हमारे घर का चिराग़ हमारे ही आँगन में होगा – रश्मि प्रकाश

रागिनी को जब पता चला कि वह माँ बनने वाली है तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा था ये यूँ तो उसका दूसरा बच्चा था पर ख़ुशी दुगुनी हो रही थी क्योंकि उसने अपने पति तुषार से यही कहकर दूसरे बच्चे के लिए हामी भरी थी कि पहले बच्चे के वक़्त मुझे महसूस ही … Read more

जिद्द की कीमत – पुष्पा पाण्डेय

राखी की पढ़ाई को लेकर घर में भाई-भाभी के बीच जो विवाद हुआ उसे लेकर चंदा काफी दुखी थी। घर के मुख्य दरवाजे पर चुपचाप उदास बैठी थी। भाभी चाहती थी कि राखी घर में ही रहकर काॅलेज की पढ़ाई करे। गाँव से शहर का काॅलेज पाँच किलोमीटर की दूरी पर था। बस तो आती-जाती … Read more

वक़्त का पहिया – डॉ उर्मिला शर्मा

 एक छोटे से शहर के निकटवर्ती गॉव की नम्रता स्नातक की छात्रा थी। जो रोजाना सायकिल से शहर के कॉलेज में पढ़ने जाया करती थी। औसत दर्जे की पढाई में नम्रता बहुत ही महत्वाकांक्षी लड़की थी। घर में तीन भाई- बहनों में नम्रता सबसे छोटी सबकी चहेती थी। उसका निम्न मध्यमवर्गीय परिवार बुनियादी जरूरतों को … Read more

 मां होती तो उसके दर्द को तो समझती – किरण कुशवाहा

अंजू की शादी को डेढ़ साल हुए थे, पति अजय दूसरे शहर में नौकरी करते थे| महीने में दो-तीन दिन के लिये आते तो दिन भर तो घरवालों के साथ ही रहते तो कुछ कहने और सुनने का समय ही नहीं मिलता। इधर कुछ दिनो से अंजू कुछ भी खा रही थी तो उसे उल्टी … Read more

तुम्हारी वजह से मैं आज खुद से प्यार करने लगी हूं – चाँदनी झा 

बीबीजी, आप इतना झल्लाई सी क्यों रहती है? विमला ने डरते हुए सुधा से पूछा। झल्लाई क्या, सारा काम मुझे ही करना पड़ता है। तुम्हारे साहब को, ऑफिस के आलावा किसी चीज की चिंता नहीं, रोहन, रिया सबका ख्याल रखना, मेरी सास भी बीमार रहती है, और तुम कहती हो की मैं झल्लाई क्यों रहती … Read more

मन की खुशी – सोनिया कुशवाहा

इस साल बहुत धूमधाम से मनाऊंगी करवाचौथ, खुशी ने मन ही मन निश्चय किया। हर साल पूजा और विधि के शानदार फोटो देखकर मुझे कितना खराब लगता है, ना सही से तैयार हो पाती हूँ ना ही कभी मुकुल ने कहा कि कोई नई साड़ी या जेवर खरीद लो। बस वही पुरानी साड़ियाँ पहन कर … Read more

 लड़का हो या लड़की। दर्द भी बराबर होता है – सविता गोयल 

अरे बहू, ये क्या कर रही हो। अभी तो लल्ला खाली बीस दिन का हुआ है और तुम अभी से कपड़े धोने चल पड़ी। माँ जी, पिछली बार भी तो बीस दिन होते ही मैं काम करने लगी थी। तो इस बार भी कर लूंगी। नहीं नहीं बहू, अभी तेरा शरीर कच्चा है। आस-पड़ोस में … Read more

इतना आसान नहीं है उसे भूल पाना – संगीता अग्रवाल 

” स्नेहा कहां हो तुम …स्नेहा …!” निकुंज अपनी पत्नी को आवाज लगाता हुआ घर में दाखिल हुआ। ” लो तुम यहां बैठी जाने कहां गुम हो और मैं तुम्हे घर भर में ढूंढ रहा हूं !” निकुंज पत्नी को बालकनी में गुमसुम बैठे देख बोला। ” आ गए आप … मैं चाय लाती हूं … Read more

खिलवाड़ ! – वर्षा गर्ग

“सुना काव्या?”तुमने “किस बारे में बात कर रही हैं स्पष्ट बताइए ना।” “यही राकेश जी के बारे में..!” “ओह,मुझे लगा कोई खास बात होगी।अच्छा भाभी, धरा के आने का समय हो गया, मैं चलती हूं।” काव्या तो कुछ ही पलों में आंखों से ओझल हो गई पर आंखों के सामने पूरी फिल्म गुजरने लगी। बीस … Read more

रिश्तों का जटिल ताना बाना – डॉ. पारुल अग्रवाल

आज राशि इधर से उधर सजीधजी इधर से उधर काफी भाग दौड़ कर रही थी, पूरा घर भी मेहमानों से भरा हुआ था। चारों तरफ बहुत हंसी-खुशी का माहौल था, हो भी क्यों ना आज राशि और उसके पति की कई सालों की तपस्या का परिणाम था कि वो इतनी अच्छी सोसायटी के सभी सुविधाओं … Read more

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