अनजाना भय – विभा गुप्ता
‘ शांति पार्क ‘ की बेंच पर बैठे सुदर्शन जी अपने दो मित्र- श्रीकांत दुबे और जमनालाल से बातें करते हुए सुबह की धूप का आनंद ले रहें थे कि अचानक कलाई पर बँधी घड़ी पर उनकी नज़र पड़ी तो वो उठकर जाने लगे। ” इतनी ज़ल्दी चल दिये..आज तो संडे है..क्या आज भी दफ़्तर..।” … Read more