यह सुनते ही प्रभा देवी का सालों पुराना कठोर आवरण मोम की तरह पिघलने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे कभी वे दोनों देवरानी-जेठानी एक साथ बैठकर त्योहारों की तैयारियां किया करती थीं। अंकिता ने कुछ देर इधर-उधर की प्यारी बातें कीं और फिर चलने की इजाजत मांगते हुए बोली, “चाची जी, बड़ी माँजी ने कहा है कि कल शाम की आरती में अगर आप हमारे हिस्से में आएंगी, तो उन्हें बहुत खुशी होगी। वे आपका इंतजार करेंगी।”
आँगन में लगी तुलसी के पास खड़ी मानसी बार-बार पहली मंजिल की बालकनी की ओर देख रही थी और अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर उंगली थपथपा रही थी। आखिरकार जब उससे सब्र नहीं हुआ, तो उसने नीचे से ही आवाज लगाई, “अंकिता दीदी, अब आ भी जाइए! अगर आपने आईने के सामने पांच मिनट और बिताए, तो सराफा बाजार की सारी अच्छी साड़ियां बिक जाएंगी और हम बस दुकानों के शटर देखकर वापस आ जाएंगे!”
ऊपर कमरे की खिड़की से अंकिता ने झांकते हुए अपने कान का झुमका पहना और हंसकर बोली, “अरे मेरी तूफानी एक्सप्रेस, बस दो मिनट! दुपट्टे में पिन लगा रही हूं, अभी नीचे आई।”
मानसी ने कमर पर हाथ रखकर मुंह बनाया और रसोई में काम कर रहीं अपनी बड़ी मम्मी यानी अंकिता की मां सरला जी के पास जाकर बोली, “बड़ी मम्मी, देख लीजिए अपनी लाडली बेटी को। मुझसे कहा था कि दस बजे तक तैयार हो जाना, और खुद अभी तक मेकअप की दुकान समेट रही हैं। मुझे तो लगता है कि इनकी बारात भी दरवाजे पर आकर दो घंटे इंतजार ही करेगी।”
सरला जी ने कड़ाही में करछी चलाते हुए स्नेह से मानसी के गाल पर आटे की चुटकी लगा दी और हंसते हुए बोलीं, “तू भी न मानसी, जब तक अपनी दीदी की टांग न खींच ले, तेरा हाजमा दुरुस्त नहीं होता। जा, देख वो सीढ़ियों से उतर रही है।”
अंकिता और मानसी सगी बहनें नहीं थीं, बल्कि चचेरी बहनें थीं, लेकिन उन दोनों के बीच का प्रेम किसी सगी बहनों से भी बढ़कर था। अंकिता बड़े भाई आलोक जी की बेटी थी और मानसी छोटे भाई विनोद जी की। एक ही छत के नीचे, एक ही आँगन में खेलते-कूदते दोनों कब बड़ी हो गईं, पता ही नहीं चला। अंकिता स्वभाव से जितनी शांत, सुलझी हुई और धैर्यवान थी, मानसी उतनी ही चंचल, हाजिरजवाब और चहकने वाली। दोनों के स्वभाव का यही अंतर उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाता था। एक को चोट लगती तो दर्द दूसरी की आंखों में छलक आता। बिना एक-दूसरे की सलाह के वे अपने लिए एक रुमाल तक नहीं खरीदती थीं।
दोनों बहनें हंसती-खिलखिलाती बाजार गईं और दोपहर ढलने तक हाथों में ढेर सारे थैले लटकाए वापस लौटीं। जब वे घर के मुख्य द्वार से अंदर दाखिल हुईं, तो बरामदे में अंकिता के पिता आलोक जी और मानसी के पिता विनोद जी चाय की चुस्कियां ले रहे थे। दोनों को एक साथ पसीने से तरबतर लेकिन चेहरे पर मुस्कान लिए आते देख आलोक जी ने स्नेह से कहा, “लो भाई विनोद, आ गई हमारी घर की रौनक। क्यों भई, आज इंदौर का कौन सा कोना लूट कर आ रही है यह राम-लखन की जोड़ी?”
