कुणाल, नितिन और गौरव ने आगे बढ़कर अपनी रोती हुई दीदी को सहारा दिया। कुणाल ने सरिता के सिर पर हाथ रखकर भरे मन से कहा, “दीदी, भैया शरीर से भले ही चले गए हों, पर उनका प्यार और उनका दिया वचन कभी नहीं मरेगा। उन्होंने हमें सिखाया कि रिश्ते सिर्फ़ ख़ून से नहीं, आत्मा से निभाए जाते हैं। आज से आप खुद को कभी अकेला मत समझना। आपके इस भाई अमित का साया हमेशा आपके साथ रहेगा, और जब तक हम तीनों ज़िंदा हैं, आपको कभी किसी भाई की कमी महसूस नहीं होने देंगे।”
घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों और गेंदे के फूलों से बना तोरण हवा के झोंकों के साथ हौले-हौले डोल रहा था। आँगन में चारों तरफ़ हँसी-ठिठोली, चूड़ियों की खनक और शादी के पारम्परिक गीतों की आवाज़ें गूँज रही थीं। आज सरिता की लाडली बेटी अवंतिका का विवाह था। बेटी की शादी किसी भी माँ के जीवन का सबसे बड़ा सपना होती है, और सरिता ने भी इस दिन के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी में ढेरों अरमान संजोए थे।
सरिता अपने मायके की तरफ़ से आने वाले नेग और रस्म की तैयारियों में व्यस्त थी। हमारे समाज में ‘मायरा’ यानी ‘भात’ केवल एक रस्म नहीं होती, बल्कि यह एक बहन के मान-सम्मान, उसके मायके के प्यार और भाई के अटूट स्नेह का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। जब भाई अपनी बहन के ससुराल वालों के सामने खड़े होकर अपनी भांजी के विवाह में अपने सामर्थ्य से बढ़कर उपहार और आदर भेंट करता है, तो बहन का सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है।
सरिता का केवल एक ही भाई था—अमित। अमित उम्र में सरिता से बड़ा था, पर दोनों के बीच का रिश्ता केवल भाई-बहन का नहीं, बल्कि एक संरक्षक और सखा जैसा था। जब सरिता शादी का पहला कार्ड लेकर अमित के पास गई थी, तो अमित की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए थे। उसने अपनी बहन के सिर पर हाथ रखकर कहा था, “तू देखना बहना, अवंतिका मेरी भी तो पहली औलाद जैसी है। उसकी शादी में तेरा यह भाई ऐसा भात भरेगा कि पूरा ससुराल देखता रह जाएगा। तेरे मान में कोई कमी नहीं आने दूँगा।”
पर होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। शादी से ठीक दस दिन पहले अचानक मौसम बदला और अमित को तेज़ बुखार और सीने में भारी संक्रमण ने घेर लिया। डॉक्टरों ने फेफड़ों में गंभीर संक्रमण बताकर उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दी। जब सरिता को यह पता चला तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। उसने अमित से मिलने की बहुत ज़िद की, पर अमित ने फ़ोन पर ही अपनी आवाज़ को पूरा दम लगाकर सामान्य बनाते हुए कहा था, “मेरी गुड़िया, तू शादी की तैयारियाँ देख। अस्पताल के चक्कर काटेगी तो अवंतिका के काम कौन संभालेगा? डॉक्टरों ने मुझे कुछ दिन आराम करने को कहा है। तू चिंता बिल्कुल मत कर, दवाइयों का असर हो रहा है। मैं शादी के दिन समय पर मंडप में पहुँचूँगा और अपना वचन पूरा करूँगा।”
सरिता को अपने भाई की बातों पर भरोसा था। भाई ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा था, तो आज कैसे छोड़ता?
आज वही दिन था। मंडप में भात की रस्म का समय हो चुका था। ससुराल पक्ष की महिलाएँ अच्छे-अच्छे लिबास पहने आँगन में बैठ चुकी थीं। सरिता के हाथ में पीतल की सुंदर आरती की थाली थी, जिसमें रोली, अक्षत, कलावा, ताज़े पीले फूल और घी का एक दीपक जल रहा था। वह घर की देहरी पर खड़ी होकर बार-बार मुख्य द्वार की तरफ़ देख रही थी। हर गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ पर उसकी नज़रें चौखट की ओर दौड़ जाती थीं।
तभी गेट के बाहर एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। सरिता की आँखों में उम्मीद की चमक दौड़ गई। पर गाड़ी का दरवाज़ा खुला तो उसमें से अमित नहीं, बल्कि अमित का सबसे करीबी मित्र कुणाल बाहर निकला। कुणाल के पीछे उसके दो और साथी—नितिन और गौरव भी थे। तीनों के हाथों में बड़े-बड़े सूटकेस, मिठाइयों के डिब्बे और उपहारों से भरे बड़े थैले थे।
कुणाल के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और आँखों में गहरा संकोच था। वह धीरे-धीरे कदमों से आगे बढ़ा और सरिता के सामने आकर हाथ जोड़ लिए। “दीदी… सादर प्रणाम।”
सरिता ने चारों तरफ़ देखा, गाड़ी के पिछले हिस्से को निहारा, पर वहाँ अमित नहीं था। उसका दिल ज़ोर से धड़का। उसने बेचैनी से पूछा, “कुणाल भाई… तुम सब आए हो, पर अमित भैया कहाँ हैं? वे गाड़ी में बैठे हैं क्या? उनकी तबीयत अब कैसी है?”
