वसुंधरा देवी ने एक व्यंग्यात्मक और दर्प पूर्ण हंसी हंसते हुए कहा, “अरे रश्मि, तुम भी कैसी बात करती हो! इन लोगों का स्टैंडर्ड काजू कतली और पिस्ते वाला थोड़े ही है। इन्हें ये महंगी चीजें पचती भी नहीं हैं। इनके लिए तो ये बाजार की मीठी सोनपापड़ी ही बहुत है। आखिर हमें क्लास का फर्क तो मेंटेन करना ही पड़ता है ना। काजू कतली तो हमारे जैसों के लिए होती है, इन नौकरों के लायक तो बस यही सस्ता सामान है।”
माधव अभी दरवाजे तक ही पहुंचा था। उसने वसुंधरा देवी की ये चुभती हुई बातें सुन लीं। उसके कदम एक पल के लिए ठिठके। उसके आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी, लेकिन वह एक गरीब नौकर था। उसने खामोशी से अपना अपमान घूंट लिया और बिना कुछ कहे, वह सस्ता डिब्बा और पुरानी साड़ी लेकर अपने छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में चला गया।
वसुंधरा देवी को अपनी हैसियत पर बहुत गर्व था, या यूं कहें कि थोड़ा अहंकार था। उनका मानना था कि समाज में लोगों को उनके बैंक बैलेंस और रुतबे के हिसाब से ही इज्जत और चीजें मिलनी चाहिए। उनके लिए दुनिया दो हिस्सों में बंटी थी—एक उनके जैसे ‘क्लास’ वाले लोग और दूसरे वो, जो उनके यहां काम करते थे।
दीवाली का त्योहार नजदीक था और आनंद भवन में जश्न की तैयारियां जोरों पर थीं। वसुंधरा देवी ने शहर के सबसे महंगे हलवाई से मिठाइयां बनवाई थीं। ड्राइफ्रूट्स से भरी काजू कतली, बादाम के रोल्स, पिस्ते की बर्फी और चांदी के वर्क से सजी अनगिनत मिठाइयों के डिब्बे हॉल में रखे हुए थे। ये सभी डिब्बे उनके रसूखदार रिश्तेदारों, बिजनेस पार्टनर्स और अमीर दोस्तों के लिए तैयार किए गए थे।
उसी घर में पिछले बीस सालों से माधव काम कर रहा था। माधव घर का पुराना और वफादार ड्राइवर था। उसने आनंद भवन को अपना घर और वसुंधरा देवी के परिवार को अपना परिवार मानकर सेवा की थी। माधव की एक बेटी थी, पल्लवी, जो शहर के ही एक कॉलेज से अपनी पढ़ाई कर रही थी। पल्लवी एक बहुत ही होनहार, शालीन और संस्कारी लड़की थी, जिसे माधव ने बहुत मेहनत और लाड़-प्यार से पाला था।
त्योहार के एक दिन पहले, वसुंधरा देवी अपने डाइनिंग हॉल में बैठकर नौकरों को देने के लिए तोहफे अलग कर रही थीं। उनके पास शहर के बड़े-बड़े लोगों के लिए तो मखमली डिब्बों में पैक काजू कतलियां थीं, लेकिन नौकरों के लिए उन्होंने बाजार से थोक के भाव में मिलने वाली सस्ती सोनपापड़ी और कुछ सस्ते नमकीन के पैकेट मंगवाए थे। उनके साथ उनका सेक्रेटरी खड़ा था जो डिब्बों की गिनती कर रहा था।
तभी माधव वहां आया। “मालकिन, आपने बुलाया?” माधव ने दोनों हाथ जोड़कर बहुत अदब से पूछा।
वसुंधरा देवी ने मेज पर रखे उन सस्ते और साधारण सोनपापड़ी के डिब्बों में से एक डिब्बा उठाया और एक पुरानी, रंग उड़ी हुई सूती साड़ी उसके ऊपर रखते हुए कहा, “हां माधव, कल दीवाली है। ये तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का त्योहार का नेग है। इसे ले जाओ।”
माधव ने कृतज्ञता से सिर झुकाया और उस डिब्बे और साड़ी को अपने हाथों में ले लिया। तभी उसकी नजर पास ही रखे उन खूबसूरत मखमली डिब्बों पर गई जिनमें से शुद्ध घी और काजू की महक आ रही थी। उसने कुछ कहा नहीं, बस चुपचाप वहां से मुड़ने लगा।
तभी वसुंधरा देवी की एक अमीर सहेली, रश्मि, जो वहां मौजूद थी, उसने वसुंधरा से कहा, “अरे वसुंधरा, माधव इतने सालों से तुम्हारे यहां है। तुमने उसे वो काजू कतली वाला डिब्बा क्यों नहीं दिया? वो तो तुमने एक्स्ट्रा भी मंगवाए थे।”