अंकिता ने थैले मेज पर रखते हुए कहा, “पापा, कुछ खास नहीं, बस चाचा जी ने जो पैसे दिए थे उनका सही इस्तेमाल करके आए हैं।”
विनोद जी ने अपनी भतीजी के सिर पर हाथ फेरते हुए बड़े भाई से कहा, “भैया, इन दोनों का बस चले तो ये साए की तरह एक-दूसरे से चिपकी रहें। मुझे तो कभी-कभी चिंता होती है कि जब इनकी विदाई होगी, तो ये अलग-अलग घरों में कैसे रहेंगी? मेरा तो मन करता है कि कोई ऐसा घर ढूंढें जहां दोनों की डोली एक साथ ही उठे।”
मानसी ने तुरंत चहकते हुए कहा, “वाह पापा, आपके मुंह में घी-शक्कर! अगर ऐसा हो जाए तो ससुराल में भी हमारी ही सरकार चलेगी। क्यों अंकिता दीदी?”
अंकिता ने शर्म से आंखें झुका लीं और मानसी की बांह पर हल्की सी चपत लगाते हुए उसे अंदर खींच ले गई, जबकि पीछे बैठे दोनों भाई और उनकी पत्नियां अपनी बेटियों की इस मासूम ख्वाहिश पर मुस्कुरा कर रह गए।
कहते हैं न कि कभी-कभी अनजाने में कही गई बात को ईश्वर तथास्तु कह देता है। कुछ ही महीनों बाद एक पारिवारिक परिचित के माध्यम से उज्जैन के एक प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी के परिवार से रिश्ता आया। जब कुंडलियां और परिवार की जानकारी साझा हुई, तो पता चला कि उस परिवार में भी दो चचेरे भाई विवाह योग्य हैं—प्रतीक और गौरव। प्रतीक शांत और गंभीर स्वभाव का था, जो अंकिता के लिए बिल्कुल उपयुक्त था, और गौरव हंसमुख और मिलनसार, जिसकी जोड़ी मानसी के साथ खूब जमती थी।
जब आलोक जी और विनोद जी उज्जैन जाकर लड़के और घर-परिवार देख आए, तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। हालांकि दोनों भाइयों के परिवार एक ही विशाल परिसर में अलग-अलग हिस्सों में रहते थे, लेकिन आलोक जी को लगा कि समय के साथ बड़े परिवारों में अपनी-अपनी व्यवस्था हो ही जाती है। सबसे बड़ी बात यह थी कि उनकी दोनों बेटियां एक ही आँगन में रहेंगी।
अंकिता और मानसी की खुशी का तो कोई पारावार ही नहीं था। दोनों रात-रात भर जागकर अपने भविष्य के सपने बुनतीं। “दीदी, हम शाम की चाय एक साथ पिया करेंगे, त्योहारों पर एक जैसी साड़ियां पहनेंगे और ससुराल में किसी को पता भी नहीं चलने देंगे कि हम देवरानी-जेठानी हैं, हम तो वहां भी बहनें ही बनकर रहेंगे,” मानसी की आंखों में चमक तैर जाती।
शुभ मुहूर्त देखकर तीन महीने के अंतराल पर दोनों की शादियां बड़ी धूमधाम से संपन्न हो गईं। पहले अंकिता की विदाई प्रतीक के साथ हुई, और फिर तीन महीने बाद मानसी भी गौरव की दुल्हन बनकर उसी आँगन में पहुंच गई।
लेकिन ससुराल की दहलीज पार करते ही दोनों बहनों का सामना एक ऐसी कड़वी सच्चाई से हुआ, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। उज्जैन की वह विशाल हवेली बीचों-बीच एक ऊंची ईंट की दीवार से दो हिस्सों में बंटी हुई थी। एक तरफ प्रतीक का परिवार रहता था, जहां उसकी मां शकुंतला देवी का शासन था, और दूसरी तरफ गौरव का परिवार, जहां उसकी मां प्रभा देवी की मर्जी चलती थी।
