रूह के धागे 

“मुझे माफ कर दो बच्चों,” विद्याधर जी की आवाज भर्रा गई। “मैं परंपराओं के खोखले खोल में इतना उलझ गया था कि संस्कारों और सच्चे प्रेम की पहचान ही भूल गया था। संस्कृति किसी को बांटने का नाम नहीं है, बल्कि अपनों को दिल से अपनाने का नाम है। अवनि, तुम सिर्फ अरनव की पसंद … Read more

स्नेह की छांव  

“नहीं भाभी, बिल्कुल नहीं!” प्रियांशी ने विभा के गले में बाहें डालते हुए कहा, “चार दिन हो गए हैं मुझे यहाँ आए हुए। आप और भैया जिस तरह मेरी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रख रहे हैं, माँ होतीं तो शायद वो भी इतना ही करतीं। गर्भावस्था के इस दौर में मन कभी खट्टा खाने … Read more

वचन का मोल

कुणाल, नितिन और गौरव ने आगे बढ़कर अपनी रोती हुई दीदी को सहारा दिया। कुणाल ने सरिता के सिर पर हाथ रखकर भरे मन से कहा, “दीदी, भैया शरीर से भले ही चले गए हों, पर उनका प्यार और उनका दिया वचन कभी नहीं मरेगा। उन्होंने हमें सिखाया कि रिश्ते सिर्फ़ ख़ून से नहीं, आत्मा … Read more

राख से उठी उड़ान

“गलती सिर्फ वक्त की नहीं थी अनिका… कुछ चूक तुमसे हुई और बहुत बड़ी कायरता मुझसे,” समीर की भारी आवाज में बरसों का दर्द साफ छलक रहा था। “अगर उस दिन मैंने समाज और परिवार के तानों की परवाह किए बिना तुम्हारा हाथ थाम लिया होता, तो आज जिंदगी की यह तस्वीर कुछ और ही … Read more

 आँगन की दो चिड़ियाँ

यह सुनते ही प्रभा देवी का सालों पुराना कठोर आवरण मोम की तरह पिघलने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे कभी वे दोनों देवरानी-जेठानी एक साथ बैठकर त्योहारों की तैयारियां किया करती थीं। अंकिता ने कुछ देर इधर-उधर की प्यारी बातें कीं और फिर चलने की इजाजत मांगते हुए बोली, “चाची जी, बड़ी माँजी ने … Read more

अपनों की छांव

“खबरदार सार्थक! जो इसके आगे अपनी जुबान से एक भी शब्द और निकाला!” गायत्री देवी की आवाज में ऐसी कड़क थी कि वहां खड़े दोनों चाचा भी सन्न रह गए थे। “जिस परिवार के त्याग को तू आज झमेला और दलदल बता रहा है ना, उसी परिवार के छोटे चाचा ने अपनी जवानी के शौक … Read more

धरोहर का नया सवेरा

 वंदना जी ने एक गहरी साँस ली और दोनों बेटों की आँखों में आँखें डालकर कहा, “बेटों का ख्याल था, तभी तो तुम्हारे बाबूजी ने अपनी जवानी की हर खुशी कुचलकर तुम्हें इस काबिल बनाया कि आज तुम दोनों लाखों में कमा रहे हो, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हो। माता-पिता का फ़र्ज़ बच्चों को … Read more

उम्मीद की पहली किरण

किराए के उस छोटे से सीलन भरे कमरे की खिड़की पर बैठी अंकिता फोन की स्क्रीन को एकटक देख रही थी, जहां बैंक का खाली बैलेंस मानो उसकी बेबसी का मज़ाक उड़ा रहा था। पटना के बोरिंग रोड स्थित एक सरकारी संविदा परियोजना में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी लगे उसे पूरे तीन महीने हो … Read more

दहलीज से परे का अपनापन

विदाई के समय बजने वाली शहनाई की धुन जैसे-जैसे कानों से ओझल हो रही थी, वैसे-वैसे मन में अजीब सी उथल-पुथल तेज होती जा रही थी। फूलों से सजी कार चंडीगढ़ की चौड़ी और शांत सड़कों पर सरसराती हुई आगे बढ़ रही थी। लाल सुर्ख जोड़े में लिपटी हुई तन्वी ने अपनी भीगी पलकें उठाईं … Read more

साझी छत, साझा सुकून

 “भाभी, चुपचाप खड़े क्या देख रही हैं? खाइए भी! थोड़ा नमक ज़्यादा हो सकता है, पर भैया कह रहे थे कि पराठे एकदम क्रिस्पी बने हैं,” कुणाल ने हंसते हुए प्लेट टेबल पर रख दी। स्वाति की आंखों से आंसू छलक आए, लेकिन इस बार ये आंसू अपमान या गुस्से के नहीं थे। यह एक … Read more

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