मेरे जीवनसाथी

कुणाल से रहा नहीं गया। वह भीड़ को चीरता हुआ अपनी माँ के पास पहुँचा और धीमे स्वर में बोला, “माँ, आरुषि को बहुत गर्मी लग रही है। वो भारी कपड़ों में है। रस्म को अंदर हॉल में शिफ्ट कर लेते हैं, वहाँ एसी चल रहा है।”

माँ ने उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल हो गया है क्या कुणाल? अंदर हॉल में इतनी औरतों के बैठने की जगह कहाँ है? और फिर आंगन में ही तो रस्में अच्छी लगती हैं। नई बहुओं को थोड़ा बहुत तो सहन करना ही पड़ता है। हमने भी अपने समय में जेठ की दुपहरी में घंटों घूंघट काढ़े रखा है। तू फिक्र मत कर, बस आधे घंटे की बात और है।”

मई का महीना और उत्तर भारत की चिलचिलाती गर्मी। आसमान से जैसे आग बरस रही थी और गर्म लू के थपेड़े घर की दीवारों को भी तपा रहे थे। शहर के जाने-माने रईस और प्रतिष्ठित माथुर परिवार में आज नई नवेली दुल्हन की ‘मुंह दिखाई’ की रस्म चल रही थी। पूरा घर मेहमानों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से खचाखच भरा हुआ था। घर के बड़े से आंगन में एक भव्य शामियाना लगाया गया था, जिसे गेंदे के फूलों और आम के पत्तों से सजाया गया था। शामियाने के नीचे महिलाओं का जमघट लगा था, जहाँ गानों की धुन, ढोलक की थाप और औरतों की हंसी-ठिठोली गूंज रही थी।

शामियाने के ठीक बीचों-बीच एक सजे हुए दीवान पर आरुषि बैठी थी। आरुषि, माथुर परिवार की नई बहू, जिसके हाथों की मेहंदी अभी पूरी तरह से सूखी भी नहीं थी। उसने सुर्ख लाल रंग की एक बेहद भारी कांजीवरम साड़ी पहनी हुई थी, जिस पर सोने और चांदी के तारों का सघन काम था। उसके गले में खानदानी सोने का भारी हार, कानों में बड़े-बड़े झुमके, माथे पर मांगटीका और नाक में नथ थी। दोनों हाथों में कोहनी तक भारी चूड़ियाँ और बाजुबंद जड़े हुए थे। उसके सिर पर एक भारी ज़री का घूंघट था, जिसे रस्म के अनुसार काफी नीचे तक खींचा गया था।

गर्मी अपने चरम पर थी। आंगन में हालांकि बड़े-बड़े कूलर लगाए गए थे, लेकिन इतनी भारी भीड़ और तपती दोपहर के सामने उनकी हवा भी गर्म हो चुकी थी। आरुषि के माथे से पसीने की बूंदें टपक कर उसकी आंखों में जा रही थीं, जिससे उसका काजल फैलने लगा था। भारी साड़ी और गहनों के बोझ तले उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। वह बार-बार छुपकर अपना पसीना पोंछने की कोशिश करती, लेकिन घूंघट के कारण उसे और भी ज्यादा घुटन महसूस हो रही थी।

आस-पास बैठी घर की बड़ी औरतें, बुआ जी और ताई जी, बस इस बात में मशगूल थीं कि आने वाले मेहमान आरुषि के गहनों और उसकी साड़ी की कितनी तारीफ कर रहे हैं। ताई जी अपनी सहेलियों से कह रही थीं, “देखिए, यह हार हमने खास जयपुर से मंगाया है, पूरे पच्चीस तोले का है। बहू को तो जैसे सोने से लाद दिया है हमने।” किसी को भी आरुषि की उस घुटन और बेचैनी का अहसास नहीं हो रहा था।