मानसी के आने के बाद जब उसने अंकिता से मिलने के लिए बीच के छोटे दरवाजे की कुंडी खोलनी चाही, तो पता चला कि उस दरवाजे पर वर्षों पुराना जंग लगा ताला लटका हुआ है। मानसी जब घूमकर मुख्य सड़क के रास्ते अंकिता के हिस्से में जाने लगी, तो उसकी सास प्रभा देवी ने उसे टोक दिया, “बहू, इस घर का एक नियम समझ लो। उस हिस्से के लोगों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। तुम्हारी वह बहन है, इसलिए कभी-कभार मायके में मिल लेना, लेकिन यहां रोज-रोज का आना-जाना हमें पसंद नहीं।”
उधर अंकिता को भी अपनी सास शकुंतला देवी से कुछ ऐसी ही नसीहत सुनने को मिली थी। दोनों बहनें अवाक और दुखी थीं। जिस आँगन में वे अपनी खुशियों की किलकारियां गूंजने का सपना देख रही थीं, वहां सन्नाटे और अजनबीपन का पहरा था।
कुछ दिनों बाद, एक दोपहर जब घर के पुरुष दुकान पर गए थे और सासें अपने-अपने कमरों में आराम कर रही थीं, तब अंकिता और मानसी छत की मुंडेर के पास मिलीं, जहां बीच की दीवार थोड़ी नीची थी। मानसी की आंखों में आंसू थे, “दीदी, यह कैसा परिवार है? एक ही खून है, एक ही छत है, फिर भी इतनी नफरत क्यों? हम तो साथ रहने आए थे, यहां तो एक-दूसरे की सूरत देखने के लिए भी सोचना पड़ रहा है।”
अंकिता ने अपनी छोटी बहन के आंसू पोंछे और गंभीर स्वर में कहा, “मानसी, मैंने प्रतीक से इस बारे में पूछा था। बात कोई बहुत बड़ी नहीं थी। आज से पांच साल पहले किसी पारिवारिक विवाह में लेन-देन और मान-सम्मान की एक छोटी सी गलतफहमी को लेकर दोनों सासों में बहस हो गई थी। तीसरे लोगों ने आग में घी डालने का काम किया और स्वाभिमान की आड़ में अहंकार इतना बड़ा हो गया कि दोनों परिवारों ने बीच में दीवार खड़ी कर ली। प्रतीक और गौरव दोनों ही इस बंटवारे से दुखी हैं, लेकिन अपनी-अपनी मांओं के गुस्से के आगे बेबस हैं।”
मानसी ने अपनी हथेली से आंखें रगड़ते हुए कहा, “तो क्या हम भी इसी तरह अजनबी बनकर जीएंगे दीदी?”
अंकिता के चेहरे पर एक शांत लेकिन दृढ़ मुस्कान उभरी। उसने मानसी का हाथ थामते हुए कहा, “बिल्कुल नहीं। हमारे पापा और चाचा जी ने हमें रिश्ते जोड़ना सिखाया है, तोड़ना नहीं। अगर गलतफहमी से दीवार खड़ी हो सकती है, तो प्यार और समझदारी से उसे गिराया भी जा सकता है। बस हमें थोड़ा धैर्य और थोड़ी सी चतुराई से काम लेना होगा। मैंने देखा है, बड़ी मां जब भी पूजा करती हैं, तो उनकी नजरें चुपके से उस बंद दरवाजे की तरफ उठ जाती हैं। दिल में कसक दोनों तरफ है, बस पहल कौन करे, इसी बात की अड़चन है।”
दोनों बहनों ने छत की उस मुंडेर पर खड़े होकर एक गुप्त योजना बनाई। वे जानती थीं कि सीधे तौर पर समझाने से बात बिगड़ सकती है, इसलिए उन्हें भावनाओं के उन तारों को छेड़ना था जो वर्षों से धूल फांक रहे थे।
कुछ दिनों बाद गणेश चतुर्थी का पर्व आया। अंकिता ने सुबह से ही रसोई में जाकर अपनी सास शकुंतला देवी की पसंद के बेसन के लड्डू और पूरनपोली बनाई। जब उसने भगवान को भोग लगाया, तो एक चांदी की कटोरी में अलग से लड्डू निकालकर रखे। शकुंतला देवी ने पूछा, “बहू, यह अलग से किसके लिए निकाल रही है?”
