दादी की सीख –  मधु शुक्ला

अनुपमा की आदत थी। जब उसकी कोई फरमाइश माँ नहीं सुनतीं थीं। तो वह दादी से सिफारिश करवाती थी। तीन भाइयों मे सबसे छोटी थी वह, और कुटुम्ब की इकलौती लाड़ली बिटिया थी। उसकी माँ को लगता था। सबसे ज्यादा लाड़ दुलार मिलने के कारण अनुपमा जिद्दी हो रही है। और मनमानी करने लगी है।जो … Read more

सही अर्थ – शालिनी गुप्ता

” पापा, मुझे अपनी बोर्ड की परीक्षा के बाद आगे पढ़ने के लिए विदेश जाना है”, नकुल अपने पापा शिव नारायण से बोला। ” पर बेटा, अपने देश में कितने अच्छे व प्रतिष्ठित संस्थान है जहां से तुम आगे की पढ़ाई अच्छे से कर सकते हो”, शिवनारायण अपने बेटे को समझाते हुए बोले। ” मुझे … Read more

रंगीन पेंसिलें – नताशा हर्ष गुरनानी

बेटे की शादी होने वाली है घर में ढेरों काम अभी बचे हैं पर मन मे इतनी खुशी है की समाएँ नहीं जाती। रोज रात में बैठकर समान लिखना, काम लिखना फिर दूसरे दिन वो काम निपटाना। मुझे रंगो से बहुत प्यार हैं, बहुत ज्यादा इसलिए मै ये सारे काम अपनी रंगीन पेंसिलो से लिखती … Read more

आखिर कब तक? – शालिनी गुप्ता

” सर आपसे रमेश जी मिलने आए हैं”, मेरे चपरासी विनोद ने आकर जब यह मुझसे कहा तब अजीब सा मन हो गया था मेरा लेकिन महज औपचारिकता के कारण मुझे उनसे मिलने बाहर आना पड़ा। ” बेटा, आप मुझे यहां देख कर अवश्य ही असमंजस में पड़ गए होंगे लेकिन क्या करूं? जब सुशीला … Read more

बड़का बिल्ला! – सारिका चौरसिया

संस्मरणों की दुनिया हठात् हमें हमारे अतीत के तरफ़ ले जाती है, जहां हमारे यादों के पिटारे में उम्र के भी दुगुनी-तिगुनी खट्टी-मीठी यादें और कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे से फ़साने करीने से तह लगा कर रखे होते हैं,, कुछ यादें रुला जाती हैं और कुछ हँसी और खिलखिलाहटों की सौगात बनी हस्तांतरित होती है। … Read more

अपना अपना दर्द – विनोद प्रसाद ‘विप्र’

पार्क में एक बेंच पर दो अनजान महिलाएं बैठी थी। पति से अनबन के कारण दोनों महिलाएं परेशान लग रही थी। दोनों के चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी। संकोचवश दोनों एक-दूसरे से बात नहीं कर रही थी। पर थोड़ी देर बाद ही पहली महिला ने पहल करते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू किया। … Read more

लगन – नताशा हर्ष गुरनानी

“पापा पापा आप ना मम्मा को कुछ कहते क्यो नहीं हमेशा मेरे साथ भेदभाव करती हैं। भैया के लिये हर चीज़ लेकर आती हैं और मेरे लिए कुछ नहीं”  “भैया के लिये सब कुछ और मेरे लिए कुछ भी नहीं” रोते रोते पीहू बोली “अरे अरे मेरी गुडिया रानी ऐसे रोते नही, पापा है ना, … Read more

ममतालय – सरला मेहता

 बड़े से मैदान में क्रिकेट खेल रही दो टीमें… ए में हैं मि पिल्लई का पदम, खान साहब का हमीद, भिसे जी का यश,देसाई जी की दिव्या, पॉल मेम का जॉन और चटर्जी बाबू की मौली। शेष बचे भजनसिंह दा बंटी, तिवारी जी का पंकज। इसी बीच बंटी ने ऐलान कर दिया, ” हाँ कुछ … Read more

जब दोस्त परिवार बन गया – भगवती सक्सेना गौड़

कुशाग्र बुद्धि का अमर जब कई वर्षों पहले डॉक्टरेट करने अमेरिका जा रहा था, श्याम चतुर्वेदी और उनकी पत्नी रमोला का बुरा हाल था। किसी तरह दोनो अपने हृदय को वश में कर रहे थे कि बच्चो को उन्नति के लिए बाहर जाना ही पड़ता है। उसके विदेश जाने के बाद रिटायर होकर दोनो अपने … Read more

दोहरे मापदंड – कमलेश राणा

बात जब भी मलिनता की आती है तो सबसे पहले कीचड़ की याद आती है जिसे छू लेने भर से साफ सुथरा दामन दागदार हो जाता है और जब शुचिता और पवित्रता का ध्यान आता है तो सबसे पहले कमल की याद आती है… कितना अजीब है न यह कि उसी कीचड़ में खिलकर भी … Read more

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