रामेश्वरम ने अपनी पत्नी कमला से वादा किया था, एक सुंदर घर बनाकर कमला को उपहार देने का।हर महीने हार्ड वेयर की दुकान जाते, साथ में एक छोटी सी डायरी और पेन लेकर।दुकान में जाकर सीमेंट,और सरिया की कीमत पूछकर लिखते थे। दुकानदार ने पूछा एक दिन”दादा, पिछले बारह सालों से यही काम कर रहे हो।भाव ही लिखते रहोगे, या कभी घर भी बनाओगे।”
रामेश्वरम बाबू हंसकर कहते”घर तो मैं जरूर बनाऊंगा,पर पैसें जमा लूं पहले।मेरी जिस दिन बचत हो जाएगी,मैं घर बना लूंगा।”,उनके जाते ही दुकान के अन्य कर्मचारी हंस पड़ते और कहते”बना चुके घर में।अरे सालों से बस भाव पूछकर लिखते देखा है हमने,और उससे आगे तो रामेश्वरम बाबू कुछ करते ही नहीं।”
बाहर जाते-आते ये सभी बातें उनके कानों तक भी पहुंचती।अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते-करते, समय जाने कब इतनी तेजी से निकल गया।दो साल बचे हैं अब रिटायर होने को।पत्नी से परामर्श कर लोन ले लिया , घर बनाने के लिए अब रामेश्वरम जी ने।बड़ा बेटा (रोहित)और बहू(लावण्या)दोनों नोकरी करते थे।घर खर्च के नाम से बाजार से सब्जी लाने का ही योगदान था उनका।तीन बेटियां थीं।रमा(बड़ी),उमा(मंझली)और रिया(सबसे छोटी)।पापा के घर के लोन से तनख्वाह काफ़ी कम आने लगी थी।उन तीनों ने ट्यूशन लेना शुरू कर दिया।रमा, बच्चों को पढ़ाती घर पर।उमा डांस सिखाती और रिया सिलाई -कढ़ाई।तीनों ने हर महीने अपने पापा को घर खर्च में मदद करने का वचन दिया था।बदले में रामेश्वरम जी ने भी वादा किया था उनसे”इस घर में भले छोटे-छोटे हों पर तीन कमरे मेरी बेटियों के रहेंगें हमेशा।ताकि ससुराल से मायके आने में उन्हें यह ना सोचना पड़े कि भाई के पास जा रही हैं
इस घर को बनाने में तीनों ने अपना योगदान दिया है।” देखते-देखते वह दिन आ ही गया ,जब घर बनकर तैयार हो गया था।बड़े बेटे बहू को सबसे बड़ा कमरा चाहिए था,अटैच्ड बाथरूम वाला,सो उन्हें वहीं कमरा दिया गया।तीन बेटियों के लिए छोटे-छोटे तीन कमरे और एक कॉमन बाथरूम,जो माता-पिता के लिए भी था। रिटायरमेंट वाले दिन रामेश्वरम जी को विदाई समारोह में फंड और ग्रैच्युटी का पैसा मिला,तो रोहित बोला”पापा,इन पैसों से पहले आप पूरा लोन चुका दो।बहनों की शादी के लिए बाद में सोचेंगें।हां,हमसे तो उम्मीद लगाना भी मत,कि हम कुछ मदद कर पाएंगे।हमारा ख़ुद का भी भविष्य है।बेटियों की शादी में अंधाधुंध खर्च करके आप हम सभी को रास्ते में ले आएंगें।”
रामेश्वरम जी को रोहित की बातों में वितिष्णा साफ दिख रही थी। उन्होंने कमला के साथ पहले ही निर्णय ले लिया था ,जिसे बच्चों को सुनाना था। उन्होंने सभी बच्चों को हॉल में आने के लिए कहा।सबके आते ही उन्होंने कहना शुरू किया” देखो बच्चों,अपनी पैंतीस साल की नौकरी में मैंने ना कभी एक पैसा रिश्वत में लिया,ना दिया।मैंने बहुत पैसे तो नहीं कमाए,पर सम्मान कमाया है। रिटायरमेंट के पैसों को मैं चार भाग में बांटना चाहता हूं।तीन हिस्सा तीनों बेटियों की शादी के लिए,और एक हिस्सा लोन (जितना हो सके)पटाने के लिए।हर महीने पेंशन तो आएगी ही।मैंने एक कंपनी में गार्ड की नौकरी भी ढूंढ़ ली है।लोन पट जाएगा दो तीन साल में।तुम लोग निश्चिंत रहो।मेरी जिम्मेदारी मैं ही पूरी करूंगा,किसी और पर यह बोझ मैं आने नहीं दूंगा।एक बात और कहना चाहता हूं,कि यदि रोहित घर खर्च में थोड़ा और मदद कर दे, तो काफी सहूलियत हो जाएगी।लोन चुकता होने के बाद, उसे कुछ भी नहीं देना पड़ेगा फिर।”
