अपनों की छांव

“खबरदार सार्थक! जो इसके आगे अपनी जुबान से एक भी शब्द और निकाला!” गायत्री देवी की आवाज में ऐसी कड़क थी कि वहां खड़े दोनों चाचा भी सन्न रह गए थे। “जिस परिवार के त्याग को तू आज झमेला और दलदल बता रहा है ना, उसी परिवार के छोटे चाचा ने अपनी जवानी के शौक मारकर तुझे महंगे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाया था। तेरी इन्हीं चाचियों ने अपने बच्चों के मुंह का निवाला काटकर तेरी हर जिद पूरी की थी ताकि तुझे कभी अपने बाप की कमी न खले। आज तेरे पर निकल आए हैं, तो तुझे यह आंगन पिंजरा लगने लगा? जा! अभी इसी वक्त अपनी तैयारी कर। तुझे इस घर से जाने से अब कोई नहीं रोकेगा। शायद मेरे ही संस्कारों में कोई खोट रह गई थी जो मैं तुझे डिग्रियां तो दिला सकी, पर अपनों की कीमत नहीं सिखा सकी।”

 आंगन के बाहर खड़े मिनी ट्रक में घर के एक हिस्से का सामान लद चुका था और ड्राइवर ने इंजन स्टार्ट कर दिया था।

“माँ, अब कितना वक्त लगाएंगी आप? सारा सामान ट्रक में सेट हो चुका है, वो लोग निकल भी गए हैं। हमें भी अब अपनी कार से निकलना होगा ताकि वहां पहुंचकर अनपैकिंग शुरू कर सकें,” सार्थक ने अपनी कलाई की घड़ी देखते हुए थोड़ी बेरुखी से कहा।

देहलीज पर खड़ीं गायत्री देवी ने अपनी भीगी पलकों को झपकाते हुए साड़ी के पल्लू से आंख का कोना पोंछा और रुंधे गले से बोलीं, “बस दो मिनट रुक जा बेटा… तेरी निर्मला चाची रसोई से दही और मिश्री की कटोरी लेकर आती ही होंगी। शगुन के बिना घर से कदम नहीं निकालते।”

सार्थक ने झुंझलाते हुए अपने माथे पर हाथ मारा, “उफ्फ माँ! आप भी किस जमाने की बातें करती हैं। मैं कोई सरहद पर तोप चलाने नहीं जा रहा हूं, इसी शहर के दूसरे कोने में बनी हाई-राइज सोसाइटी में शिफ्ट हो रहा हूं। और फिर अब मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं रहा, शादीशुदा हूं और कुछ महीनों में खुद एक बच्चे का बाप बनने वाला हूं। कम से कम अब तो ये दही-मिश्री के दकियानूसी टोटके बंद कीजिए।”

गायत्री देवी के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कांपते होठों से कहा, “वैसे तो तूने आज अपनी माँ की कोई बात रखी नहीं सार्थक, पर क्या जाते-जाते अपनी इस बूढ़ी माँ के मन की तसल्ली के लिए एक चम्मच दही भी नहीं खा सकता?”

“माँ, प्लीज! अब जाने के वक्त ये इमोशनल ड्रामा शुरू मत कीजिए। मैं सब समझता हूं कि इन सबके पीछे आपका मकसद क्या है,” सार्थक ने बिना अपनी माँ की आंखों में देखे अपना लैपटॉप बैग कंधे पर टांगा और तेजी से मुड़कर कार की ड्राइविंग सीट की तरफ बढ़ गया।

तभी पीछे से सार्थक की पत्नी नूपुर धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई आई। पांच महीने के गर्भ के कारण उसके चेहरे पर हल्की थकान थी, फिर भी उसने गायत्री देवी के चरण छूने के लिए झुकना चाहा। गायत्री देवी ने तुरंत आगे बढ़कर उसे कंधों से थाम लिया और बीच में ही रोकते हुए बोलीं, “रहने दे बहू, इस अवस्था में ज्यादा झुकना ठीक नहीं होता। मेरा आशीर्वाद तो हमेशा तेरे और तेरे आने वाले बच्चे के साथ है। बस जाते-जाते इतना ही कहूंगी कि अगर अब भी मन बदले, तो घर के दरवाजे खुले हैं। अपना और सार्थक का बहुत ध्यान रखना।”

