मालती देवी धीरे-धीरे चलकर अंजलि के पास आईं। उन्होंने उसके सिर पर अपना झुर्रियों भरा, कांपता हुआ हाथ रखा। “मत रो अंजलि बहू। यह दुनिया ऐसी ही है। जब औरत कमज़ोर होती है, तो उसे रौंद देती है, और जब वह मज़बूत बनती है, तो उसे बदचलन कहने लगती है। जा, उठकर मुँह-हाथ धो ले। बच्चों के चेहरे देख, बेचारों को भूख लगी होगी।”
मालती देवी के प्यार भरे स्पर्श ने अंजलि को थोड़ी हिम्मत दी। उसने अपने आँसू पोंछे, सास के पैर छुए और बच्चों को लेकर कमरे में चली गई। थोड़ी देर बाद वह फ्रेश होकर रसोई में आई। रसोई में जूठे बर्तनों का अंबार लगा था और कविता ने रात के लिए आटा तक नहीं गूँथा था। अंजलि ने बिना कुछ कहे अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और काम में लग गई।
शहर की सड़कों पर गाड़ियों का शोर था और स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में धूल के कण उड़ते हुए साफ़ दिखाई दे रहे थे। अंजलि जब ऑटो से उतरकर अपनी कॉलोनी के गेट तक पहुँची, तो उसके कंधे पर टंगा लेदर का लैपटॉप बैग उसे किसी पहाड़ से कम नहीं लग रहा था। एक हाथ में सब्ज़ियों से भरा भारी थैला था और दूसरे हाथ में उसके सात साल के बेटे आरव के साइंस प्रोजेक्ट के लिए थर्माकोल और रंग-बिरंगे चार्ट पेपर। दिन भर बैंक की थकान, महीने के आखिरी दिनों का क्लोज़िंग प्रेशर, ग्राहकों की किचकिच और फिर बस स्टैंड पर एक घंटे का इंतज़ार—इन सबने अंजलि को शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह निचोड़ कर रख दिया था। लेकिन जैसे ही उसने अपने घर ‘शांति निकेतन’ के दरवाज़े पर कदम रखा, उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई। उसे पता था कि अंदर उसके दो बच्चे उसकी राह देख रहे होंगे।
“मम्मी आ गई! मेरी मम्मी आ गई!” आरव और पाँच साल की नन्ही मायरा दौड़ते हुए आए और अंजलि के पैरों से ऐसे लिपट गए जैसे बरसों बाद मिले हों। अंजलि के चेहरे की सारी थकान एक पल में हवा हो गई। उसने अपना भारी बैग और सब्ज़ी का थैला ज़मीन पर रखा और दोनों बच्चों को ज़मीन पर बैठकर अपने सीने से लगा लिया। बच्चों के माथे को चूमते हुए वह उनसे उनके दिन भर की बातें पूछने ही जा रही थी कि तभी अंदर के कमरे से एक तेज़ और चुभती हुई आवाज़ आई जिसने उस खुशनुमा माहौल को एक झटके में बर्फ कर दिया।
“अंजलि! यह भी कोई वक़्त है घर आने का? रात के साढ़े आठ बज रहे हैं। नौकरी क्या करने लगी हो, इस घर की सारी मान-मर्यादा ही भूल गई हो?” अंजलि की जेठानी, कविता, हाथ में टीवी का रिमोट लिए दनदनाती हुई हॉल में आ खड़ी हुई। कविता की आँखों में गुस्सा था और होंठों पर एक अजीब सा तिरस्कार। ताई जी का यह उग्र रूप देखकर आरव और मायरा सहम गए और अपनी माँ के पल्लू के पीछे छुप गए।
अंजलि ने धीरे से उठकर अपने कपड़े ठीक किए। वह विवाद नहीं चाहती थी, इसलिए उसने बहुत ही शांत और दबी हुई आवाज़ में कहा, “दीदी, आप इतना नाराज़ क्यों हो रही हैं? ऐसा क्या कर दिया मैंने? आज महीने का आखिरी दिन था, बैंक में ऑडिट चल रहा था। मैं तो खुद जल्दी आना चाहती थी।”
“अकेली और ब्याहता औरत का रात के इस पहर घर लौटना क्या इस खानदान को शोभा देता है?” कविता ने अपनी आवाज़ और ऊँची कर ली, मानो वह चाहती थी कि उनकी आवाज़ खिड़कियों से बाहर पड़ोसियों तक भी पहुँचे। “मैं तो हैरान हूँ तुम्हारे साहस पर। सुबह आठ बजे घर से निकलती हो और रात को नौ बजे लौटती हो। क्या फायदा ऐसे चंद रुपयों का जो घर की औरतों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दे?”
