त्याग का पावन सिंदूर

 वेदांत की आँखों से आँसू छलक कर उसके कानों की तरफ बहने लगे। उसने देखा कि राधिका के माथे पर सिंदूर था, लेकिन शौर्य की आँखों में वही बचपन का निश्छल, पवित्र भाईचारा था। वह सब समझ चुका था। अचेतन अवस्था में भी शायद उसकी आत्मा इस त्याग को महसूस कर रही थी। उसने अपनी … Read more

मायके का मोह – बिमला रावत जड़धारी

सुनीता की शादी उसी मोहल्ले में हुई जहाॅं उसका मायका था। सुनीता के दो भाई थे, बड़ा भाई राजेश, और सुनीता से छोटा भाई राकेश। बारहवीं पास करते ही सुनीता की शादी हो गई। सुनीता का मायका घर के पास ही था पर उसका मायका जाना बहुत ही कम था।  तीज त्यौहार में ही जाती थी। … Read more

मायके का मोह – श्वेता अग्रवाल

“मायके का इतना भी क्या मोह कि ससुराल की कोई फ़िक्र ही नहीं! बड़ी बहन तो आराम से विदेश में रह रही है और तू यहाँ घर-द्वार छोड़कर मायके भागती रहती है।” मृणालिनी के घर घुसते ही उसकी सास नीलांजना भड़कते हुए बोलीं। यह सुनते ही मृणालिनी को बहुत गुस्सा आया, लेकिन खुद को संयत … Read more

डोर खुशी की – अंजना ठाकुर

मायका ही एक ऐसी जगह है जिसका नाम सुनते ही हर् एक स्त्री चाहे कितनी भी परेशान हो चेहरे पर खुशी आ जाती है मायका एक डोर है खुशी की जो हर् लड़की के मन को उसके बचपन की यादों से बांधे रखती है जहां जाकर वो फिर से नयी उमंग से भर जाती है … Read more

पराए जब अपने बने

मनीष ने आगे बढ़कर अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ लीं। उनकी आँखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आँसू बह निकले। “भाभी जी, आज आपने मुझे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया है। मैं जिस घमंड में जीता था कि सिर्फ खून के रिश्ते ही अपने होते हैं, वह घमंड आज पूरी तरह टूट चुका है। … Read more

उम्मीद की सुबह

 अवनी आगे बोली, “परिवार तो गया ही, पर इंसानियत का असली चेहरा तब दिखा जब रिश्तेदारों ने मेरे घर आना तो दूर, फोन उठाकर सांत्वना देना भी बंद कर दिया। सबको डर था कि कहीं उन्हें संक्रमण न हो जाए। और जिस लड़के से मेरी सगाई हुई थी, जिसके साथ मैंने पूरी ज़िंदगी बिताने के … Read more

साये से परे की धूप

 सुजाता ने दूध की घूंट भरते हुए रिया से कहा, “देखा बेटी, इसे कहते हैं दिमाग! अब बस दो दिन की बात और है। उस सीधे-साधे गिरीश के कान ऐसे भरे हैं कि वह खुद इस मनहूस को पागलखाने छोड़ आएगा। एक बार यह रास्ते से हटी, फिर यह सारा मकान, बैंक बैलेंस और जायदाद … Read more

कोहरा – संध्या त्रिपाठी

सौम्या ने आंचल फैलाकर न जाने कितने मंदिरों में मन्नत मांगी होगी… कभी नर्मदा मैया के सामने, कभी वैष्णो देवी के दरबार में, कभी पीपल के पेड़ के नीचे दिया जलाकर… जिसने जो कहा, सबकी सुनी…। किसी ने कहा सोमवार का व्रत रखो, तो रखा…। किसी ने कहा कन्या को खाना खिलाओ, तो खिलाया…. भगवान … Read more

सुकून की चौखट

अनिता बुआ की आंखों में पश्चाताप और गर्व के आंसू छलक आए। उन्होंने पंखुड़ी को कसकर गले लगा लिया और बोलीं, “बेटा, आज तुमने मेरी पुरानी और संकीर्ण सोच की आंखें खोल दीं। तुमने साबित कर दिया कि आधुनिक होने का मतलब अपनी जड़ों को भूलना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को नई ऊर्जा से सींचना … Read more

दो पीढ़ियाँ, एक कप चाय

सदानंद जी ने धीमे से मुस्कराते हुए अपनी चाल चली और बोले, “बेटा, जब दो समझदार और स्वाभिमानी औरतें अपने-अपने सच को साबित करने में लगी हों, तो समझदार पुरुषों को बीच में नहीं बोलना चाहिए, बल्कि एक तीसरा रास्ता निकालना चाहिए।” सदानंद जी बिना कुछ कहे उठे, छाता उठाया और चुपचाप बाहर निकल गए। … Read more

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