ओ ओ काम के कीड़े ईमानदारी के भूतनाथ सुन तो भाई रुक जा थोड़ा हम भी पीछे हैं तुम्हारे….रमेश ने रघुनाथ को आवाज दी।
आजा भाई आजा अपनी रफ्तार में तनिक भी कमी ना करते हुए रघुनाथ जी ने ऑफिस के दरवाजे तक तेजी से कदम बढ़ाते हुए मुस्कुरा के कहा तो रमेश ठठा कर हंस पड़ा।
क्या बात है आज घर की बॉस से डांट नहीं मिली है लगता है तभी इतनी हंसी आ रही है रघुनाथ जी ने अपनी टेबल पर बैठ कंप्यूटर ऑन करते हुए कहा तो अबकी बार रमेश उनके पास आकर सामने बैठ गया।
ओ भाई करमचंद कितना कर्म करोगे भाई।चार महीने बाद रिटायरमेंट है तुम्हारा।छुट्टी हो जाएगी यहां कोई दूसरा आ जायेगा तुम्हारा काम खत्म।छोड़ ना यार अगले के लिए भी कोई काम बचा रहने दे वह मक्खी मारेगा क्या यहां आकर रघुनाथ का हाथ कंप्यूटर से हटाते हुए रमेश ने कहा तो रघुनाथ उखड़ गए।
देखो रमेश काम के समय ये मसखरी मुझे बिल्कुल नहीं सुहाती।वैसे ही तुम्हारे चक्कर में आज लेट हो गया हूं बहुत सारी फाइल्स निबटानी है आज मुझे।ठीक याद दिलाया तुमने चार महीने ही हैं मेरे पास।भाई सुन जो बोया जाएगा वही पाया जाएगा अंत में समझे और काम बहुत करना है ।अरे ढेरों आवेदन पड़े हैं और टेंडर भी।याद आया तुम्हारे पास वो बैंक लोन वाली फाइल पड़ी थी उसे भी पूरा करना है।तुमने देख लिया उसे? रघुनाथ ने पूछा तो रमेश फिर हंस पड़ा।
अरे टाइममशीन रुक जा भाई।काहे मरे जा रहा है।तूने बोया ही कहां कुछ जो बाद में पाएगा।रिटायरमेंट के पहले कुछ कमाई कर ले कम से कम खुद का एक मकान और एक गाड़ी की व्यवस्था तो कर ही ले।बिटिया की शादी का इंतजाम कैसे करेगा।अभी भी समय है।इस कदर काम कर करके क्या मिला है तुझे आजतक।
अपना एक मकान तक तो बना नहीं पाया।दोनों बच्चे सरकारी स्कूल कॉलेज में पढ़ रहे हैं।मुझे देख बोया तो मैने है क्या नहीं है मेरे पास। मेन रोड पर आलीशान बंगला है।बेटी और बेटा दोनों को हाई डोनेशन देकर प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन दिलवा दिया है।
दो मकान किराए से दे दिया हूं।मेरी श्रीमती जी सोने से लदी घूमती हैं।हर महीने बाहर घूमने जाती रहतीं हैं।और तुम्हारे मुकाबले मै कितना काम करता हूं।रोज तुमसे लेट ऑफिस आता हूं।बहुत कम ही अपनी टेबल पर बैठता हूं।कैंटीन में अड्डा जमाए रहता हूं
भाई कुछ सीख अब तो कुछ कमाई कर ले।वो फाइल जो मेरे पास है लोन सैंक्शन भी हो चुका रमेश ने कहा तो रघुनाथ चकित उसे देखने लगे।
क्या कह रहे हो लोन सैंक्शन हो गया।कब हुआ?कितनी राशि फाइनल हुई कहां है? मुझे क्यों नहीं बताया रघुनाथ जी आक्रोशित हो उठे।
क्यों बताता तुम्हें।सारी राशि मेरे बैंक खाते में पहुंच गई है।वो क्या है मेरी वाइफ रीतू विदेश यात्रा की जिद कर रही है तो भाई इतना खर्चा कहां से आएगा सोचने वाली बात है तुम्हें बता के क्या मिलता मुझे ठेंगा..!! रमेश ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा ।
नहीं रमेश तुमने सही नहीं किया।देखो जो वो रहे हो वही वापिस मिलेगा तुम्हे संभल जाओ भाई।वह फाइल लेकर आओ तुम अभी… वह भी मेरी जिम्मेदारी है रघुनाथ ने नाराजगी से कहा तो रमेश अवज्ञा से हंस पड़ा और मैं तो चला कैंटीन की राह तू मर यहीं फाइलों के ढेर में …चलेगा तो बोल.. कहता बाहर चला गया।
रघुनाथ मन मार कर रह गया।