पिता की बात सुनकर रोहित आगबबूला होकर बोला” वाह!पापा,आपने तो मुझे पराया भी नहीं समझा और ना ही अपना।कमरे आपकी बेटियों के लिए हमेशा के लिए।शादी के बाद आएंगी, तो उनके खर्चे किसके मत्थे, मेरे ना।आप तो लोन चुकाने की बात कहकर बच जाओगे, और फंसेंगे हम।हमारा भविष्य नहीं है क्या? हमारे बच्चे नहीं होंगें क्या? उनकी पढ़ाई-लिखाई का खर्च आज से तीस -चालीस गुना होगा।इससे तो बेहतर है, एक साथ तीनों बहनों की शादी करवा देतें हैं मंदिर में।फ़ालतू लोगों को दावत खिलाकर खुद भूख से मरना तो बेवकूफी होगी।मैं जितना खर्च पहले देता था, उससे एक पैसा ज्यादा नहीं दे पाऊंगा।साफ -साफ बता दिया मैंने।”
रोहित से ऐसे ही जवाब की अपेक्षा थी सभी को।कोई आश्चर्य नहीं हुआ किसी को।तब रामेश्वरम जी की जगह कमला जी बोलीं” रोहित,पापा ने सबसे ज्यादा पैसे खर्च कर शुरू से तुझे अच्छे स्कूल में पढ़ने भेजा। खेलकूद में भी तेरा पूरा सपोर्ट किया। एकेडमी में डालने का शौक भी तेरे पापा का ही था।इसलिए आज तू अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी कर पा रहा है।और रही बात तीनों बहनों की शादी की, तो वह तो संयोग है।यदि एक साथ लग गई तो, कर देंगे।नहीं लगी तो एक-एक करके करेंगे।तुम लोगों के खान-पान, रहन-सहन में जिस आदमी ने अपनी छोटी सी आयु में भी समझौता नहीं किया, उससे यह उम्मीद कैसे कर सकते हो तुम, कि वह ऐसे ही मंदिर में शादी करवा देंगे बेटियों की।तुझे याद है ना, जब अपनी शादी में तूने मुझसे कहा था कि मैं तो तुम्हारा राजा बेटा हूं, तो शादी भी राजकुमार की तरह ही होनी चाहिए।और ईश्वर के आशीर्वाद से तेरे पापा ने राजकुमार की तरह ही तेरी शादी की थी।अब खर्चों का हिसाब करके, घर में फूट मत डाल।”
रोहित को मां की सीख जाहिर है पसंद नहीं आई।रोहित की पत्नी भी पति के साथ अपने कमरे में चली गई। ईश्वर की अनुकंपा से रमा की शादी तय हो गई ।दो महीने के अंदर शादी तय हुई थी।सभी तैयारियां जोर-शोर से पूरी करके निश्चिंत हुए ही थे रामेश्वरम जी, कि तभी अचानक बुरी खबर आई कि बारात के साथ नाचते-गाते आते हुए दामाद जी को दिल का दौरा पड़ा, और उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।इतना बड़ा सदमा सह नहीं पाए वे। अस्पताल में जाकर दामाद की पार्थिव देह देख बहुत रोए।घर पर जब सुहागन के वेश में सजी बेटी को घंटों के भीतर सफेद थान पहने देखा तो, चकरा कर गिर ही गए।अस्पताल में भर्ती करने पर भी बचाया नहीं जा सका उन्हें।
अब घर पर मुसीबतों के पहाड़ एक के बाद एक मानो फट रहे थे।शादी में जो खर्च हो चुके थे,उन्हें तो अब लौटाया नहीं जा सकता था।बहू ने तो कह दिया कि किसी विदुर के साथ जल्दी शादी करवा दिया जाए रमा की।बच्चे भी होंगें तो चलेगा।यहां मायके में बैठकर मूंग ही दलेगी।
बहू का प्रस्ताव कमला जी को मान्य नहीं हुआ।