कुणाल ने अपनी नज़रें ज़मीन पर टिका दीं और भारी आवाज़ में बोला, “दीदी, भैया की तबीयत कल रात अचानक थोड़ी ज़्यादा नासाज़ हो गई थी। डॉक्टरों ने उन्हें बिल्कुल बेड रेस्ट के लिए कहा है और बाहर निकलने की सख़्त मनाही कर दी है। भैया बहुत उदास थे, पर उन्होंने हमें भेजा है। उन्होंने कहा कि भात की रस्म में एक पल की भी देरी नहीं होनी चाहिए, इसलिए हम सारा सामान लेकर पहुँचे हैं।”
सरिता का चेहरा पीला पड़ गया। उसने कहा, “पर कल शाम को ही तो मेरी भैया से बात हुई थी। उन्होंने तो कहा था कि वे सुबह पहली गाड़ी से निकलेंगे। उन्होंने कहा था कि भले ही दस मिनट के लिए आऊँ, पर अपनी भांजी का कन्यादान और भात खुद देखूँगा। फिर अचानक क्या हो गया कुणाल? मेरा दिल बहुत घबरा रहा है। मुझे सच बताओ, भैया ठीक तो हैं ना?”
कुणाल ने अपने भीतर उठ रहे तूफ़ान को बड़ी मुश्किल से छुपाया और चेहरे पर एक ज़बरदस्ती की मुस्कान लाते हुए बोला, “अरे दीदी, आप इतनी शुभ घड़ी में मन छोटा क्यों कर रही हैं? भैया बिल्कुल ठीक हैं, बस डॉक्टरों की निगरानी में हैं। उन्होंने हमसे साफ़ कहा था कि अगर बहन की आँखों में एक भी बूँद आँसू आया तो वे नाराज़ हो जाएँगे। और दीदी, भले ही हम अमित भैया के दोस्त हैं, पर आपके लिए तो हम भी भाई जैसे ही हैं ना? क्या आप अपने इस भाई से भात नहीं स्वीकार करेंगी?”
कुणाल की इस आत्मीय बात से वहाँ खड़े रिश्तेदारों ने भी सरिता को समझाया कि समय बीत रहा है और शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है। सरिता ने भारी मन से सिर हिलाया। उसने भाई के दोस्तों का स्वागत करने के लिए आरती की थाली आगे बढ़ाई।
जैसे ही उसने आरती घुमाने के लिए हाथ उठाया, थाली में रखा घी का दीपक अचानक बिना किसी हवा के बुझ गया।
सरिता का हाथ वहीं का वहीं रुक गया। उसने तुरंत माचिस की तीली जलाई और दीपक को दोबारा प्रज्वलित किया। पर जैसे ही वह कुणाल के माथे पर तिलक लगाने बढ़ी, दीया एक बार फिर बुझ गया। इस बार उसके हाथ ज़ोर-ज़ोर से कांपने लगे। उसका अंतर्मन किसी अनजानी, गहरी अनहोनी के खौफ से भर गया। कंपकंपाहट इतनी बढ़ गई कि उसके हाथ से वह भारी पीतल की थाली छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। रोली बिखर गई, फूल फर्श पर फैल गए और थाली की खनक से पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया।
ससुराल की कुछ बुजुर्ग औरतें दबी ज़बान में कहने लगीं, “अरे, शुभ काम में थाली गिरना अच्छा शगुन नहीं होता।”
कुणाल ने एक पल भी गँवाए बिना तुरंत झुककर थाली उठाई। उसने बिखर चुके फूलों को समेटा और एक साफ़ रुमाल से थाली पोंछकर दोबारा उसमें अक्षत और रोली सजा दी। उसने सरिता के कांपते हाथों को बड़े प्यार और आदर से थामते हुए कहा, “दीदी, अपशकुन बर्तनों के गिरने से नहीं, मन के डगमगाने से होता है। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। आपके भाई का आशीर्वाद इस पूरे घर पर छाया हुआ है। आप बस बिना किसी वहम के तिलक कीजिए।”