रिटायरमेंट का अर्थ उसके लिए सारे पेंडिंग कार्य निबटाना था।अपनी नौकरी के इन 35 सालों में उसने टूट कर काम किया था।किसी को टोकने का कभी मौका नहीं दिया था।हां पैसा नहीं कमाया ऊपरी आमदनी वाला।रमेश सहित उसके सहकर्मी गाहे बगाहे उसके लिए यही जुमला प्रयोग करते थे “काहे मरे जा रहा है!!” लेकिन वह शांत भाव से आत्मीय मुस्कान से जवाब देता काम में जुटा रहता।
मकान बनवा लो रिटायर होने के बाद ऑफिस से मिला मकान छोड़ना पड़ेगा….किसी बच्चे की नौकरी लगवाने के लिए रुपया जोड़ लो कैसे जीयोगे रिटायरमेंट के बाद सुन सुन कर उसके कान पक गए थे और अनजाने ही धीरे से एक डर एक चिंता एक अनिश्चितता उसके दिल में गहराने लगी थी।लेकिन फाइल में लीपापोती करके या अयोग्य की फाइल आगे बढ़ाकर फर्जी लोन बनाकर गलत उम्मीदवार चयन करके संपत्ति जोड़ना उसके उसूल और आत्मा की हत्या की तरह थे उसके लिए।
कैंटीन से रमेश और सहकर्मियों के हंसी ठहाके का शोर उसके कानों से होता हुआ दिल को मथ रहा था जिसे अनसुनी करता वह निर्विकार भाव से फाइल निबटाने में लगा रहा।
रिटायरमेंट वाले दिन भी वह आखिरी फाइल निबटा कर ही अपनी फेयरवेल पार्टी में पहुंचा था।
आइए आइए फाइल के कीड़े एक ने ताना मारा था उसके आते ही।
भाई मेरी भी एक फाइल थी ले आऊं क्या उसे भी पूरी कर दे दूसरे ने फब्ती कसी।
बस भैया बहुत कर लिए।अब क्या करोगे।ऑफिस से मिला मकान एक हफ्ते में खाली करके सड़क पर रहना अब। लोन भी ना मिलेगा तुमको अब तो और ना मानो मेरी बात अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे !कितना समझाता था काहे मरे जा रहे हो काम काम के पीछे लेकिन नहीं तुम्हें तो किसी की सुननी ही नहीं। अब आटे दाल का भाव समझ आएगा रमेश ने झट से व्यंग्य मारा।
मिस्टर रघुनाथ इधर आइए ऊपर मंच पर तभी माइक पर आवाज गूंजी और रघुनाथ जी बुझे हुए मन से अपनी विदाई की प्रक्रिया पूर्ण करने लगे।माला आदि पहनाने के बाद सभी ऑफिस वालों ने उन्हें छोटे बड़े कई उपहार दिए जिन्हें ना चाहते हुए भी उन्हें स्वीकार करना पड़ रहा था।जिंदगी भर किसी से उन्होंने मुफ्त में एक कप चाय नहीं पी थी और आज इतने उपहार उन्हें एक बोझ जैसे ही लग रहे थे।शायद उनके मन पर जो बोझ था वह ज्यादा भारी होकर हावी होने लगा था।
अब कहां जाऊंगा मैं !! जिंदगी की कठोर वास्तविकता कोड़े मार रही थी।घर खाली करना है…खाली करना है… किराए का बहुत महंगा मिलेगा …..!!आज मन बहुत बोझिल हो गया था उनका।
इसी चिंता में विदाई पार्टी खत्म हो गई और परिपाटी के मुताबिक कई स्टाफ सदस्य उनके घर तक उन्हें छोड़ने आए ।पत्नी और बच्चों ने सभी का चाय पिलाकर स्वागत किया उनकी पत्नी ने घर पर ही बेसन के लड्डू बनाए थे वही प्लेट में ले आईं।
क्या भाभीजी मात्र इन लड्डुओं से काम ना चलेगा ।दावत खिलानी पड़ेगी आपको रमेश ने फुर्ती से चार लड्डू एकसाथ उठाते हुए कहा तो पत्नी मुस्कुरा कर रह गईं।
अरे भाई दावत तो अब नए मकान में लेंगे अब तो ये घर आप लोगों को खाली ही करना है अन्य सदस्य ने व्यंग्य किया तो सभी हो हो कर हंस दिए …. रघुनाथ जी का चेहरा और ज्यादा म्लान हो गया।
पत्नी के चेहरे की ओढ़ी हुई हंसी भी गायब हो गई।
अनकहा तनाव पसर गया।
पापा कोई आपसे मिलने आए हैं बेटे सिद्धार्थ ने आकर कहा तो रघुनाथ जी गले में पड़ी माला को उतार थके कदमों से बाहर की तरफ बढ़े कि इतनी जल्दी घर खाली करने की नोटिस लेकर कोई आ भी गया!!
