वह अजनबी, जो मेरी माँ से बढ़कर थी – नीतीश मिश्रा

 “मेरी प्यारी सुधा ताई, आज समझ में आता है कि आपने मेरे लिए क्या किया था। मेरी जन्म देने वाली माँ ने मुझे इस दुनिया में लाया जरूर था, लेकिन इस दुनिया में जिंदा कैसे रहना है, यह आपने सिखाया। जब मेरे अपनों ने ही मेरे लिए चक्रव्यूह रचा था, तब आप मेरे लिए कृष्ण … Read more

मौन की गूंज: एक अनकही दास्तान – राजेन्दर सक्सेना

सुबह के पांच बज रहे थे। अलार्म बजने से पहले ही वंदना की आँखें खुल गईं। यह उसके जीवन का वह अलिखित नियम था, जिसमें रविवार की कोई छुट्टी नहीं होती थी। बिस्तर से उठते ही उसने सबसे पहले अपनी सास सुमित्रा जी का गर्म पानी तैयार किया, फिर रसोई में जाकर बच्चों के टिफिन … Read more

अक्स: जब बेपरवाही को मिला ज़िम्मेदारी का सुकून – हर्षिता सिंह

शहर की भागदौड़ से दूर, एक पुरानी लेकिन बेहद खूबसूरत कॉलोनी में रहने वाली मानवी एक ऐसी लड़की थी, जो अपनी ही ख्यालों की दुनिया में मगन रहती थी। उसके लिए दुनिया का मतलब सिर्फ उसकी कैनवास, उसके रंग, कुछ पुरानी किताबें और अपने कानों में इयरफ़ोन लगाकर अपनी धुन में खोए रहना था। तेईस … Read more

अधूरी लकीरों का सफर – नमिता पंडित

“अगर, मगर और काश… इन शब्दों में जिंदगी नहीं जी जाती राघव। मैं मानती हूं कि हमने अपने सबसे अच्छे साल तकलीफों में गुजारे। मैंने अपने मायके का सुख हमेशा के लिए खो दिया और तुमने अपने शुरुआती संघर्षों में वो सुकून नहीं पाया जो एक नौजवान को मिलना चाहिए। लेकिन आज हम कहां हैं? … Read more

जड़ों की पुकार – मीरा महेश

अमन ऑफिस की फाइलें पलट तो रहा था, लेकिन उसका दिमाग उन पन्नों पर नहीं था। उसकी आँखों के सामने बार-बार अपनी माँ का वो उदास चेहरा आ रहा था, जो उन्होंने कल रात उसे खाना परोसते समय छुपाने की कोशिश की थी। शादी के तीन साल बाद ही उसके और उसकी पत्नी दिशा के … Read more

असीम प्रेम की अनूठी दास्तान – निधि सहाय

पार्टी के बीच में अचानक काव्या की नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे उसने पिछले कई सालों से नहीं देखा था। वह समीर था। समीर, काव्या के साथ कॉलेज में पढ़ता था। वह हमेशा शांत रहता था, क्लास में सबसे पीछे बैठता था और अपनी किताबों में खोया रहता था। लेकिन वह अक्सर छुप-छुप … Read more

फ़र्ज़ की डोरी – कृति रश्मि 

“बहू, ये लाल रंग का भारी काम वाला लहंगा कितने का होगा?” विमला बुआ ने अपनी बड़ी भतीज-बहू, मानसी के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा। उनकी नज़रें स्टेज पर बैठी अपनी सगी भतीजी और आज की दुल्हन, शिखा पर टिकी थीं। मानसी ने एक हल्की, लेकिन थकी हुई मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बुआ … Read more

पत्थर के रिश्ते – आर्या विनोद

नंदिनी सुबह के चार बजे से ही उठकर घर के कामों में जुट जाती थी। रसोई से बर्तन खटकने की हल्की सी आवाज भी आती, तो उसे डर लगता कि कहीं उसकी सौतेली भाभी सुलेखा की नींद न टूट जाए। अगर सुलेखा की नींद टूट गई, तो नंदिनी का पूरा दिन तानों और गालियों के … Read more

आज़ादी – विविकता

“अरे बहन जी! आजकल की बहुओं की तो किस्मत खुल गई। हमारे ज़माने में तो बस चाकरी और ससुराल वालों के ताने थे; सुबह से रात हो जाती थी और हमारा काम खत्म नहीं होता था—अपनी मर्ज़ी से तो कुछ कर ही नहीं सकते थे।” पूनम ने पड़ोसन कमला से कहा। “सौ आने सच कह … Read more

मेरा सहारा मेरी बेटी – मंजू ओमर

आज सरस्वती जी के आंख से आंसू बह रहे थे लेकिन होठों पर मुस्कान थी। तभी पडोस मे रहने वाली कावेरी ने आकर कहा अरे माता जी आज तो खुशी का मौका है तब भी आप रो रही है परिवार की परवाह किये बिना आपने इस उम्र मे ज़ो काम किया है उसका तो जवाब … Read more

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