नूपुर ने नजरें चुराते हुए हल्की सी गर्दन हिलाई और चुपचाप जाकर कार में बैठ गई। निर्मला चाची हाथ में चांदी की कटोरी लिए दौड़ती हुई बाहर आईं, लेकिन तब तक सार्थक की कार धूल उड़ाती हुई कोठी के लोहे के फाटक को पार कर चुकी थी। गायत्री देवी वहीं खंभे का सहारा लेकर खड़ी रह गईं और निर्मला ने आगे बढ़कर अपनी जेठानी को बांहों में संभाल लिया।

गायत्री देवी इस भरे-पूरे परिवार की नींव थीं। जब वे ब्याह कर इस कोठी में आई थीं, तब सास-ससुर का साया पहले ही उठ चुका था। उनके पति अनिरुद्ध जी घर के सबसे बड़े बेटे थे। अनिरुद्ध जी के दोनों छोटे भाइयों—मनोज और विवेक—को गायत्री देवी ने अपनी कोख से जाई संतान की तरह पाला था। उनकी तीन बेटियां हुईं और सबसे छोटा और इकलौता बेटा सार्थक था, जो पूरे खानदान की आंखों का तारा था। बेटियों की शादी अच्छे घरों में हो चुकी थी और वे अपने-अपने ससुराल में सुखी थीं।

दस साल पहले जब एक सड़क हादसे में अनिरुद्ध जी का असमय निधन हुआ, तो सबको लगा था कि यह संयुक्त परिवार बिखर जाएगा। लेकिन दोनों देवरों और देवरानियों—निर्मला और रंजना—ने गायत्री देवी को कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि उनके सिर से पति का साया उठ गया है। घर की तिजोरी की चाबी से लेकर हर बड़े फैसले तक, आज भी गायत्री देवी का शब्द ही अंतिम कानून होता था। पूरी कोठी में हंसी-ठिठोली, त्योहारों की रौनक और एकता की मिसाल दी जाती थी।

सार्थक इस दूसरी पीढ़ी में सबसे बड़ा था। उसकी शादी बड़े अरमानों से नूपुर के साथ हुई थी। शुरू में तो नूपुर भी इस बड़े परिवार के माहौल में घुलती-मिलती नजर आई, लेकिन जैसे ही चार महीने पहले उसके माँ बनने की खबर आई, उसके तेवर और सोच अचानक बदलने लगे।

अभी चार दिन पहले की ही तो बात थी, जब रात के खाने के बाद सार्थक ने आंगन में सबके सामने यह बम फोड़ा था कि उसने शहर के नए विकसित हो रहे इलाके में एक थ्री-बीएचके फ्लैट किराए पर ले लिया है और वह नूपुर के साथ वहीं शिफ्ट हो रहा है।

यह सुनते ही गायत्री देवी के तो पैरों तले से जमीन ही खिसक गई थी। उनका रक्तचाप अचानक बढ़ गया था और वे लड़खड़ा कर सोफे पर गिर पड़ी थीं। उस वक्त भी देवरानी निर्मला ने ही उनके हाथ-पैर मले थे और पानी पिलाया था। थोड़ा संभलने पर गायत्री देवी ने कांपती आवाज में पूछा था, “सार्थक, यह तू क्या कह रहा है बेटा? बहू का पांचवां महीना चल रहा है, ऐसे नाजुक वक्त में तो औरत को सयाने लोगों की देखरेख और सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। वहां अकेले बंद डिब्बे जैसे फ्लैट में तुम दोनों कैसे सब संभालोगे? यहां कोठी में चाचियां हैं, मैं हूं, तेरे चाचा हैं… पूरा परिवार हथेली पर छाले की तरह बहू को रखे हुए है।”

तब सार्थक ने जो जवाब दिया था, उसने गायत्री देवी की आत्मा तक को छलनी कर दिया था। सार्थक ने तल्ख लहजे में कहा था, “माँ, यही भीड़ तो सबसे बड़ी समस्या है! इतने सारे लोगों के बीच मेरे आने वाले बच्चे को वो पर्सनल स्पेस और आधुनिक माहौल कहां से मिलेगा जो हम उसे देना चाहते हैं? यहां कभी किसी रिश्तेदार का आना लगा रहता है, तो कभी किसी के रीति-रिवाज चलते रहते हैं। नूपुर को अपनी प्रेग्नेंसी में शांति और अपने हिसाब की डाइट चाहिए, न कि हर वक्त तीन-तीन सासों के पुराने नुस्खे। और सच कहूं माँ, तो मैं नहीं चाहता कि मेरी तरह मेरा बच्चा भी इस संयुक्त परिवार के ‘त्याग और समझौते’ के दलदल में फंसकर अपनी ख्वाहिशों का गला घोंटता रहे!”