“दीदी, मैं सड़क पर नहीं, अपने दफ़्तर से आ रही हूँ,” अंजलि की आँखें भर आईं, पर उसने अपने आँसुओं को रोकते हुए कहा। “ऑडिट के बाद मुझे ऑटो नहीं मिल रहा था। फिर आरव के स्कूल प्रोजेक्ट का सामान भी तो लेना था, कल उसे जमा करना है। सब्ज़ी वाले भइया भी नहीं आए थे तो वो भी लेते हुए आई हूँ। इसलिए थोड़ी देर हो गई।”
कविता ने व्यंग्यात्मक हँसी हँसी। “बहाने बनाने में तो तुम माहिर हो अंजलि। मुझे मत सिखाओ। तुम्हारी इस नौकरी के चक्कर में मेरे सिर पर घर के कामों का बोझ आ गया है। और यह जो तुम बाहर घूमती हो ना, लोग बातें बनाते हैं। आज ही शर्मा जी की पत्नी कह रही थी कि तुम्हारी देवरानी तो रात-रात भर बाहर रहती है, जाने कैसी नौकरी है। तुम तो अपनी इज़्ज़त गँवा चुकी हो, पर हमारे परिवार पर क्यों कीचड़ उछाल रही हो?”
अंजलि के लिए यह चरित्र हनन बर्दाश्त के बाहर था। वह कुछ जवाब देने ही वाली थी कि तभी पीछे के कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। अंजलि और कविता की सास, मालती देवी, हाथ में अपनी छड़ी पकड़े बाहर आईं। मालती देवी के चेहरे पर उम्र की झुर्रियाँ ज़रूर थीं, लेकिन उनकी आँखों का तेज़ आज भी बरकरार था।
“क्या हुआ? यह इतना शोर क्यों मचा रखा है हॉल में? क्या मैं इस घर में शांति से दो घड़ी लेट भी नहीं सकती?” मालती देवी ने अपनी भारी आवाज़ में पूछा।
कविता ने झट से अपना रुख बदला और सास के सामने बेचारी बनने का नाटक करते हुए बोली, “माँ जी, आप तो अपने कमरे में भजन-कीर्तन में लगी रहती हैं, आपको क्या पता कि दुनिया क्या कह रही है और घर में क्या हो रहा है! मैं तो बस आपकी छोटी बहू को समझा रही थी। देखिए ज़रा वक़्त! इतनी रात गए घर आई है। मोहल्ले वाले ताने मार रहे हैं कि तुम्हारी बहू तो मर्दों की तरह रात को लौटती है। हमें जवाब देना भारी पड़ रहा है।”
मालती देवी ने एक गहरी नज़र कविता पर डाली और फिर सहमी हुई अंजलि और उसके पीछे छुपे बच्चों को देखा। उन्होंने एक लंबी साँस ली और अपनी छड़ी को ज़मीन पर टिकाते हुए कविता से बोलीं, “बड़ी बहू, अगर तुम्हें इस परिवार की इतनी ही चिंता होती, तो आज अंजलि को यह दिन न देखना पड़ता। बहुत दिनों से मैं तुम्हारा यह रोज़-रोज़ का तमाशा सुन रही हूँ, पर आज मुझे बोलना ही पड़ेगा। जो मोहल्ले वाले आज ताने मार रहे हैं, जब दो साल पहले तुम्हारे पति की नौकरी छूट गई थी और घर में राशन के पैसे नहीं थे, तब वे मोहल्ले वाले कहाँ थे? तब क्या उन्होंने आकर हमारे घर का चूल्हा जलाया था?”
