वो भी तो मेरा अंश था… – चंचल नरूला
काश कोई बड़ा भाई या बहन होती जो संभाल लेती मेरी लाडो को हम बुड्ढा बुढ़िया के बाद | जाने किस उधेड़ बुन मे फंसी थी चेतना जब डॉ. ने कहा माँ जी आपको अपने लिए नहीं अपनी इकलोती बेटी के लिए जीना है | ” कितनी खुश थी न चेतना उन 2 लकीरों को … Read more