“चटाक!”

एक जोरदार तमाचा सार्थक के गाल पर पड़ा था। पूरी कोठी की दीवारें उस गूंज से कांप उठी थीं। गायत्री देवी का हाथ हवा में कांप रहा था और उनकी आंखों से अंगारे बरस रहे थे।

“खबरदार सार्थक! जो इसके आगे अपनी जुबान से एक भी शब्द और निकाला!” गायत्री देवी की आवाज में ऐसी कड़क थी कि वहां खड़े दोनों चाचा भी सन्न रह गए थे। “जिस परिवार के त्याग को तू आज झमेला और दलदल बता रहा है ना, उसी परिवार के छोटे चाचा ने अपनी जवानी के शौक मारकर तुझे महंगे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाया था। तेरी इन्हीं चाचियों ने अपने बच्चों के मुंह का निवाला काटकर तेरी हर जिद पूरी की थी ताकि तुझे कभी अपने बाप की कमी न खले। आज तेरे पर निकल आए हैं, तो तुझे यह आंगन पिंजरा लगने लगा? जा! अभी इसी वक्त अपनी तैयारी कर। तुझे इस घर से जाने से अब कोई नहीं रोकेगा। शायद मेरे ही संस्कारों में कोई खोट रह गई थी जो मैं तुझे डिग्रियां तो दिला सकी, पर अपनों की कीमत नहीं सिखा सकी।”

उस रात के बाद से कोठी में किसी ने सार्थक को नहीं रोका था, और आज वह अपनी गृहस्थी समेटकर चला गया था।

शुरुआत के दो महीने सार्थक और नूपुर के लिए किसी हसीन सपने जैसे बीते। गगनचुंबी इमारत की बारहवीं मंजिल का वह आधुनिक फ्लैट बेहद खूबसूरत था। सुबह उठने का कोई बंधन नहीं, पूजा की घंटी की आवाज नहीं, और न ही किसी बड़े-बुजुर्ग की रोक-टोक। नूपुर सुबह देर तक सोती, ऑनलाइन ऐप्स से अपनी पसंद का विदेशी सलाद और सूप मंगवाती, और शाम को दोनों बालकनी में बैठकर कॉफी पीते हुए अपने आने वाले बच्चे के भविष्य के सुनहरे नक्शे बनाते। कामकाज के लिए उन्होंने एक मेड और एक कुक रख लिया था। सार्थक को लग रहा था कि उसका फैसला सौ फीसदी सही था।

लेकिन जिंदगी की असली परीक्षा तो तब शुरू होती है, जब सुविधाएं साथ छोड़ देती हैं और अनुभव की जरूरत पड़ती है।

नूपुर का आठवां महीना लग चुका था। उसका शरीर अब काफी भारी हो गया था और पैरों में सूजन रहने लगी थी। इधर सार्थक की कंपनी में एक बड़े प्रोजेक्ट का ऑडिट शुरू हो गया, जिसके चलते उसे देर रात तक ऑफिस में रुकना पड़ता था। धीरे-धीरे उस फ्लैट का सन्नाटा नूपुर को काटने को दौड़ने लगा।

एक दिन सुबह कुक ने फोन कर दिया कि वह चार दिन गांव जा रही है। सार्थक ने कहा कि बाहर से खाना आ जाएगा, पर गर्भवती नूपुर को रेस्टोरेंट के मसालेदार खाने से भयंकर एसिडिटी और उल्टियां होने लगीं। उस वक्त नूपुर को पहली बार निर्मला चाची के हाथ की बनी वो सादी लौकी की सब्जी और गायत्री माँ का बनाया हुआ अजवाइन का पानी याद आया, जो कोठी में बिना मांगे उसके सिरहाने पहुंच जाता था।

पर असली कयामत तो उस बारिश वाली काली रात को टूटी।

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और तेज हवाओं के कारण इलाके की बिजली गुल थी। रात के करीब डेढ़ बजे नूपुर को अचानक पेट के निचले हिस्से में भयानक मरोड़ उठी। दर्द इतना तीव्र था कि उसकी चीख निकल गई। सार्थक घबराकर नींद से जागा। नूपुर पसीने से तर-बतर थी और दर्द से बिस्तर पर तड़प रही थी।