सरिता ने भरे गले से, गीली आँखों के साथ कुणाल, नितिन और गौरव का तिलक किया। इसके बाद कुणाल और उसके साथियों ने जो किया, उसने पूरे विवाह समारोह को स्तब्ध कर दिया।
तीनों दोस्तों ने बड़े-बड़े बक्से खोले। उन्होंने अवंतिका के लिए शुद्ध सोने का हार, कंगन और पायजेब थाल में सजाए। सरिता के लिए रेशमी बनारसी साड़ियाँ, उसके पति के लिए वस्त्र और ससुराल के हर एक सदस्य—चाहे वह सास-ससुर हों, जेठ-जेठानी हों या ननद—सभी के लिए मान-सम्मान के साथ महंगे वस्त्र, चाँदी के सिक्के और नकद राशि के लिफ़ाफ़े भेंट किए। उपहारों का अंबार लग गया था। गाँव और ससुराल के लोग अमित के इस बड़प्पन और दरियादिली की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। हर कोई कह रहा था कि भाई हो तो ऐसा, जिसने खुद अस्वस्थ होते हुए भी बहन के मान को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया।
भात की रस्म के बाद विवाह की बाकी रस्में शुरू हुईं। कुणाल और उसके दोनों साथी एक पल के लिए भी नहीं बैठे। मंडप में जहाँ भी मामा की ज़रूरत पड़ी, वे तीनों मामा का फ़र्ज़ निभाते रहे। अवंतिका के पैरों में बिछिया पहनाने से लेकर फेरों के समय लाजा होम (धान का लावा डालने) की रस्म तक, तीनों दोस्तों ने हर वह रस्म पूरी निष्ठा से निभाई जो एक सगे भाई को निभानी चाहिए थी।
रात ढल चुकी थी। भोर की पहली किरण के साथ अवंतिका की विदाई का समय आ गया। अवंतिका अपनी माँ के गले लगकर रो रही थी। सरिता ने अपनी बेटी को विदा किया। विदाई के बाद जब मेहमान धीरे-धीरे विदा होने लगे, तो कुणाल और उसके साथी भी हाथ जोड़कर जाने की आज्ञा माँगने लगे।
सरिता उनके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखें लाल थीं। उसने रुंधे हुए गले से कहा, “कुणाल भाई, तुमने और तुम्हारे दोस्तों ने जो आज किया, उसका कर्ज़ मैं सात जन्मों में भी नहीं चुका सकती। तुमने मेरे भाई की कमी महसूस नहीं होने दी। पर अब मुझसे और सब्र नहीं होता। मेरा कलेजा फटा जा रहा है। शादी की सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो चुकी हैं। अब मुझे रोको मत, मैं अभी इसी गाड़ी में तुम्हारे साथ अस्पताल चलूँगी। मुझे अपने भैया को देखना है। जब तक मैं अपनी आँखों से उन्हें देख नहीं लूँगी, मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।”
यह सुनते ही कुणाल की आँखों के बाँध टूट गए। वह नौजवान, जो रातभर चट्टान की तरह खड़ा होकर सारे इंतज़ाम देख रहा था, अचानक फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने सरिता के दोनों हाथ पकड़ लिए और ज़मीन पर बैठ गया।
“दीदी… मुझे माफ़ कर दीजिए। भैया ने मुझसे वचन लिया था कि जब तक अवंतिका की डोली विदा न हो जाए, आपकी आँखों में आँसू की एक बूँद भी नहीं आनी चाहिए… पर अब मैं यह बोझ और नहीं सह सकता।” कुणाल हिचकियों के बीच बोला।
सरिता का पूरा शरीर पत्थर की तरह सुन्न हो गया। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा, “कुणाल… तू क्या कह रहा है? मेरे भैया कहाँ हैं?”
