कौन अपना, कौन पराया!” –  रूचिका राणा

 “देखा! मयूरविहार वाले जीजा जी का फोन अभी तक नहीं आया।” श्रीमान जी ने अपने मोबाइल की स्क्रीन को ऊपर नीचे स्क्रॉल करते हुए कहा।      “आप से कब बात हुई थी उनकी….?”    “मैंने ही किया था उस दिन हॉस्पिटल से, जिस दिन डिस्चार्ज होने वाला था।”       “तो इसमें हैरानी वाली कौन सी बात है… जब … Read more

धोखा नहीं अपनापन था  –  तृप्ति शर्मा

तीन बहनों में सबसे छोटा था मयंक बड़ी मन्नतो के बाद हुआ था। खूब लाड और प्यार से पाला मां बाबा ने ।सबका लाडला, घर का चिराग जिसके खिलखिलाने पर पूरा घर खिलखिलाता था जिसके रोने पर पूरा घर बिलख पड़ता।      बेटियां रोशनी थी तो मयंक उजियारा।मां बाबा कहते ,”अब घर पूरा हो गया “।अच्छा … Read more

एकादशी में महालक्ष्मी की वापसी – शुभ्रा बनर्जी 

अनुज के साथ पहली बार जब दिल्ली आई थी मैं,आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।एक भरे पूरे संयुक्त परिवार में पली बढ़ी मैं,कैसे अकेले एक नए शहर में रहूंगी?कौन ध्यान रखेगा मेरा?ताऊजी,ताजी,चाचा,चाची,बुआ,दादा दादी सबकी लाड़ली थी मैं।सबके लाड़ प्यार ने मुझे नकचढ़ी बना दिया था,ऐसा मम्मी का आरोप था मुझ … Read more

‘ स्वार्थी नहीं बनना है ‘ –  विभा गुप्ता

 ‘ये क्या! जेठानी जी ने फिर से केवल अपने लिए ही चाय बनाई है।अरे,मेरे लिए ना सही,कम से कम बाबूजी के लिए तो बना देती।माँजी थीं,तब की बात और थी, लेकिन अब वे नहीं है तो क्या वे इतना भी नहीं कर सकतीं हैं।’ बुदबुदाते हुए मैं अपने लिए और बाबूजी के लिए बिना चीनी … Read more

प्यारी बहना – कांता नेगी 

सोनिया शेखर और सुमन की लाडली और सुधीर और सुनील की प्यारी बहना थी।तीनो भाई बहन एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे।छोटी छोटी बातों पर लड़ना झगड़ना,एक दूसरे की चीजे छीनना ये तो लगा ही रहता था।जब कभी सोनिया भाईयों की शिकायत मम्मी पापा से करते तो वे सोनिया का ही पक्ष लेते और … Read more

“अब टोको ना कोई रोको ना” – कुमुद मोहन

“क्या ऊंट की तरह हुड़दंगी सी कूदती रहती हो!धीरे चला करो”दादी जब-तब आठ साल की सुमी को टोकती रहतीं,और सुमी के उठते कदम दादी के टोकने के साथ एक पल में रूक जाते। थोड़ी बड़ी हुई तो माँ ने टोका ताड़ सी लंबी हो रही हो स्कर्ट मत पहना करो,खुली टांगें अच्छी नहीं लगती, ढक … Read more

अपनों के होते हुए अकेलापन आखिर क्यूँ? – ज्योति आहूजा

आज राधेश्याम जी के परिवार में हर तरफ ठहाकों की गूँज सुनाई दे रही थी। राधेश्याम  ग्रोवर जी, नोएडा में रहने वाले एक व्यापारी थे और अपनी पत्नी सुजाता संग जिंदगी के ये वर्ष अकेले व्यतीत कर रहे थे। यूँ कहें तो परिवार बड़ा था, दो बेटे समीर और विशाल नौकरी के चलते शादी के … Read more

शिखर – ऋतु अग्रवाल

   “माँ! एक बात पूछूँ?” मीना ने अपनी माँ लाली से पूछा।         “हाँ, हाँ,बिटिया रानी पूछो ना!” लाली ने मीना के सिर पर हाथ फेरा।         “क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम कभी नयी साड़ी पहनो?” मीना ने लाली की आँखों में झाँकते हुए कहा।        “बिटिया, मन का क्या है? मन तो बहुत कुछ करे है। … Read more

आज से मैं ही तुम्हारी मॉं हूॅं….. – भाविनी केतन उपाध्याय 

अपनें तो अपने होते हैं पर पराया भी कैसे अपना बन जाता है ये मैं अपने निजी अनुभव के तहत आप सबसे सांझा करने की कोशिश की है। मेरी सासूमा और मैं यानि कि रीमा दोपहर में टीवी देख रहे थे कि अचानक से डोरबेल बजी, हम दोनों ने एक दूसरे के सामने देखा कि … Read more

छोटा भाई   – डाॅ  उर्मिला सिन्हा

 तेल की धार और समय की मार में एक समानता है। तेल  नीचे की ओर बहता है और समय की मार जब पड़ती है  तब अच्छे अच्छों की बुद्धि काम नहीं करती।       हरिबाबू और उनकी पत्नी रमादेवी एक दूसरे को देखते और आहें भरते।      रमादेवी  जो अपने पति की ऊंची हैसियत ऊँचे पद और बेशुमार … Read more

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