रागिनी ने गुस्से से अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर धम्म से बैठ गई। उसकी आँखों में आँसू थे और मन में एक ही बात बार-बार गूँज रही थी— “आखिर मैं इस घर में अपनी मर्जी से साँस भी क्यों नहीं ले सकती?” शादी से पहले उसकी सहेलियों ने उसे चेताया था कि ससुराल में सास के साथ तालमेल बिठाना लोहे के चने चबाने जैसा होता है। लेकिन रागिनी को लगता था कि वह पढ़ी-लिखी और समझदार है, सब कुछ आसानी से संभाल लेगी। पर शादी के महज़ दो साल में ही उसका यह भ्रम टूट गया था। उसकी सास, सरला देवी, पुराने ख्यालातों की एक सख्त महिला थीं। सुबह उठने के समय से लेकर रात के खाने के मेन्यू तक, हर चीज़ सरला देवी के हिसाब से तय होती थी। रागिनी अगर दाल में थोड़ा सा भी नया तड़का लगाने की कोशिश करती, तो सरला देवी तुरंत टोक देतीं, “हमारे घर में इतना तीखा नहीं खाया जाता, बहू।” कपड़े सुखाने के तरीके से लेकर टीवी देखने के समय तक, हर बात पर एक सख्त पाबंदी थी।
आज भी कुछ ऐसा ही हुआ था। रागिनी ने अपने मायके जाने के लिए एक नई और चटक रंग की साड़ी निकाली थी, जिसे देखकर सरला देवी ने कह दिया कि यह रंग उस पर जंचता नहीं है और उसे दूसरी सादी साड़ी पहननी चाहिए। यह छोटी सी बात रागिनी के लिए बर्दाश्त की सीमा पार कर गई। रात को जब उसका पति, सुमित, ऑफिस से लौटा, तो रागिनी का गुबार फूट पड़ा। उसने सुमित के सामने साफ शब्दों में कह दिया, “सुमित, अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। मैं इस घुटन भरे माहौल में और नहीं रह सकती। ये करो, वो मत करो… ऐसे बैठो, वैसे मत उठो… मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ। मुझे मेरी आज़ादी चाहिए, अपना एक अलग घर चाहिए। या तो हम इस घर से अलग होंगे, या फिर माँ जी को बड़े भैया के पास जाकर रहना होगा। मैं रोज़-रोज़ की इस चिकचिक के साथ अपनी ज़िंदगी में दुख और नहीं बढ़ा सकती।” सुमित अपनी पत्नी और माँ के बीच पिस कर रह गया था। उसने रागिनी को शांत करने की बहुत कोशिश की, लेकिन रागिनी ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया था।
सुमित ने भारी मन से रागिनी की बात मान ली और अगले ही दिन से शहर के दूसरे कोने में एक नया फ्लैट ढूँढने का मन बना लिया। इसी बीच सुमित को अपने ऑफिस के एक ज़रूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। रागिनी मन ही मन खुश थी कि चलो, सुमित के लौटते ही वे नए घर में शिफ्ट हो जाएंगे और उसे रोज़ की इस किचकिच से हमेशा के लिए आज़ादी मिल जाएगी। लेकिन सुमित के जाने के दूसरे ही दिन रागिनी को तेज़ बुखार ने जकड़ लिया। मौसम बदल रहा था और यह वायरल इतना भयानक था कि रागिनी से बिस्तर से उठा तक नहीं जा रहा था। उसका पूरा शरीर दर्द से टूट रहा था और गला सूखकर कांटा हो गया था।
सुबह जब रागिनी कमरे से बाहर नहीं आई, तो सरला देवी ने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर का नज़ारा देखकर वे घबरा गईं। रागिनी बुखार में बुरी तरह तप रही थी। जिस सास को रागिनी एक तानाशाह और क्रूर महिला समझती थी, उस सास ने पल भर में अपनी सारी सख्ती किनारे रख दी। सरला देवी ने तुरंत पारिवारिक डॉक्टर को घर बुलाया। रागिनी को अपने हाथों से दवा दी और उसके सिरहाने बैठकर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखने लगीं। रागिनी अधखुली आँखों से यह सब देख रही थी। उसे लग रहा था कि यह सब बस बुखार के कारण कोई सपना है।
अगले तीन दिनों तक सरला देवी ने रागिनी को पलंग से नीचे नहीं उतरने दिया। जो सास दाल में मिर्च के लिए टोकती थी और अपने बनाए नियमों पर चलती थी, उसने रागिनी की पसंद का हल्का और स्वादिष्ट सूप खुद अपने हाथों से बनाकर उसे पिलाया। रात-रात भर जागकर रागिनी के दर्द से तड़पते पैरों को दबाया। एक रात जब रागिनी की आँख खुली, तो उसने देखा कि कमरे के बाहर सरला देवी ज़मीन पर बैठकर भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थीं, “हे भगवान, मेरी बहू को जल्दी ठीक कर दे। वो अभी बच्ची है, इस घर की रौनक उसी की वजह से है। उसकी सारी तकलीफें तू मेरे हिस्से में डाल दे।”
रागिनी के कानों में ये शब्द पड़ते ही उसके गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली। उसे अचानक अपनी माँ की याद आ गई। जब वह मायके में बीमार पड़ती थी, तो उसकी माँ भी तो ऐसे ही रात-रात भर जागती थी। और अगर वह खान-पान में कोई लापरवाही करती थी, तो माँ भी तो कड़े शब्दों में डांटती थी। तब वह डांट उसे पाबंदी क्यों नहीं लगती थी? रागिनी को एक झटके में एहसास हो गया कि सरला देवी की जो बातें उसे ‘रोक-टोक’ लगती थीं, वो असल में एक माँ की फिक्र और इस घर को एक सूत्र में बांध कर रखने का उनका अपना तरीका था। बस उनके जताने का ढंग थोड़ा पुराना और अलग था। जब हम मायके में माँ की डांट को प्यार समझ सकते हैं, तो ससुराल में सास की हिदायतों को सीधा दुश्मनी और बंदिश क्यों मान लेते हैं?
जब सुमित अपना दौरा खत्म करके वापस लौटा, तो उसके हाथ में एक नए फ्लैट के एग्रीमेंट के कागज़ात थे। उसने कमरे में आकर रागिनी से धीरे से कहा, “मैंने फ्लैट फाइनल कर लिया है। माँ को मैं बाद में समझा दूँगा, तुम अब और परेशान मत हो।” रागिनी ने सुमित के हाथ से वे कागज़ लिए और उन्हें फाड़ कर एक तरफ कचरे के डिब्बे में डाल दिया। सुमित हैरानी से उसे देखने लगा।
रागिनी मुस्कुराते हुए, आँखों में एक अजीब सी शांति लिए बोली, “मुझे कोई नया घर नहीं चाहिए सुमित। मेरी आज़ादी, मेरी खुशियाँ और मेरा असली घर यहीं है, और माँ जी के साथ ही है। मकान तो ईंट-पत्थरों से कहीं भी बन जाता है, लेकिन घर परिवार के प्यार, फिक्र और बुजुर्गों के साये से बनता है। मैंने अपनी माँ को इसी घर में पा लिया है।”
कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी सरला देवी यह सब सुन रही थीं और उनके झुर्रियों वाले चेहरे पर एक संतोष और प्यार भरी मुस्कान तैर गई। उस दिन के बाद से उस घर में ‘ये मत करो’ की शिकायतें हमेशा के लिए खत्म हो गईं और ‘माँ जी, ये कैसे करना है?’ के सम्मान भरे नए सफर की शुरुआत हो गई।
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