नेमप्लेट

  “हँस इसलिए रही हूँ सिद्धार्थ, क्योंकि आज मुझे समझ आया कि तुम जैसे लोग प्रेम की नहीं, केवल अपनी सत्ता की भाषा समझते हो। तुमने समझा था कि तुमने मुझे इस घर के पिंजरे में ऐसा कैद कर दिया है कि मैं अपनी आवाज़ ही भूल गई हूँ। पर तुमने गलत समझा था। तख्ती पर … Read more

उम्मीदों की नई कोपल

सुखिया की बात सुनकर दीनदयाल के पैरों तले से जमीन खिसक गई। “हे मेरे मालिक!” बस यही दो शब्द उसके कांपते होठों से निकले और वह निढाल होकर चौखट पर ही बैठ गया। उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। एक अनजाना, भयानक डर उसके दिलो-दिमाग पर छा गया। जानकी रोने लगी और सहमी हुई … Read more

विश्वास की छांव

ननद की खरी-खरी बात सुनकर कौशल्या जी का चेहरा फक पड़ गया। उन्होंने बिना कुछ कहे जल्दी से फोन काट दिया। सरोज की बातें तीर की तरह उनके सीने में चुभ रही थीं। वे सोफे पर बैठ गईं और शून्य में ताकने लगीं। क्या सच में वे गलत कर रही थीं? क्या बहू के प्रति … Read more

देवदूत: जब अजनबियों ने बाँध ली ज़िंदगी की डोर

जिंदगी कभी-कभी ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ इंसान की सोचने-समझने की सारी ताकत शून्य हो जाती है। जब भी उस मनहूस दोपहर की याद कौंधती है, मेरी रूह तक कांप उठती है। यह बात तब की है जब मेरे घुटनों और रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या आ गई थी। चलने-फिरने … Read more

साक्षात देवी के चरण

रंजना ने शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद आत्मीयता से समझाया, “शिखा, ईश्वर ने न कोई जाति बनाई है, न कोई वर्ण। मां भगवती किसी कुल या अमीरी-गरीबी की मोहताज नहीं हैं। जहां अभाव है, जहां भूख है, वहीं सेवा का सच्चा अर्थ है। जो पहले से ही तृप्त हैं, उन्हें और खिलाना … Read more

नेकी की खनकती चूड़ियां

 सावित्री के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कांपती आवाज में कहा, “जब धीरज अस्पताल में थे, तो वेयरहाउस वालों ने बिना कोई मुआवजा दिए उनकी जगह किसी दूसरे नौजवान लड़के को काम पर रख लिया। पिछले डेढ़ महीने से मेरे पति बिस्तर पर लाचार पड़े हैं। उनके इलाज और दवाओं में … Read more

रोशनी की लकीर

 राघव मन ही मन सोच रहा था कि शायद कल रात मां से फोन पर की गई उसकी बातचीत ऊपर वाले ने सुन ली। कल रात जब वह मायूस होकर दुकान बंद कर रहा था, तो उसकी आंखों से बेबसी के आंसू टपक पड़े थे। उसने फोन पर अपनी मां से कहा था, “मां, बड़े … Read more

कड़वाहट में घुली मिठास

शादी के महज़ दो महीने ही बीते थे। नए घर की आबोहवा, नए लोग और हर कदम पर एक अनजानी परीक्षा। जब मैं विदा होकर इस घर में आई थी, तो मेरे ससुर पंडित दीनानाथ जी ने बड़े गर्व से पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँटी थी। जब भी कोई रिश्तेदार या मिलने-जुलने वाला आता, बाबूजी … Read more

माँ का मौन और एक बेटे का अहसास

आज उसे एहसास हुआ था कि हम बच्चे कितने स्वार्थी हो जाते हैं। हम अपने करियर, अपनी ज़िंदगी, अपने दोस्तों और अपनी नई ज़रूरतों में इतने खो जाते हैं कि हमें यह दिखाई ही नहीं देता कि हमारे माता-पिता उसी पुरानी धुरी पर खड़े रहकर हमारी सफलता की इमारत को सहारा दे रहे हैं। रोहन … Read more

धूप-छांव का सफर और वह शाम

  “रघु, तूने आज मेरी आंखें खोल दीं। पिछले कुछ सालों से मैं भी खुद को लाचार और फालतू समझने लगा था। मुझे लगता था कि जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद जिंदगी का मकसद खत्म हो गया है। जोड़ों के दर्द और बीपी की गोलियों के बीच मैं हंसना ही भूल गया था। लेकिन आज तेरे … Read more

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