धीरे-धीरे घर में कलह बढ़ता ही जा रहा था। बेटियां अब भी ट्यूशन करके घर खर्च चला रहीं थीं। रामेश्वरम जी के पेंशन से लोन की ई एम आई भरी जा रही थी।रोहित ने लगभग मां और बहनों से बात करना भी बंद कर दिया था।एक दिन अचानक एक वकील को लेकर पहुंचा रोहित और बोला कमला जी से”मां,ऐसे रोज-रोज की चिक-चिक से मैं परेशान हो गया हूं।हर दिन एक नई उलझन,एक नई मुसीबत।हर दिन एक ना एक लड़के वाले घर पर आ ही रहे हैं। उनके खाने-पीने की व्यवस्था करके मैं थक जा रहा हूं।मैंने एक उपाय ढूंढ़ा है।तुम घर का बंटवारा कर दो।एक हिस्सा हमें दे दो, और एक हिस्से में तुम रहो बेटियों के साथ।मैं अपने हिस्से के ऊपर में दो कमरे बनवाकर किराए पर चला सकता हूं।बेटा अभी तीन साल का है।कम से कम उसके बड़े होते तक तो कुछ पैसे बचे रहेंगे हमारे पास।”
कमला जी अवाक थीं।इतना स्वार्थी कब और कैसे हो गया ,मेरा बेटा।पिता ने तो बच्चों की परवरिश में कभी भेदभाव नहीं किया,बल्कि हमेशा बेहतर बेटे को ही मिला है।आज यह घर के बंटवारे की बात कर रहा,कल जिस घर को बनाते देख पापा को कितनी खरी -खोटी सुनाई थी इसने।कमला जी ने वकील को नमस्ते किया और बोलीं”वकील साहब आप इस घर का एक एस्टीमेट बनाइये।फिर बराबर बांटकर बताइये,कि रोहित को क्या मिलेगा?”
वकील समझ चुका था कि कमला जी अनपढ़ या गंवार महिला नहीं थी। कानून की जानकारी थी उन्हें।एस्टीमेट बनकर तैयार हुआ तो उन्होंने कमला जी को दिखाया।देखकर कमला जी मुस्कुराई,और बोलीं बेटे से” अच्छा किया कि तूने मेरा मनोबल बढ़ा दिया ,आज वकील साहब को लाकर।देख बेटा,घर के बंटवारे में तेरे हिस्से सिर्फ एक कमरा ही आ रहा है।बाथरूम भी तेरे हिस्से नहीं आएगा।उसी कमरे के ऊपर एक कमरा बनवा लेना तुम।फिर चाहे किराए पर देना या तुम रहना ।तीनों बेटियों का एक-एक कतरा,मेरा और पापा वाला एक कमरा मेरा होगा।कॉमन बाथरूम तीनों बहनों का और मेरा होगा।ऐसा इस घर के वसीयत में लिखवाया है पापा ने।”
” यह तो धोखा है मां,पापा ने जानबूझकर मुझे कम हिस्सा दिया है।मैं चुप नहीं बैठने वाला।इस घर की ईंट से ईंट बजा दूंगा।छोड़ूंगा तो नहीं अपना हिस्सा इस घर से।”रोहित गुस्से से कांपते हुए चिल्लाने लगा था।कमला जी ने तब सहज होकर कहा” पापा के घर बनवाने का विरोध सिर्फ तूने किया था।जिस ईंट से ईंट बजाने की धमकी तू मुझे दे रहा है ना,उन ईंटों में से एक भी ईंट तेरी कमाई की नहीं है।इस घर में शुरू से लेकर आखिर तक पैसा लगाया ,तेरे पापा ने और बहनों ने।और एक बात सुन बेटा,घर ईंट पत्थर से नहीं बनता,बल्कि घर बनता है प्यार, समर्पण,और दिल से।परिवार के सदस्यों के बीच पल रहे विश्वास से।जब एक दूसरे के ऊपर विश्वास ही नहीं, ममता ही नहीं, प्रेम ही नहीं, तो वह घर , घर नहीं मकान बस रह जाता है।मैं इस तेरे पापा के मन से बनाए इस घर को अपने जीते जी मकान नहीं बनने दूंगीं।जो जिसका हिस्सा पापा ने तय कर दिया है, वो उसी को मिलेगा।बिना बंटवारे के यदि प्रेम से रहोगे, तो पूरा घर ही तुम्हारा है।तुम अकेले मर्द हो इस घर के।अपनी बहनों के रक्षक हो।वो भी तुम्हारी जरूर मदद करेंगीं।पर यदि कानून का डर दिखाया तो , एक कमरे के अलावा तुम्हारा और किसी चीज पर अधिकार नहीं रहेगा।”
मां की बातें सुनकर रोहित को वास्तव में पश्चाताप हुआ।मां के पैरों में गिरकर अपनी लालच को स्वीकार किया उसने।यह भी माना कि घर ईंटों से नहीं दिल से बनता है।
शुभ्रा बैनर्जी