कर्मों का अनकहा हिसाब: एक निस्वार्थ कदम

अनिकेत के जीवन में पिछले कुछ महीने किसी डरावने सपने से कम नहीं थे। पिता के अचानक हुए देहांत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उसके युवा कंधों पर आ गिरी थी। घर में एक बीमार माँ और कॉलेज के अंतिम वर्ष में पढ़ रही छोटी बहन रिया थी। पिता की जमा-पूंजी माँ के इलाज … Read more

बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – कृतिका भण्डारी

शाम के धुंधलके में बारिश की हल्की फुहारें शहर की सड़कों को भिगो रही थीं। ऑफिस की दसवीं मंजिल पर स्थित केबिन में खामोशी छाई हुई थी। यह खामोशी किसी उदासी की नहीं, बल्कि एक लंबे और सफल सफर के खत्म होने की थी। श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी। … Read more

जब स्वाभिमान ने तोड़ी अपमान की बेड़ियां – निधि सहाय

अवनि आज बहुत देर तक आईने के सामने खड़ी रही। कांच में उभरने वाला अक्स उसे अपना सा नहीं लग रहा था। यह वह अवनि तो बिल्कुल नहीं थी जो पांच साल पहले इस घर में दुल्हन बनकर आई थी। तब वह छरहरी थी, उसके चेहरे पर एक अलग सा नूर था और उसके पति … Read more

**एक अधूरी तस्वीर: दर्द और प्यार का सफर** – मीरा महेश

काव्या ने अपनी माँ, नंदिनी को सिर्फ दीवारों पर टंगी उन बेजान तस्वीरों में ही देखा था। उन तस्वीरों में नंदिनी की आँखें इतनी जीवंत लगती थीं, मानो वो अभी तस्वीर से बाहर आकर काव्या को गले लगा लेंगी। काव्या के लिए उसकी माँ किसी परीकथा की उस रानी जैसी थी, जिसके किस्से उसने अपनी … Read more

एक ज़िद्दी इश्क – नमिता पंडित

 सुहानी अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही एक सफेद रंग की एसयूवी आकर ठीक उसके सामने रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और इससे पहले कि सुहानी कोई प्रतिक्रिया दे पाती, शौर्य ने उसका हाथ पकड़ा और उसे गाड़ी में बैठने का इशारा किया। उसकी आँखों में एक अजीब सी जल्दबाज़ी और एक ऐसा अधिकार … Read more

किस रूप में… – उषा भारद्वाज

  मोना रसोई में काम कर रही थी।बाहर तेज बारिश हो रही है। थोड़ी देर में ओले भी गिरने लगे । वो खिड़की से बाहर देखने लगी। तभी एक बूढ़ा कमजोर सा भिखारी दिखाई दिया जो सामने पेड़ के नीचे खड़ा था। वो पूरी तरह भीग गया था।  उसने कुछ सोचा फिर  छाता लेकर उसके पास … Read more

सहारा – मधु वशिष्ठ

डोर बैल की आवाज सुनकर भाभी बाहर गईं। थोड़ी देर में उनकी चिल्लाने की आवाज सुनकर मैं भी बाहर निकली तो मैंने देखा भाभी बाहर खड़े कुछ सफाई कर्मचारी जैसे दिखने वाले लोगों से जोर जोर से बोल रही थीं।  कहां काम करते हो तुम ? क्या सरकार तुम्हें तनख्वाह नहीं देती ? जब तुम्हें … Read more

बच्चों के इम्तिहान, मम्मी परेशान – एम. पी. सिंह

 हास्य कहानी  मार्च का महीना शुरू होते ही घर का माहौल बदल जाता है। कारण, बच्चों के इम्तिहान,  पर असली परीक्षा तो मम्मी की ही शुरू हो जाती है। वैसे, मम्मी तो बच्चों के लिए हमेशा ही परेशान रहती है. इम्तिहान के दिनों मैं बच्चे भी मम्मी का पूरा पूरा फायदा उठाते है. कभी बोलते … Read more

*बड़े भाई हो, बाप मत बनो* – तोषिका

आप मेरे *बड़े भाई हो, बाप मत बनो*। इतनी टोका ताकि तो पापा भी नहीं करते थे मेरे काम में जितना आप कर देते हो। चीखते हुए विशाल बोला अपने बड़े भाई देव से। उधर मंदिर से वापिस आती सुधा को घर के बाहर से चीखने की आवाज आई तो सुधा ने जल्दी से घर … Read more

अप्रैल फूल – एम. पी. सिंह

हमारी कॉलोनी मैं शीतल कुमार नाम का एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता है. उसके नाम के जैसा ही उसका चरित्र था. खाना बनाना, कपड़े धोना, हर आने जाने वाली औरतो से बातें करना. सारी कॉलोनी की खबर रखना उसकी हॉबी थीं. इसके अलावा आते जाते लोगों से मजाख भी करता था, कई बार … Read more

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