ऐसे क्या कोई अपनी भाभी को परेशान करता है –   नीतिका गुप्ता 

क्या बहू; तुम्हें हर समय मायके जाने की पड़ी रहती है, अभी कुछ महीने पहले ही तो तुम अपनी बुआ की बेटी की शादी में अपने सब मायके वालों से मिलकर आई हो… अब क्या करना है वहां जाकर..?? वैसे भी तुम्हारे मायके वालों के पास कोई खजाना तो है नहीं जो तुम्हें बार-बार निकाल … Read more

 आप बेटियों वाले हैं थोड़ा मर्यादा में रहना चाहिए –  मनीषा भरतीया

सुबह सुबह मीठी आवाज में आरती की गूंज से पूरा वातावरण निर्मल हो रहा था। उनकी आवाज में साक्षात सरस्वती का वास था। यह आरती की आवाज सुधाकर जी के घर से आ रही थी। उनकी पत्नी सुनीता जी रोज सुबह 5 बजे ही भगवान की भक्ति में लग जाती थी। सुधाकर जी के परिवार … Read more

दीवाली का तोहफा – अमिता कुचया

नन्ही कुहू को हमेशा लगता कि हम सब मिलकर दादी दादा के साथ त्योहार  में एक साथ हो कितना अच्छा हो। पर अमित की नौकरी  विदेश में होने के कारण त्योहार में अपनों के पास आ ही  नहीं पाता । क्योंकि उसके पास उस समय छुट्टी नहीं रहती ! हमेशा चाहकर भी दीवाली का त्योहार … Read more

” खुलने लगी गांठ ” – डॉ. सुनील शर्मा

शाम के पांच बजने वाले थे. सुमित दिन भर की फाइलें लेकर बॉस के केबिन में गया और हस्ताक्षर कराने लगा. कृष्ण कांत जी उसके बॉस अवश्य थे लेकिन बहुत ही अनुभवी तथा शालीन प्रकृति के थे. काम करने वाले कर्मचारियों की कद्र करते थे. आज भी पूछ बैठे ‘ कल तो दिवाली है,क्या प्रोग्राम … Read more

सप्तपदी-सप्तवचन* – अनुराधा अनिल द्विवेदी*

ऑटो में मेरे सामने बैठे एक भले मानस मेरे दादा जी के उम्र के रहे होंगे, बड़ी देर से मुझे घूरे जा रहे थे, जब भी मैं उनकी तरफ देखती मुझसे नजरे हटा लेते, उनकी नजरों से मैं असहज महसूस कर रही थी। बात दस साल पहले की है जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी, … Read more

बाबाजी मैं आपकी पोती जैसी दिखती हूं क्या, जो मुझे घूरे जा रहे हैं… – सुल्ताना खातून 

ऑटो में मेरे सामने बैठे एक भले मानस मेरे दादा जी के उम्र के रहे होंगे, बड़ी देर से मुझे घूरे जा रहे थे, जब भी मैं उनकी तरफ देखती मुझसे नजरे हटा लेते, उनकी नजरों से मैं असहज महसूस कर रही थी। बात दस साल पहले की है जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी, … Read more

दिवाली पर बहू नहीं बेटी याद कर रही है। – मंजू तिवारी

बिटिया तुम सब लोग कब घर आ रहे हो दिवाली आने के 1 महीने पूर्व से ही पूछने लगते थे  ,, कहने के लिए तो वह वंदना की ससुर जी थे लेकिन बंदना को अपने ससुर जी से पिता जैसा दुलार मिला था।,,, बंदना से बिल्कुल बेटी जैसे ही बात करते,,, अक्सर सासू मां से … Read more

 प्रेम से बनता परिवार – सरला मेहता

बचपन की सखियाँ मंदिर में मिल जाती हैं। वहीँ पेड़ी पर बैठ लगी सुनाने अपनी राम कहानियाँ। चर्चा का मुख्य मुद्दा परिवार व बहू बेटों पर ही केंद्रित है। पवित्रा शान से कहती है,” देख बेना, मेरी तो एक ही बहू है पर ठीकठाक है। बोलती है कामपुरता। मैं तो ठहरी बातूनी। बस यूँ समझ … Read more

द्रोण – विनय कुमार मिश्रा

“प्रकाश सर का घर यहीं है क्या?” कौन प्रकाश? यहां तो इस नाम का कोई नहीं रहता बाबू” वो चारो लगभग सत्ताईस अठाइस साल के युवक, चमचमाती हुई बड़ी गाड़ी खड़ी कर कुछ सोचने लगे। उन चारों ने एक तस्वीर दिखाई मुझे। “ये जो बीच में हैं, हम इन्हें ही ढूंढ रहे हैं” तस्वीर कुछ … Read more

सासु माँ को हमने अच्छा सबक सिखाया – सुल्ताना खातून 

आज तो सुरज पश्चिम से निकल गया था जैसे, आज  सासु मां समोसे ले आईं थी, हमारी बांछे खिल गईं जैसे, और तो और सासु मां ने समोसे ला कर हमें थमा दिया, ये भी कहा अपने लिए निकाल कर हमें भी दे जाना। हम हैरत के समन्दर में गोते लगाते किचन के तरफ बढ़ … Read more

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