वसुंधरा देवी ने एक व्यंग्यात्मक और दर्प पूर्ण हंसी हंसते हुए कहा, “अरे रश्मि, तुम भी कैसी बात करती हो! इन लोगों का स्टैंडर्ड काजू कतली और पिस्ते वाला थोड़े ही है। इन्हें ये महंगी चीजें पचती भी नहीं हैं। इनके लिए तो ये बाजार की मीठी सोनपापड़ी ही बहुत है। आखिर हमें क्लास का फर्क तो मेंटेन करना ही पड़ता है ना। काजू कतली तो हमारे जैसों के लिए होती है, इन नौकरों के लायक तो बस यही सस्ता सामान है।”
माधव अभी दरवाजे तक ही पहुंचा था। उसने वसुंधरा देवी की ये चुभती हुई बातें सुन लीं। उसके कदम एक पल के लिए ठिठके। उसके आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी, लेकिन वह एक गरीब नौकर था। उसने खामोशी से अपना अपमान घूंट लिया और बिना कुछ कहे, वह सस्ता डिब्बा और पुरानी साड़ी लेकर अपने छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में चला गया।
दीवाली का दिन बीत गया। आनंद भवन में खूब रौनक रही। बड़े-बड़े लोग आए, महंगी शराब और महंगे व्यंजनों का दौर चला। वसुंधरा देवी अपनी हैसियत का प्रदर्शन करके बेहद खुश थीं।
दीवाली के दो दिन बाद, वसुंधरा देवी अपने लॉन में रश्मि और अपनी कुछ अन्य हाई-सोसाइटी सहेलियों के साथ बैठकर चाय पी रही थीं। वहां विदेशी क्रॉकरी में चाय और बेकरी के महंगे बिस्किट रखे हुए थे। वे सब अपनी-अपनी शॉपिंग और दीवाली की पार्टियों की तारीफें करने में व्यस्त थीं।
तभी गेट से एक लड़की अंदर आती दिखाई दी। वह माधव की बेटी पल्लवी थी। पल्लवी ने एक बहुत ही साधारण लेकिन साफ-सुथरा सूती सूट पहना हुआ था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा तेज और गरिमा थी। उसके हाथों में एक पीतल की बड़ी सी थाली थी, जिसे एक बेहद खूबसूरत, हाथ से कढ़ी हुई सफेद और लाल रंग की क्रोशिया की जालीदार ओढ़नी से ढका गया था।
पल्लवी सीधे उस लॉन की तरफ आई जहां वसुंधरा देवी अपनी सहेलियों के साथ बैठी थीं। उसे इस तरह आते देख वसुंधरा देवी थोड़ी अचकचा गईं और उन्होंने अपनी भृकुटी तान ली।
“क्या बात है पल्लवी? तुम यहां क्या कर रही हो? माधव कहां है?” वसुंधरा देवी ने थोड़ा रूखेपन से पूछा।
पल्लवी के चेहरे पर कोई झिझक या डर नहीं था। वह बहुत ही शालीनता और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ी। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर वसुंधरा देवी और वहां बैठी सभी महिलाओं को नमस्ते किया।
“मालकिन जी, बापू आज सुबह से गैरेज की सफाई में लगे हुए हैं। मैं आपसे मिलने आई थी,” पल्लवी ने बहुत ही मीठी और स्पष्ट आवाज में कहा।
“मुझसे? क्यों?” वसुंधरा देवी ने सवालिया नजरों से देखते हुए पूछा।
पल्लवी ने अपने हाथों में पकड़ी उस पीतल की थाली को आगे बढ़ाया और उसके ऊपर ढका हुआ वह खूबसूरत क्रोशिया का कवर थोड़ा सा हटा दिया। कवर हटते ही वहां बैठी सभी महिलाओं की नजरें उस थाली पर टिक गईं।
थाली के अंदर घर के बने हुए शुद्ध खोए और मेवे के बड़े-बड़े, गोल और बेहद स्वादिष्ट दिखने वाले लड्डू रखे हुए थे। उन लड्डुओं से शुद्ध देसी घी, इलायची और केसर की इतनी मनमोहक महक उठ रही थी कि विदेशी बेकरी के बिस्किट भी उनके सामने फीके लगने लगे। लड्डुओं के साथ थाली में एक बहुत ही बारीकी से बुना हुआ ऊनी शॉल भी रखा था।
“ये क्या है पल्लवी?” वसुंधरा देवी ने आश्चर्य से पूछा।
