जो बोया है वही तो काटना पड़ता है – मंजू ओमर

नीता ओ नीता अवनि और आकाश आ गए क्या, उनसे कह दो थोड़ी देर मेरे पास आकर  बैठे। और तुम भी नहीं बैठती मेरे पास बस दिनभर काम का बहाना बना कर मुझसे दूर दूर रहती हो, अमित आवाजें दे रहा था, लेकिन कोई सुन नहीं रहा था। ये रोज का हो गया था अमित … Read more

पड़ाव – डॉ बीना कुण्डलिया

आँगन के पीछे बगीचे में बिछें फोल्डिंग बैड पर पड़े पड़े हरीश बाबू लम्बी लम्बी सांसें ले रहे। अब तो जोरों से खांसने भर की भी ताकत नहीं बची थी उनके शरीर में, शरीर सूखकर मात्र लकड़ी का ढांचा सा रह गया था । कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं जो चीखते चिल्लाते नहीं बस … Read more

अमावस  का सच – एम. पी. सिंह

बाबूलाल कें खेत की मुंडेर पर एक बरगद का पेड़ था ओर उसकें पास एक झोपडी मैं एक ब्रम्चारी साघु बाबा रहता था. आसपास कें सब गाँव मैं मशहूर था कि पेड़ पर भूत रहता हैं. बाबा सुबह शाम पेड़ कें नीचे पूजा पाठ करता जिससे गावं कें लोग भूत कें प्रकोप से बचें रहते. … Read more

जिन्दगी की दूसरी पारी – बीना शुक्ला अवस्थी

आज हरिद्वार के इस होटल में काम करते महेन्द्र को पूरे पॉच साल हो गये। आज से पॉच साल पहले वह सेवा निवृत्त हुआ था। बहुत खुश था वह जिन्दगी की दूसरी पारी अपने परिवार के साथ बितायेगा।‌ जिन्दगी भर नौकरी के कारण न घर परिवार को समय दे पाया और न खुद को। माता … Read more

हम फिर मिलेंगे कभी – वीणा राज 

ठंड के मौसम में चाय की भाप मन को आत्मिक तुष्टि का एहसास करा रही थी. जगजीत सिंह की ग़ज़ल, कप से उठता भाप और पेड़ों से छनकर आती धूप ने बालकनी में बैठी तृषा को स्वर्गिक आनन्द दे रखा था . साथ में मूंगफली के गुलाबी दानों को एक एक कर मुंह में डालती … Read more

ज़िन्दगी की दूसरी पारी – बिमला रावत जड़धारी

दिव्या ने कभी नहीं सोचा था कि जिन्दगी की दूसरी पारी इतनी खुबसूरत होगी। कभी शौक से सीखा हुआ योगा आज उसका व्यक्तित्व ही बदल देगा।कभी घर से बाहर ना निकलने वाली दिव्या अपने घर के काम में ही व्यस्त रहती। दिव्या के दो बच्चे, दोनों ही अपनी गृहस्थी में व्यस्त रहते। कभी वह अपने … Read more

जिंदगी की दूसरी पारी – शिवांगी जैन

तालियो की तेज गड़गड़ाहट और मंच की ओर से कानों में सुनाई पड़ते अपनी बेटी शुभि के तीन वाक्य  ‘जिंदगी की दूसरी पारी ‘…  शिखा की आंखों में खुशी व चेहरे पर संतुष्टि के भाव जाग गए। शुभि ने अपना अवार्ड अपनी मां को देते हुए कहा ,मेरी इस कामयाबी का श्रेय मेरी मां को … Read more

दूसरी पारी – खुशी

राघव जी एक सीधे साधे ईमानदार आदमी थे। परिवार में पत्नी आरती तीन बच्चे महक,प्रफुल और खुशबू थे।मां पिताजी गांव में रहते थे।बचपन से ही राघव पढ़ाई लिखाई में अव्वल थे।तो जब उनकी 10 वीं की परीक्षा हुई तो ख़ाली समय में वो गांव के बच्चों को पढ़ाते थे।सब कहते राघव भैया ने पढ़ाया तो … Read more

भरोसे की डोर – सुदर्शन सचदेवा

“मम्मी जी, आप आराम कर लीजिए… दुकान मैं संभाल लूंगी।” रिया ने धीरे से कहा तो सविता जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन मन में सवाल भी था। आजकल की बहुएँ कहाँ घर और कारोबार दोनों संभालती हैं? दो दिन जोश दिखाती हैं, फिर अपने फोन और … Read more

मोह से मुक्ति – शुभ्रा बैनर्जी 

शिवांश इस अगले हफ्ते सेवानिवृत्त हो रहे थे। छह महीने पहले ही से पार्टी की लिस्ट बना रहे थे।किसे-किसे बुलाना है?कैटरिंग किसे देना है? मेनू में क्या रहेगा? सुषमा अपने पति की आदत से भलीभांति परिचित थी।बस बहाना चाहिए, खिलाने का।अपने पैसे खर्च होने पर इतना खुश होने वाला इंसान शिवांश ही हो सकता था।बच्चों … Read more

error: Content is protected !!