कुणाल ने हाथ जोड़कर, कांपती आवाज़ में सच उगल दिया, “दीदी… भैया अब इस दुनिया में नहीं रहे। कल दोपहर ही उन्होंने अस्पताल के आईसीयू में अपनी आख़िरी साँस ली थी।”
यह सुनते ही ऐसा लगा मानो सरिता के पैरों के नीचे की पूरी ज़मीन धंस गई हो। उसके कानों में तेज़ सीटी जैसी आवाज़ गूँजने लगी। आँगन में मौजूद जो भी रिश्तेदार यह सुन रहे थे, उनके मुँह से चीख निकल गई।
कुणाल आँसू बहाते हुए कहने लगा, “दीदी, कल जब आपकी भैया से फ़ोन पर बात हुई थी, उस समय वे वेंटिलेटर पर जाने वाले थे। उनके फेफड़े नब्बे प्रतिशत ख़राब हो चुके थे। वे असहनीय पीड़ा में थे, पर उन्होंने डॉक्टरों से विनती करके पाँच मिनट के लिए ऑक्सीजन मास्क हटवाया ताकि वे आपसे बात कर सकें। उन्होंने आपसे झूठ कहा कि वे ठीक हैं, सिर्फ़ इसलिए ताकि आपकी बेटी की शादी में कोई मातम न छाए, कोई विघ्न न पड़े।”
कुणाल ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और आगे कहा, “अंतिम साँस लेने से ठीक पहले भैया ने मेरा हाथ पकड़ा था। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने कहा था, ‘कुणाल, मेरी बहन ने अपनी ज़िंदगी में बहुत संघर्ष देखे हैं। उसकी बेटी की शादी उसके जीवन का सबसे बड़ा सपना है। अगर उसे पता चला कि मैं नहीं रहा, तो मंडप में खुशियों की जगह मातम फैल जाएगा। मेरी भांजी की शादी रुक जाएगी। तुझे मेरी कसम है मेरे यार, मेरी मौत की ख़बर तब तक सरिता तक नहीं पहुँचेगी जब तक अवंतिका ससुराल के लिए विदा न हो जाए। और जो भात मैंने अपनी भांजी के लिए तैयार करके रखा है, वह इज़्ज़त के साथ मंडप में पहुँचना चाहिए।’ दीदी, भैया ने जाते-जाते यह भी कहा था कि आज तक सरिता का एक भाई था, पर मेरे जाने के बाद तू और तेरे दोस्त हमेशा उसकी ढाल बनकर खड़े रहना।”
सरिता बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़ी। वह छाती पीट-पीट कर रोने लगी, “भैया… रे मेरे भैया! तूने यह क्या किया? अपनी जान देकर भी तू मेरा मान बढ़ाता रहा? मुझे तो भगवान ने पहले ही संकेत दे दिया था… वह बुझता हुआ दीपक, वह गिरती हुई थाली… वह कोई अपशकुन नहीं था, वह तो तेरी रूह मुझसे आख़िरी बार मिलने आई थी! तू मुझे अलविदा कहने आया था और मैं अभागन समझ ही नहीं पाई!”
पूरे आँगन में कोहराम मच गया। सरिता के ससुराल वाले, जो अब तक केवल उपहारों की चमक देख रहे थे, वे सब हाथ जोड़कर रोने लगे। एक भाई का अपनी बहन के प्रति ऐसा अगाध प्रेम और अपने फ़र्ज़ के प्रति ऐसा आत्मबलिदान किसी ने अपने पूरे जीवन में न कभी सुना था, न देखा था।
कुणाल, नितिन और गौरव ने आगे बढ़कर अपनी रोती हुई दीदी को सहारा दिया। कुणाल ने सरिता के सिर पर हाथ रखकर भरे मन से कहा, “दीदी, भैया शरीर से भले ही चले गए हों, पर उनका प्यार और उनका दिया वचन कभी नहीं मरेगा। उन्होंने हमें सिखाया कि रिश्ते सिर्फ़ ख़ून से नहीं, आत्मा से निभाए जाते हैं। आज से आप खुद को कभी अकेला मत समझना। आपके इस भाई अमित का साया हमेशा आपके साथ रहेगा, और जब तक हम तीनों ज़िंदा हैं, आपको कभी किसी भाई की कमी महसूस नहीं होने देंगे।”
सरिता के पति और ससुराल के सभी बड़े-बुज़ुर्गों ने आगे आकर उन तीनों युवाओं को गले से लगा लिया। उस आँगन में केवल शोक नहीं था, बल्कि इंसानियत, सच्ची मित्रता और भाई-बहन के उस पावन रिश्ते के प्रति एक गहरी श्रद्धा भी थी, जिसने मृत्यु की सीमाओं को भी लांघ दिया था।
सरिता ने अपने आँसू पोंछे और अपने भाई की उस अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए खुद को संभाला। वह अपने भाई के अंतिम दर्शन के लिए रवाना हुई। उसकी आँखों में भाई को खोने का असहनीय दर्द तो था, पर साथ ही अपने भाई के उस अमर प्रेम और उसके दिए वचनों पर एक ऐसा अटूट गर्व भी था, जो ज़िंदगी भर उसकी आत्मा को संबल देने वाला था।
अमित ने संसार छोड़ते-छोड़ते भी यह साबित कर दिया था कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने प्रियजनों के सम्मान और उनकी खुशियों के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने का नाम है।
दोस्तों, क्या आज के इस दौर में जहाँ ज़रा-ज़रा सी ज़मीन और पैसों के लिए भाई-बहन के रिश्ते बिखर जाते हैं, वहाँ अमित जैसा निःस्वार्थ भाई और कुणाल जैसे सच्चे दोस्त मिलना संभव है? एक भाई के इस त्याग और दोस्तों के इस फ़र्ज़ पर आपकी क्या राय है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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मूल लेखिका : बीना शर्मा