“मालकिन जी, ये खोए और बादाम के लड्डू मेरी मां ने सुबह चार बजे उठकर अपने हाथों से आपके लिए बनाए हैं। हमारे गांव से इस बार बहुत अच्छा और शुद्ध देसी घी आया था, तो मां ने कहा कि सबसे पहले मालकिन के घर का मुंह मीठा करवाएंगे। और ये शॉल मेरी मां ने पिछले तीन महीनों में खुद अपने हाथों से आपके लिए बुना है, ताकि सर्दियों में आपको काम आए,” पल्लवी ने बेहद आदर के साथ कहा।
वसुंधरा देवी की सहेली रश्मि से रहा नहीं गया। उसने थाली के ऊपर रखे उस जालीदार कवर और शॉल को छूते हुए कहा, “ओह माय गॉड वसुंधरा! यह कढ़ाई और यह बुनाई कितनी खूबसूरत है। ऐसी फिनिशिंग तो आज-कल महंगे से महंगे बुटीक में भी नहीं मिलती। और इन लड्डुओं की महक तो बता रही है कि इनमें कितनी शुद्धता और मेहनत छुपी है।”
पल्लवी मुस्कुराई और उसने बहुत ही विनम्रता से वसुंधरा देवी की आंखों में देखते हुए कहा, “मालकिन जी, बापू कहते हैं कि आपने हमेशा हमारा ख्याल रखा है। हम गरीब जरूर हैं, लेकिन हमारा दिल और हमारी नीयत गरीब नहीं है। हमारी हैसियत शायद काजू कतली खरीदने की नहीं है, लेकिन जो चीज हम खुद खाते हैं और जिसे हम अपने से बड़ों को सम्मान के तौर पर देते हैं, उसमें हम कभी कोई मिलावट या कमी नहीं करते। यह हमारा प्यार है, कृपया इसे स्वीकार करें।”
पल्लवी के ये शब्द बहुत ही सहज और मीठे थे, लेकिन वसुंधरा देवी के कानों में ये पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। पल्लवी का हर एक शब्द वसुंधरा देवी के उस अहंकार पर एक करारा तमाचा था, जो उन्होंने दो दिन पहले माधव के सामने दिखाया था।
वसुंधरा देवी को अचानक वह पल याद आ गया जब उन्होंने माधव के हाथों में वह बाजार की सस्ती, मिलावटी सोनपापड़ी का डिब्बा और पुरानी साड़ी थमाई थी। उन्होंने माधव से कहा था कि उनका ‘स्टैंडर्ड’ ही ऐसा है। लेकिन आज, उसी माधव की बेटी ने एक चांदी की थाली में नहीं, बल्कि पीतल की थाली में उन्हें वह तोहफा लाकर दिया था, जिसकी कीमत उनके मखमली डिब्बों की काजू कतली से हजार गुना ज्यादा थी।
काजू कतली पैसों से खरीदी गई थी, जिसमें सिर्फ दिखावा था, लेकिन पल्लवी के इन लड्डुओं में एक गरीब परिवार की सच्ची श्रद्धा, मेहनत और सबसे बड़ी बात, उनका बड़प्पन था। वसुंधरा देवी के करोड़ों रुपये भी पल्लवी की मां के हाथों से बुने गए उस शॉल के एक धागे की कीमत नहीं चुका सकते थे।
वसुंधरा देवी के हाथ कांप रहे थे जब उन्होंने पल्लवी के हाथों से वह थाली ली। उनकी आंखें शर्म और आत्मग्लानि से झुक गई थीं। उनके पास उस वक्त बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे। उन्हें पहली बार अहसास हो रहा था कि असली स्टैंडर्ड बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि इंसान के विचारों से तय होता है। एक गरीब नौकर ने अपने छोटे से घर से इतनी अनमोल चीज भेजकर उनके आलीशान महल की सारी अमीरी को बौना साबित कर दिया था।
उन्होंने पल्लवी के सिर पर हाथ रखा और रुंधे हुए गले से सिर्फ इतना कह पाईं, “तुम्हारी मां से कहना पल्लवी, कि इससे कीमती और मीठा तोहफा मुझे आज तक किसी ने नहीं दिया।”
पल्लवी एक संतोष भरी मुस्कान के साथ वहां से चली गई, लेकिन वसुंधरा देवी के अंदर बैठे उस अहंकारी इंसान को वह हमेशा के लिए मार गई। उस दिन वसुंधरा देवी को यह समझ आ गया कि कपड़े और मकान इंसान को अमीर बना सकते हैं, लेकिन इंसान की असली रईसी उसके दिल की गहराई में बसती है।
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