रस्म के दौरान, हर आने वाली महिला आरुषि का घूंघट उठाती, उसके चेहरे को देखती, लिफाफा पकड़ाती और फिर घूंघट वापस गिरा देती। बार-बार घूंघट उठने और गिरने से आरुषि की हालत और भी खराब हो रही थी। उसे चक्कर आ रहे थे और गला पूरी तरह से सूख चुका था। उसने धीमी आवाज़ में अपनी ननद शिखा से कहा, “दीदी, मुझे थोड़ा पानी दे दीजिए, बहुत प्यास लगी है और घबराहट हो रही है।”

शिखा जैसे ही पानी का गिलास लेने उठी, बुआ जी ने उसे टोक दिया, “अरे शिखा! अभी बहू को पानी मत देना। पानी पिएगी तो बार-बार वाशरूम जाना पड़ेगा और इसकी साड़ी की सारी प्लीट्स खराब हो जाएंगी। और वैसे भी, अभी फोटोग्राफर आने वाला है, मुंह दिखाई की तस्वीरें खिंचनी हैं। अगर इसका मेकअप खराब हो गया तो तस्वीरों में क्या खाक अच्छी लगेगी?”

शिखा ने मजबूरी में आरुषि की तरफ देखा और वापस बैठ गई। “बस थोड़ी देर और सह लो भाभी, फिर कमरे में चली जाना,” शिखा ने धीरे से कहा। आरुषि ने एक गहरी सांस ली और अपनी आंखें बंद कर लीं। उसे लग रहा था जैसे वह किसी भट्टी में बैठी है और अब कुछ ही पलों में बेहोश होकर गिर पड़ेगी।

इधर आंगन से कुछ दूर, दालान के पास खड़े पुरुषों के झुंड में आरुषि का पति, कुणाल, खड़ा था। वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ बातचीत कर रहा था, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार शामियाने की तरफ जा रही थीं। कुणाल एक बहुत ही सुलझा हुआ और समझदार इंसान था। उसने दूर से ही आरुषि की बेचैनी को भांप लिया था। वह देख रहा था कि कैसे आरुषि बार-बार अपने भारी पल्लू को एडजस्ट कर रही है, कैसे उसका सिर नीचे की तरफ झुकता जा रहा है, और कैसे वो पसीने से तर-बतर हो चुकी है।

कुणाल से रहा नहीं गया। वह भीड़ को चीरता हुआ अपनी माँ के पास पहुँचा और धीमे स्वर में बोला, “माँ, आरुषि को बहुत गर्मी लग रही है। वो भारी कपड़ों में है। रस्म को अंदर हॉल में शिफ्ट कर लेते हैं, वहाँ एसी चल रहा है।”

माँ ने उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल हो गया है क्या कुणाल? अंदर हॉल में इतनी औरतों के बैठने की जगह कहाँ है? और फिर आंगन में ही तो रस्में अच्छी लगती हैं। नई बहुओं को थोड़ा बहुत तो सहन करना ही पड़ता है। हमने भी अपने समय में जेठ की दुपहरी में घंटों घूंघट काढ़े रखा है। तू फिक्र मत कर, बस आधे घंटे की बात और है।”

कुणाल ने अपनी ताई जी से भी मिन्नत की, “ताई जी, कम से कम उसका घूंघट तो थोड़ा ऊपर कर दीजिए ताकि उसे हवा लग सके। और उसे पानी तो पिला दीजिए।”

ताई जी ने हंसते हुए आस-पास की औरतों से कहा, “लो भई! कुणाल को तो अभी से अपनी पत्नी की इतनी फिक्र होने लगी। अरे कुणाल बेटा, यह औरतों के बीच का मामला है, तुम यहाँ से जाओ। तस्वीरें खराब हो जाएंगी अगर इसका घूंघट हटा दिया तो। और बहू को गर्मी नहीं लगती, यह तो शगुन का पसीना है।”