अंकिता ने पल्लू सिर पर ठीक करते हुए बड़े ही भोलेपन से कहा, “माँजी, मैंने सोचा त्योहार का दिन है। मैं इस घर की बड़ी बहू हूं, और हमारे मायके में सिखाया गया है कि किसी भी शुभ काम में घर के सभी बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए। अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं थोड़ी देर के लिए चाची सास के पैर छूकर उन्हें प्रसाद दे आऊं? मानसी से भी मिल लूंगी।”
शकुंतला देवी के चेहरे के भाव एकदम सख्त हो गए। “कोई जरूरत नहीं है वहां जाने की। उन्हें हमारी परवाह होती तो पांच साल में एक बार तो हाल पूछने आतीं।”
अंकिता ने धीरे से अपनी सास के कंधे पर हाथ रखा और कोमल स्वर में बोली, “माँजी, बड़प्पन तो हमेशा बड़ों के हिस्से ही आता है न। आप बड़ी हैं, आपके दिल की जगह कोई नहीं ले सकता। मैं तो बस आपकी तरफ से आपका बड़प्पन निभाने जा रही हूं। अगर आप मना करेंगी तो नहीं जाऊंगी, पर त्योहार के दिन मन में एक बोझ रह जाएगा।”
शकुंतला देवी ने अंकिता के शांत चेहरे की तरफ देखा। उनके भीतर की ममता और पुराने दिनों की याद ने एक करवट ली। उन्होंने मुंह फेरते हुए रूखे स्वर में कहा, “ठीक है, जाना है तो जा, पर पंद्रह मिनट में वापस आ जाना। और प्रतीक को भी साथ ले जा।”
अंकिता के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। उसने प्रतीक को इशारा किया और दोनों मिठाई का डिब्बा लेकर बगल वाले हिस्से के मुख्य द्वार पर पहुंचे। दरवाजे की घंटी बजी तो मानसी ने ही दरवाजा खोला। अपनी योजना के अनुसार मानसी ने जानबूझकर थोड़ी ऊंची आवाज में आश्चर्य जताया, “अरे अंकिता दीदी! जीजा जी! आइए, अंदर आइए।”
आवाज सुनकर प्रभा देवी अपने कमरे से बाहर निकलीं। प्रतीक और अंकिता को अपने आँगन में खड़ा देख उनके कदम वहीं ठिठक गए। चेहरे पर आश्चर्य और वर्षों का जमा हुआ संकोच एक साथ उभर आया। इससे पहले कि प्रभा देवी कुछ पूछतीं या कहतीं, अंकिता तेजी से आगे बढ़ी और उनके चरणों में झुक गई। प्रतीक ने भी अपनी चाची के पैर छुए।
प्रभा देवी के हाथ अपने आप आशीर्वाद के लिए उठ गए, “सदा सुखी रहो… अचानक यहां कैसे?”
अंकिता ने उठकर मिठाई का थाल मेज पर रखते हुए बड़ी विनम्रता से कहा, “चाची जी, आज त्योहार का दिन है। बड़ी माँजी सुबह से आपको बहुत याद कर रही थीं। उन्होंने खास तौर पर मुझे यह प्रसाद देकर भेजा है और कहा है कि जाकर अपनी चाची सास का आशीर्वाद लेकर आओ, उनके बिना मेरी पूजा अधूरी है।”
प्रभा देवी अवाक रह गईं। उनकी आंखों के कोने हल्के से नम हो गए। “जीजी ने… जीजी ने तुम्हें भेजा है?”
तभी मानसी ने भी मौके पर चौका लगाते हुए कहा, “और नहीं तो क्या माँजी! दीदी बता रही थीं कि बड़ी माँजी कह रही थीं कि प्रभा के हाथ की बनी खस्ता कचौड़ी खाए बिना तो मेरा त्योहार ही पूरा नहीं होता था, न जाने हमारे प्यार को किसकी नजर लग गई।”
यह सुनते ही प्रभा देवी का सालों पुराना कठोर आवरण मोम की तरह पिघलने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे कभी वे दोनों देवरानी-जेठानी एक साथ बैठकर त्योहारों की तैयारियां किया करती थीं। अंकिता ने कुछ देर इधर-उधर की प्यारी बातें कीं और फिर चलने की इजाजत मांगते हुए बोली, “चाची जी, बड़ी माँजी ने कहा है कि कल शाम की आरती में अगर आप हमारे हिस्से में आएंगी, तो उन्हें बहुत खुशी होगी। वे आपका इंतजार करेंगी।”
अंकिता और प्रतीक जब वापस लौटे, तो शकुंतला देवी आँगन में ही टहल रही थीं। उन्होंने ऊपर से बेपरवाही दिखाते हुए पूछा, “आ गई? क्या कहा तेरी चाची सास ने? मुंह तो सीधा ही नहीं हुआ होगा उसका।”
अंकिता ने अपनी सास के पास बैठकर उनके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “माँजी, आप तो खामखाह ही ऐसा सोचती हैं। चाची जी तो आपका नाम सुनते ही रो पड़ीं। कह रही थीं कि जीजी मेरी बड़ी बहन जैसी हैं, उनके बिना तो यह आँगन सूना लगता है। और तो और, यह भी कह रही थीं कि मुझसे जो भूल हुई हो, जीजी मुझे अपने पैरों में बिठाकर डांट लें, पर मुझसे यूं बात करना बंद न करें।”
शकुंतला देवी की आंखें फटी की फटी रह गईं। उनके गले में जैसे कुछ अटक गया। “सच में… प्रभा ऐसा कह रही थी? मुझे याद कर रही थी?”