“सार्थक… मुझे बहुत तेज दर्द हो रहा है… कुछ करो सार्थक, मेरी जान निकल रही है!” नूपुर ने सार्थक की बांह को अपनी उंगलियों से जकड़ते हुए कहा।

सार्थक के हाथ-पांव फूल गए। उसने कांपते हाथों से डॉक्टर को फोन लगाया, तो पता चला कि यह प्री-मेच्योर लेबर पेन हो सकता है और तुरंत अस्पताल लाना होगा। सार्थक ने एंबुलेंस के लिए फोन किया, लेकिन भारी जलभराव और ट्रैफिक जाम के कारण एंबुलेंस को आने में कम से कम एक घंटे का समय लगने वाला था।

सार्थक नूपुर को सहारा देकर फ्लैट के दरवाजे तक लाया। बाहर गैलरी में घुप्प अंधेरा था और पावर बैकअप में खराबी आने के कारण बारहवीं मंजिल की लिफ्ट बंद पड़ी थी। सार्थक ने पड़ोसियों के दरवाजे भड़भड़ाए—एक, दो, तीन… लेकिन उस आधुनिक सोसाइटी में किसी ने आधी रात को दरवाजा खोलना मुनासिब नहीं समझा। एक पड़ोसी ने सिर्फ खिड़की से झांककर कह दिया, “भाई साहब, मेरी तो कमर में दर्द है, मैं सीढ़ियों से नीचे उतारने में मदद नहीं कर पाऊंगा, आप गार्ड को बुला लीजिए।”

सार्थक जब नूपुर को वापस कमरे में लिटाकर नीचे गार्ड को बुलाने भागा, तो उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। नूपुर अकेले कमरे में दर्द से बिलख रही थी। उस पल सार्थक को अपने वो शब्द हथौड़े की तरह अपने सिर पर बजते महसूस हुए—“इतने लोगों में कहां कोई बच्चे का ध्यान अच्छे से रख पाएगा…” आज करोड़ों की उस इमारत में सैकड़ों फ्लैट थे, हजारों लोग रह रहे थे, लेकिन उसकी पत्नी और अजन्मे बच्चे को संभालने वाला एक भी हाथ वहां मौजूद नहीं था।

कांपती उंगलियों से सार्थक ने अपनी जेब से फोन निकाला और बिना एक पल गंवाए अपने छोटे चाचा विवेक का नंबर मिलाया। पहली ही घंटी पर फोन उठ गया।

“चाचा… चाचा, मैं सार्थक बोल रहा हूं… नूपुर की तबीयत बहुत खराब है, लिफ्ट बंद है, बाहर कोई मदद नहीं मिल रही… चाचा मुझे बचा लीजिए…” सार्थक फोन पर फूट-फूटकर बच्चों की तरह रो पड़ा।

उधर से विवेक चाचा की सधी हुई, मजबूत आवाज आई, “सार्थक, घबरा मत बेटा! तू बस नूपुर के पास रह, हम अभी निकल रहे हैं।”

महज बीस मिनट के भीतर, मूसलाधार बारिश को चीरती हुई कोठी की दोनों गाड़ियां सोसाइटी के गेट पर आकर रुकीं। विवेक चाचा और मनोज चाचा के साथ उनके दोनों जवान बेटे भी थे, जो बारह मंजिल की सीढ़ियां एक सांस में चढ़कर ऊपर पहुंचे। उनके पीछे-पीछे गायत्री देवी और दोनों चाचियां भी हांफती हुई ऊपर आ गईं।

कमरे में घुसते ही गायत्री देवी ने तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने घबराए हुए सार्थक को एक तरफ किया, नूपुर के माथे पर ठंडा कपड़ा रखा और अपने बैग से निकालकर उसे गर्म केसर वाला दूध पिलाया ताकि उसे ताकत मिले। निर्मला चाची ने तुरंत नूपुर के पैरों के तलवों में गर्म तेल की मालिश शुरू की। मां और चाचियों का वह अनुभवी स्पर्श पाते ही नूपुर की घबराहट आधी हो गई। वह गायत्री देवी के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी, “माँ जी… मुझे माफ कर दीजिए माँ जी…”

“अभी रोने का वक्त नहीं है मेरी बच्ची, तेरी सास और तेरी चाचियां तेरे पास हैं, तुझे और हमारे बच्चे को कुछ नहीं होगा,” गायत्री देवी ने उसके आंसू पोंछते हुए हिम्मत बंधाई।

