औरत का औरत पर भरोसा…!! – मीनू झा

कैसी औरत है ये दुकान वाली विनय..इसकी दुकान पर बैठकर दिन भर मनचले आती जाती लड़कियों पर फब्तियां कसते रहते हैं और उन्हें मना करना,डांटना फटकारना तो दूर ये भी टुकुर टुकुर देखती और मजे लेती रहती है। नेहा उसकी भी मजबूरी तो समझो,बेचारी का पति पहले चाय पान की दुकान चलाता था..उसका जबसे एक्सीडेंट … Read more

अभी देर नहीं हुई – अनिता गुप्ता

” अरे यार ! अगर तुमने भी जॉब ज्वॉइन कर ली होती तो आज तुम भी मेरी तरह प्रिंसीपल होती।” सुनिता ने अपनी बचपन की सहेली सीमा से कहा। ” हां यार ! मुझको भी कभी – कभी बहुत दुख होता है, जॉब नहीं करने का। आरपीएससी में चयन होने के बाद भी जॉब नहीं … Read more

प्यारा सा बन्धन — डा. मधु आंधीवाल

रमा आज बहुत खुश थी कल उसकी मनु की शादी है । ऐसा लग रहा है शायद कभी और किसी की शादी ही ना हुई पहले कभी । रमा बीते दिनों की यादों में खो गयी । जब वह इस हथेली में शादी होकर आई तब बहुत रौनक थी । सास ,जमींदार ससुर , दो … Read more

मैंने अपनों पर कितना भरोसा किया था – के कामेश्वरी

माधवी ऑफिस जा रही थी। उसी समय देवरानी ने फ़ोन किया था कि दीदी आज आप ऑफिस मत जाइए शायद मुझे अस्पताल जाना पड़ेगा।उसका नवाँ महीना चल रहा था इसलिए वह माधवी को अपने साथ अस्पताल चलने को कह रही थी । उधर से देवरानी की आवाज़ सुनाई दी आप मेरे साथ चल रही हैं … Read more

भरोसा खुद पर – गोमती सिंह 

—–आज रीना ससुराल में  पूरे एक महीना दस दिन ब्यतीत करके पहली बार मायका आ रही थी।  माँ की धड़कन तेज़ तेज़ गति से चल रहा था। पता नहीं रीना का ससुराल का पहला अनुभव कैसा होगा ! वह अच्छी तरह से जांच परख कर रिश्ता तय की थी । मगर माँ जब बेटी को … Read more

फिर भरोसा क्यों टूटा?? – रश्मि प्रकाश

कभी-कभी इंसान इतना बेबस हों जाता है कि उस इंसान को भी सुना देता है जिसे वो बहुत अच्छी तरह से जानता हो…. ऐसा ही आज सद्भावना निवास में हुआ था जहाँ घर की बेटी तो नहीं पल बेटी जैसी पर भरोसा नहीं किया जा सका था….कनिका वो लड़की जो इस घर को अपना और … Read more

अपने – ज्योति अप्रतिम

सुनो ,एक बात कहना है तुमसे।बहुत दिनों से सोच रहा हूँ ,तुम्हें बताऊँ। नौकरी का कोई भरोसा नहीं है। मंदी को देखते हुए छंटनी हो सकती है। राम ने पत्नी से कहा। तो फिर क्या सोचा आपने ? पत्नी ने चिंतित स्वरों में पूछा। मैं सोच रहा हूँ कि एक छोटा सा बिज़नेस शुरू करूँ … Read more

बिखरते रिश्ते – के कामेश्वरी

यश ऑफिस से थक कर आता है देखता है कि बैठक में सूटकेस रखे थे उसे आश्चर्य होता है कि इंडिया से कौन आया है क्योंकि इतने बड़े सूटकेस तो वहाँ से ही आते हैं । दीप्ति को पुकारता हुआ अंदर जाता है और पूछता है कि दीप्ति इंडिया से कोई आए हैं क्या ? … Read more

मेरी माँ–कहानी–देवेन्द्र कुमार

मुझे बाज़ार जाने के लिए रिक्शा की तलाश थी। आसपास कोई रिक्शावाला दिखाई नहीं दे रहा था। मैं इधर उधर देखता खड़ा था,तभी एक रिक्शा मेरी ओर आती नजर आई। रिक्शा चालक को देख कर मैं चौंक गया। वह तो कोई बच्चा लगा मुझे। वह रिक्शा चला नहीं पा रहा था। आखिर एक बच्चे को … Read more

हरी चूड़ियाँ – ऋता शेखर ‘मधु’

ऑफिस जाते समय ट्रैफिक सिग्नल पर दो मिनट के लिए रुकना रोजमर्रा की बात थी| जब गाड़ी वहा़ँ पर रुकती तो कार का शीशा खटखटा कर अपने हाथ फैलाने वाले उन विशेष टोली के सदस्यों को देखना भी आम हो चुका था| उस समय नेहा कभी शीशा उतारने के लिए सोच नहीं पाती क्योंकि उन्हें … Read more

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