“बिल्कुल सच माँजी,” अंकिता ने विश्वास दिलाते हुए कहा, “यहां तक कि वे तो कल आपसे मिलने आने की बात भी कर रही थीं, बस डर रही थीं कि कहीं आप नाराज न हो जाएं।”
उस रात दोनों हिस्सों में दो महिलाओं को नींद नहीं आई। दोनों के मन में बीते सालों की अच्छी यादें तैर रही थीं और अपने-अपने अहंकार पर पछतावा हो रहा था।
अगले दिन शाम को मानसी ने अपनी सास प्रभा देवी के सामने अपनी पूरी जिद रख दी। उसने रसोई में खड़े होकर कहा, “माँजी, मैंने आपकी पसंद की कचौड़ियां बना ली हैं। चलिए, अब जल्दी से अच्छी सी साड़ी पहन लीजिए, हमें बड़ी माँजी के यहां आरती में चलना है।”
प्रभा देवी झिझकने लगीं, “अरे बहू, ऐसे कैसे चली जाऊं? पांच साल हो गए उस दहलीज पर कदम रखे। पता नहीं जीजी का कैसा व्यवहार हो…”
मानसी ने अपनी सास का हाथ पकड़कर उन्हें कमरे में ले जाते हुए कहा, “माँजी, रिश्तों में जब तक कदम न बढ़ाओ, रास्ते नहीं खुलते। बड़ी माँजी वहां आपकी राह देख रही हैं। अगर आज आप नहीं गईं, तो वे समझेंगी कि आपके मन में अभी भी मैल है। चलिए, मैं कुछ नहीं सुनने वाली।”
मानसी और गौरव किसी तरह प्रभा देवी को मनाकर साथ ले ही आए। जब उन्होंने शकुंतला देवी के हिस्से में प्रवेश किया, तो अंकिता ने दरवाजे पर ही उनका स्वागत किया और खुशी से चहकते हुए आवाज लगाई, “माँजी, देखिए कौन आया है! चाची जी आई हैं!”
शकुंतला देवी पूजा घर से बाहर निकलीं। सामने प्रभा देवी को थाल लिए खड़ा देख उनके कदम रुक गए। पांच साल बाद दोनों आमने-सामने थीं। बालों में आई सफेदी और चेहरे की झुर्रियां बता रही थीं कि वक्त कितना गुजर गया था।
प्रभा देवी से और रुका नहीं गया। उन्होंने थाल मानसी को पकड़ाया और तेजी से आगे बढ़कर शकुंतला देवी के पैरों में झुक गईं। उनके मुंह से बस इतना ही निकला, “जीजी, मुझे माफ कर दो…”
शकुंतला देवी ने तड़प कर अपनी देवरानी को बांहों से पकड़कर उठाया और कसकर अपने सीने से लगा लिया। “पागल मत बन प्रभा, गलती सिर्फ तेरी नहीं थी, मेरी भी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी जो अपनी सगी से भी प्यारी बहन से मुंह मोड़ लिया।”
दोनों सासें एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ीं। उन आंसुओं में पांच साल की कड़वाहट, सन्नाटा और अहंकार सब कुछ बह गया। प्रतीक और गौरव की आंखें भी नम थीं, उन्होंने आगे बढ़कर दोनों मांओं का आशीर्वाद लिया।
थोड़ी ही देर बाद शकुंतला देवी ने प्रतीक से कहा, “बेटा, अभी के अभी मिस्त्री को बुला और आँगन के उस मनहूस दरवाजे का ताला तोड़ दे। आज के बाद इस घर में दो रसोई नहीं बनेंगी, मेरा परिवार एक है और एक ही रहेगा।”
एक कोने में खड़ी अंकिता और मानसी ने एक-दूसरे की तरफ देखा, आंखों ही आंखों में इशारा किया और मुस्कुराते हुए एक-दूसरे के गले लग गईं। उन दोनों बहनों के बचपन के प्यार और उनकी समझदारी ने न केवल उनके अपने सपने को सच कर दिखाया था, बल्कि दो बिछड़े हुए परिवारों को फिर से एक गुलदस्ते में पिरो दिया था।
कहते हैं कि बेटियां और बहुएं अगर ठान लें, तो वे किसी भी घर को स्वर्ग बना सकती हैं। थोड़ा सा धैर्य, मीठी वाणी और रिश्तों को सहेजने की चाहत बड़ी से बड़ी नफरत की दीवार को गिराने की ताकत रखती है।
क्या आपको भी लगता है कि परिवार में आने वाली नई पीढ़ी अपनी सूझबूझ से पुरानी से पुरानी रंजिशों को खत्म कर सकती है? आपको अंकिता और मानसी की यह समझदारी कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें।
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