रणभेदी – रीमा ठाकुर
बड़े बड़े सरकंडे ‘घनी घास उसपर दलदल “ जाने कितनी देर और चलना होगाः ” इनके बीच “ नरकुल के पेड हल्की हवा के साथ ” झूम रहे थे! चांदनी रात चांद अपने सौदर्य से ” तारों के बीच मुस्कुरा रहा था! पूस का महिना ” पर आकाश बिना परवाह किये ” अपनी मंजिल … Read more