पिता, दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा।

लेकिन सुशीला देवी का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था। उनका चेहरा तमतमा रहा था। उन्होंने झल्लाते हुए कहा, “कब तक शांति बनाए रखें हम? हमारा कुछ मान-सम्मान है या नहीं इस समाज में? चार घंटे हो गए हैं! फोन मिलाओ तो किसी का नंबर नहीं लग रहा। मुझे तो लगता है कि ये लोग जानबूझकर हमें नीचा दिखाना चाहते हैं। बड़े घर के हैं तो क्या हुआ, क्या हम अपनी बेटी मुफ्त में दे रहे हैं? मुझे तो लगता है कि हमें इस संबंध को यहीं तोड़ देना चाहिए। तभी इन लोगों की अक्ल ठिकाने आएगी कि गरीब की भी कोई इज़्ज़त होती है।”

दीनानाथ जी ने हाथ जोड़कर पत्नी को शांत करने की बहुत कोशिश की, लेकिन सुशीला देवी ने एक न सुनी। उन्होंने मेहमानों के बीच जाकर खड़ी होकर कह दिया कि अगर अगले आधे घंटे में लड़के वाले नहीं आए, तो वह अपनी बेटी के हाथ पीले नहीं करेंगी, चाहे जो हो जाए। राधिका अंदर बैठी-बैठी अपने आंसुओं को पी रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिसके साथ वह अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुन रही थी, वह समीर उसे इस तरह सबके सामने जलील करेगा।

तभी बाहर दरवाज़े पर एक गाड़ी के रुकने की तेज़ आवाज़ आई। घर के सभी लोग दौड़कर बाहर गए। गाड़ी से समीर, उसके पिता रमेश जी और उसकी माँ उमा देवी बाहर निकले। लेकिन उन्हें देखते ही सुशीला देवी का बचा-खुचा गुस्सा भी भड़क उठा, क्योंकि उनकी हालत किसी भी एंगल से सगाई में आने वाले मेहमानों जैसी नहीं थी। समीर की महंगी शेरवानी पर धूल और खून के गहरे धब्बे लगे हुए थे। उमा देवी की साड़ी अस्त-व्यस्त थी और रमेश जी के चेहरे पर एक अजीब सी थकान और पसीना था।

सुशीला देवी ने बिना कुछ सोचे-समझे ताना मारते हुए कहा, “वाह! क्या बात है! चार घंटे का इंतज़ार करवाकर और इस हुलिए में आकर आप लोगों ने साबित कर दिया कि हमारे परिवार की आपकी नज़रों में क्या अहमियत है। अगर आपको यह रिश्ता मंज़ूर नहीं था, तो पहले ही बता देते। इस तरह पूरे समाज के सामने हमारा तमाशा बनाने की क्या ज़रूरत थी?”

रमेश जी ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उनकी आँखों में नमी थी। वे भारी आवाज़ में बोले, “सुशीला जी, आप हमें जो चाहे सज़ा दे दें, हमें सब मंज़ूर है। हम जानते हैं कि हमारी वजह से आप सबको बहुत मानसिक पीड़ा हुई है। लेकिन यकीन मानिए, हमने जानबूझकर ऐसा नहीं किया।”

समीर आगे बढ़ा और उसने सुशीला देवी के पैर छूते हुए कहा, “माफ़ कर दीजिए माँ जी। हम लोग समय से निकले थे और बस पहुँचने ही वाले थे कि हाईवे पर हमारे सामने ही एक भयानक हादसा हो गया। एक स्कूल बस और एक ट्रक की ज़ोरदार टक्कर हो गई थी। वहां चीख-पुकार मची हुई थी।”

समीर की माँ उमा देवी रुंधे गले से बोलीं, “बहन जी, वहां सड़क पर छोटे-छोटे बच्चे खून से लथपथ पड़े थे। किसी की कोई मदद करने वाला नहीं था। सब लोग बस अपनी गाड़ियां रोककर तमाशा देख रहे थे या वीडियो बना रहे थे। मेरा समीर यह सब देखकर खुद को रोक नहीं पाया। उसने अपनी परवाह किए बिना बस का शीशा तोड़ा और बच्चों को बाहर निकालने लगा। हम लोग भी लग गए। एंबुलेंस आने में समय था, इसलिए हमने अपनी गाड़ियों में ही बच्चों को भरकर अस्पताल पहुँचाया।”

रमेश जी ने आगे बताया, “वहां अस्पताल में खून की कमी पड़ गई थी। समीर और मैंने तीन बच्चों को खून दिया है। और वहां नेटवर्क बिल्कुल नहीं था, इसलिए हम आपको खबर भी नहीं कर पाए। हम जानते थे कि यहाँ हमारा इंतज़ार हो रहा है, सगाई का मूहूर्त निकल रहा है, लेकिन उन मासूम बच्चों की ज़िंदगी से बड़ा कोई मूहूर्त हमें समझ नहीं आया। अगर आपको लगता है कि हमने आपका अपमान किया है, तो हम माफ़ी मांगते हैं और आप जैसा चाहेंगी, वैसा ही होगा।”

यह सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया। जो मेहमान कुछ देर पहले तक ताने मार रहे थे, उनकी आँखें शर्म से झुक गईं। सुशीला देवी का सारा गुस्सा, सारा घमंड जैसे किसी बर्फ की तरह पिघल गया। उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई कि वह किन महान लोगों को बुरा-भला कह रही थीं। उनकी आँखों से पछतावे के आंसू छलक पड़े।

सुशीला देवी आगे बढ़ीं और उन्होंने उमा देवी को गले से लगा लिया। रोते हुए उन्होंने कहा, “मुझे माफ़ कर दीजिए बहन जी! मैं अपने झूठे मान-सम्मान और अहंकार में अंधी हो गई थी। मैंने एक बार भी नहीं सोचा कि आप जैसे संस्कारी और नेक लोग जानबूझकर ऐसा क्यों करेंगे। मुझे फक्र है कि मेरी बेटी एक ऐसे घर में जा रही है, जहाँ इंसानियत को किसी भी रस्म या दिखावे से ऊपर रखा जाता है। आज आपने मेरी राधिका को नहीं, बल्कि एक माँ के रूप में मुझे अपना लिया है।”

राधिका ने जब यह सब सुना, तो उसके होंठों पर एक गर्व भरी मुस्कान आ गई। समीर के खून से सने कपड़े उसे दुनिया की सबसे खूबसूरत पोशाक लग रहे थे। सगाई बिना किसी बड़े मूहूर्त के हुई, लेकिन उस दिन जो रिश्ता जुड़ा, वह दुनिया का सबसे पवित्र और अटूट रिश्ता था।

दोस्तों, हमारे समाज में अक्सर लोग झूठे मान-सम्मान और दिखावे के लिए रिश्तों की अहमियत भूल जाते हैं। लेकिन जो इंसान मुश्किल वक़्त में किसी अनजान के काम आ सके, वही जीवनसाथी और परिवार के रूप में सबसे बेहतर साबित होता है। आपको सुशीला देवी और समीर के परिवार में किसका नज़रिया सही लगा? हमें अपने विचार ज़रूर बताएं।

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