रूह के धागे
“मुझे माफ कर दो बच्चों,” विद्याधर जी की आवाज भर्रा गई। “मैं परंपराओं के खोखले खोल में इतना उलझ गया था कि संस्कारों और सच्चे प्रेम की पहचान ही भूल गया था। संस्कृति किसी को बांटने का नाम नहीं है, बल्कि अपनों को दिल से अपनाने का नाम है। अवनि, तुम सिर्फ अरनव की पसंद … Read more