आने वाले ने उन्हें देखते ही तुरत पैर छू लिए।
सर आपने मुझे पहचाना नहीं होगा मैं वही संदीप हूं जिसकी फाइल आपने ही आगे बढ़ाई थी तमाम विरोधो के बावजूद ।और आपके उस एक प्रोजेक्ट के मिलने से मुझे इस शहर में पैर टिकाने की जगह मिली थी और आज मै इस शहर का सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्टर बन गया हूं।आज मैं बहुत संकोच से बहुत सम्मान से ये छोटी सी भेंट आपको देना चाहता हूं कहते हुए आगंतुक ने एक डिब्बा उनकी तरफ बढ़ाया।
अचकचाते हुए रघुनाथ जी ने उस डिब्बे को खोला तो दंग रह गए। उसमें एक फ्लैट के कागजात और चाभी थी।
ये क्या है हैरान होकर पूछा उन्होंने।
सर तुच्छ सी भेंट उस इंसान को जिसने अपनी ईमानदारी और कर्मठता से मुझ जैसे ना जाने कितने बिना सिफारिश वाले बच्चों के घर बसा दिए।आप ना होते तो मेरी फाइल धूल खाती किसी कोने में पड़ी होती और मैं रोज ऑफिस के चक्कर लगाता ऐसी मांग की गिरफ्त में आ जाता जिसे पूरा करना मेरी सामर्थ्य से बाहर था बेरोजगारी का लेबल लगा कर सड़को की खाक छानता घरवालों की फटकार सुनता या तो किसी गलत धंधे में बंध जाता या जिंदगी से पलायन कर जाता …हाथ जोड़ वह घुटनों के बल बैठ गया उसकी आँखें अश्रु से भरी थीं।
आंखों में आंसू छलक आए रघुनाथ जी की।जैसे भीतर का दबा बोझ पिघल कर बह रहा हो।जैसे सहकर्मियों के ताने और व्यंग्य के तीरों को ढाल मिल गई हो।
रमेश और उपस्थित सभी सहकर्मी मुंह फाड़े देखते रह गए।वे मुंह जो ताने मार रहे थे व्यंग्य कर रहे थे उन्हें मानो लकवा मार गया था।
रघुनाथ जी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बाहर निकले तो बाहर नई कार लिए ऑफिस का व्यक्ति खड़ा था।
सर ये आपके लिए…. बॉस ने… एक लेटर और कार की चाभी उनकी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा।
हर्ष विकंपित हाथों से रघुनाथ जी ने पत्र खोला,
सम्माननीय रघुनाथ जी ,
अभिनंदन और शुभकामनाएं
आपकी एकजुटता ईमानदारी और रिटायरमेंट के अंतिम दिन भी कार्य के प्रति आपकी जीवटता ने हमें अभिभूत कर दिया है।आपके इस जुझारू जज्बे को इस जीवटता को सलामी।अंतिम फाइल जो सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से संबंधित थी उसे मंजूरी मिल गई है बिना किसी आपत्ति के करोड़ों के टेंडर पास हो गए जिसमें आपका ही योगदान था अतः ऑफिस की तरफ से आपके लिए यह छोटी सी सरप्राइज़ गिफ्ट..!!ईश्वर आप और आपके परिवार की गाड़ी इसी शुद्धता से चलाता रहे।
कृतज्ञता आभार सादर
रघुनाथ जी विस्मित थे हर्षित थे जो बोया था उन्होंने वही आज पाया था।उन्हें प्रतीत हुआ मानो बरसों से जिस खेत की जुताई कर रहे थे जिस फसल को अपने श्रम से सींच रहे थे वह फसल लहलहा उठी । जिसने “अरे काहे मरे जा रहे हो” उस चुभने वाले प्रश्न का जवाब भी दे दिया था।
सारे प्रश्नकर्ता अब लाजवाब हो नजरें झुकाए खड़े थे।
जो बोया वही पाया#कहानी प्रतियोगिता
लतिका श्रीवास्तव