फिर दोनों चाचाओं और चचेरे भाइयों ने मिलकर एक मजबूत आरामकुर्सी पर नूपुर को बिठाया और उसे हाथों में उठाकर बारह मंजिल की सीढ़ियां बड़े सुरक्षित तरीके से नीचे उतारीं। सार्थक पीछे-पीछे सामान का बैग लिए चल रहा था और उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। जिन चाचाओं और भाइयों के प्यार को उसने ‘झमेला’ कहा था, आज वही लोग उसके बच्चे और पत्नी की ढाल बनकर अंधेरी रात में खड़े थे।

अस्पताल पहुंचने के दो घंटे बाद ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती बुझी और डॉक्टर ने बाहर आकर मुस्कुराते हुए कहा, “बधाई हो! सही वक्त पर ले आए आप लोग, वरना थोड़ी भी देर होती तो मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता था। बहुत प्यारा बेटा हुआ है।”

पूरे कॉरिडोर में खुशी की लहर दौड़ गई। चाचाओं ने एक-दूसरे को गले लगा लिया और चाचियों ने तुरंत अपने पर्स से पैसे निकालकर नर्सों को नेग बांटना शुरू कर दिया।

गायत्री देवी जब भगवान को हाथ जोड़कर धन्यवाद दे रही थीं, तभी उन्हें अपने पैरों पर किसी के गर्म आंसुओं का स्पर्श महसूस हुआ। उन्होंने नीचे देखा—सार्थक घुटनों के बल बैठकर उनके दोनों पैरों को पकड़कर हिचकियां ले-लेकर रो रहा था।

“माँ… मुझे माफ कर दो माँ! उस दिन आपने मुझे सिर्फ एक थप्पड़ मारा था, आपको तो मुझे जूते से मारना चाहिए था। मैं पैसे और आधुनिकता के घमंड में अंधा हो गया था माँ। मुझे लगा था कि पैसे से हर सुविधा खरीदी जा सकती है, पर आज समझ आया कि संकट के समय काम आने वाला प्यार, अनुभव और अपनों का निस्वार्थ साथ दुनिया के किसी बाजार में नहीं बिकता। अगर आज आप लोग नहीं आते, तो मैं सब कुछ खो देता माँ… मेरा घमंड टूट गया है माँ, मुझे वापस अपने आंगन में ले चलो।”

गायत्री देवी का कलेजा पसीज गया। आखिर मां तो मां होती है, संतान की लाख भूलों के बाद भी उसकी एक पुकार पर अपना सर्वस्व लुटा देती है। उन्होंने झुककर सार्थक को कंधों से उठाया और अपने सीने से चिपका लिया।

“बस कर पगले, सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। ठोकर खाकर ही इंसान को छांव की कद्र समझ आती है,” गायत्री देवी ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब कार निकली, तो उसका रुख उस किराए के फ्लैट की तरफ नहीं, बल्कि अपनी उसी पुरानी पुश्तैनी कोठी की तरफ था। कोठी के द्वार पर पहुंचते ही निर्मला और रंजना चाची ने फूलों की थाली और आरती से नन्हे मेहमान और नूपुर का स्वागत किया।

नूपुर ने जब अपने बेटे को गायत्री देवी की गोद में सौंपा, तो उसने कान पकड़ते हुए कहा, “माँ जी, अब मेरा बेटा किसी बंद फ्लैट की घुटन में नहीं, बल्कि अपने दादा-दादी, चाचा-चाची के संस्कारों और इस भरे-पूरे आंगन की छांव में ही बड़ा होगा।”

पूरी कोठी एक बार फिर ठहाकों और किलकारियों से गूंज उठी। सार्थक ने आंगन के उस विशाल नीम के पेड़ की तरफ देखा, जिसकी जड़ें जमीन में बेहद गहरी थीं—ठीक उसके संयुक्त परिवार की तरह, जो हर आंधी-तूफान को झेलकर भी अपने अपनों को महफूज रखना जानता था।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में युवा पीढ़ी अक्सर आजादी और निजता (प्राइवेसी) के नाम पर संयुक्त परिवार से अलग होने का फैसला तो कर लेती है, लेकिन मुसीबत के वक्त अपनों के अनुभव और साथ की कमी उन्हें खलती ही है। क्या आपके विचार में भी बच्चों के सही विकास और सुरक्षित भविष्य के लिए दादा-दादी और संयुक्त परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत होता है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

error: Content is protected !!