कविता यह सुनकर अवाक रह गई। उसने सफाई देने की कोशिश की, “पर माँ जी, मैं तो बस…”
“चुप रहो कविता!” मालती देवी ने उसे बीच में ही टोक दिया। “जब इस घर पर मुसीबत आई थी, तब तुम और तुम्हारा पति हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। उस वक़्त इसी अंजलि ने बाहर निकलकर नौकरी ढूँढी थी। इसने अपनी पढ़ाई को हथियार बनाया और इस परिवार की लाज बचाई। अंजलि नौकरी कर रही है, कोई चोरी नहीं। उसे कौन क्या बोलता है, इसका जवाब अंजलि की मेहनत देगी, तुम्हें उसकी फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। और अगर किसी पड़ोसी को ज़्यादा तकलीफ है, तो उसे मेरे पास भेजना, मैं उसे जवाब दूँगी।”
कविता अपमान से लाल हो गई। उसे मालती देवी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। “ठीक है माँ जी, जब आपको मेरी बात सुननी ही नहीं है, तो आज के बाद मुझसे भी किसी चीज़ की उम्मीद मत रखिएगा। घर का काम मैं अकेले नहीं करूँगी।” यह कहकर कविता पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया।
हॉल में फिर से सन्नाटा छा गया। अंजलि अब अपने आँसुओं को नहीं रोक पाई। वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई और फफक-फफक कर रोने लगी। उसे इस बात का दुख नहीं था कि वह थक गई थी, बल्कि इस बात की पीड़ा थी कि जिस परिवार के लिए वह अपनी हड्डियाँ गला रही थी, वहीं उसे शक और तानों का ज़हर पीना पड़ रहा था।
मालती देवी धीरे-धीरे चलकर अंजलि के पास आईं। उन्होंने उसके सिर पर अपना झुर्रियों भरा, कांपता हुआ हाथ रखा। “मत रो अंजलि बहू। यह दुनिया ऐसी ही है। जब औरत कमज़ोर होती है, तो उसे रौंद देती है, और जब वह मज़बूत बनती है, तो उसे बदचलन कहने लगती है। जा, उठकर मुँह-हाथ धो ले। बच्चों के चेहरे देख, बेचारों को भूख लगी होगी।”
मालती देवी के प्यार भरे स्पर्श ने अंजलि को थोड़ी हिम्मत दी। उसने अपने आँसू पोंछे, सास के पैर छुए और बच्चों को लेकर कमरे में चली गई। थोड़ी देर बाद वह फ्रेश होकर रसोई में आई। रसोई में जूठे बर्तनों का अंबार लगा था और कविता ने रात के लिए आटा तक नहीं गूँथा था। अंजलि ने बिना कुछ कहे अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और काम में लग गई।
तवा गरम हो रहा था और अंजलि रोटियाँ बेल रही थी। स्टोव की आंच उसके चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन उसके सीने में उठ रही आग उस आंच से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। उसे कविता के वे शब्द तीर की तरह चुभ रहे थे। क्या औरत होना इतना बड़ा अभिशाप है? अगर वह नौकरी न करे तो ‘बोझ’ और करे तो ‘बदचलन’।
उसने जैसे-तैसे खाना बनाया। एक थाली में सास के लिए खाना परोसा और उनके कमरे में दे आई। फिर आरव और मायरा को प्यार से अपने हाथों से खाना खिलाया। बच्चे दिन भर की थकान के बाद खाना खाते ही सो गए। रात के ग्यारह बज चुके थे। रसोई समेटकर जब अंजलि अपने लिए खाना निकालने लगी, तो उसका मन एकदम कसैला हो चुका था। गले में जैसे कोई काँटा अटका हुआ था। उसने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा, पर उसे निगल न सकी। कविता की कड़वी बातें उसके कानों में गूँज रही थीं।
आखिरकार, उसने खाने की थाली ढक कर रख दी और भूखे पेट ही बिस्तर पर जाकर लेट गई। बच्चे उसके दोनों तरफ गहरी नींद में सो रहे थे। बाहर सड़क पर अब पूरी तरह सन्नाटा पसर चुका था, लेकिन अंजलि की आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह बंद आँखों से भी उस आसमान को देख रही थी जिसे उसने छूने की कोशिश तो की थी, लेकिन उसके पैरों में जकड़ी परिवार और समाज की बेड़ियों ने उसे उड़ने से पहले ही लहूलुहान कर दिया था।
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