चारों तरफ औरतों की हंसी गूंज उठी। कुणाल को यह मज़ाक बिल्कुल पसंद नहीं आया। उसने वापस आरुषि की तरफ देखा। आरुषि का चेहरा अब लाल पड़ने लगा था। उसकी आंखें आधी बंद हो रही थीं और उसका शरीर हल्का-हल्का कांप रहा था। वह इस तपिश को और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थी। अचानक, आरुषि का सिर एक झटके से नीचे की तरफ लुढ़का और वह अपनी जगह पर लड़खड़ा गई। पास बैठी शिखा ने उसे संभाला।

यह देखकर कुणाल के सब्र का बांध टूट गया। उसने एक पल भी नहीं सोचा कि समाज क्या कहेगा, रिश्तेदार क्या सोचेंगे, या घर की बड़ी औरतें उसे क्या ताने देंगी। वह तेजी से शामियाने के बीचों-बीच पहुँच गया। वहां मौजूद सभी महिलाओं की बातें अचानक रुक गईं। सब हैरान रह गईं कि औरतों की इस महफ़िल में कुणाल ऐसे अचानक क्यों आ गया।

कुणाल ने किसी की परवाह किए बिना सीधे आरुषि के पास जाकर उसे सहारा दिया। उसने अपने हाथों से आरुषि के सिर पर रखा वो भारी घूंघट हटाकर पीछे कर दिया। आरुषि का चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और वो बुरी तरह हांफ रही थी। कुणाल ने पास रखी पानी की बोतल उठाई और अपने हाथों से आरुषि को पानी पिलाया।

ताई जी तुरंत चिल्लाईं, “अरे कुणाल! यह क्या कर रहा है? रस्म बीच में है, अभी कई लोगों की मुंह दिखाई बाकी है। तूने बहू का घूंघट क्यों हटा दिया? तस्वीरें अभी बाकी हैं!”

कुणाल ने आरुषि को अपने दोनों हाथों से सहारा देकर खड़ा किया और बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोला, “ताई जी, रस्में इंसानों के लिए बनाई जाती हैं, इंसान रस्मों के लिए नहीं। मेरी पत्नी की तबीयत खराब हो रही है और आप लोगों को तस्वीरों और दिखावे की पड़ी है? मुझे ऐसी कोई रस्म मंजूर नहीं जो मेरी पत्नी की जान पर भारी पड़ जाए।”

उसकी माँ ने आगे बढ़कर कहा, “बेटा, लोग क्या कहेंगे? सब रिश्तेदार बातें बनाएंगे कि बहू कितनी नाज़ुक है और तू जोरू का गुलाम।”

कुणाल ने अपनी माँ की तरफ देखा और कहा, “माँ, लोगों का काम है कहना। लेकिन मेरे लिए लोगों की बातों से ज्यादा आरुषि की जिंदगी और उसकी सेहत मायने रखती है। अगर किसी को मुंह दिखाई की रस्म पूरी करनी है या आशीर्वाद देना है, तो वो अंदर हमारे कमरे में आ सकता है, जहाँ एसी चल रहा है। मेरी पत्नी अब एक पल भी इस भट्टी में नहीं बैठेगी।”

यह कहकर कुणाल ने आरुषि का हाथ मजबूती से थामा और उसे धीरे-धीरे सहारा देते हुए वहां से अंदर घर की तरफ ले जाने लगा। पीछे पूरा आंगन सन्न रह गया था। कुछ औरतें कानाफूसी कर रही थीं, तो कुछ कुणाल के इस कदम की मन ही मन तारीफ भी कर रही थीं कि आज के ज़माने में ऐसा पति मिलना किस्मत की बात है, जो अपनी पत्नी के लिए पूरे समाज से टकरा जाए।

कुणाल ने आरुषि को अंदर उनके वातानुकूलित कमरे में ले जाकर बिस्तर पर लिटाया। उसने उसके भारी गहने उतारने में उसकी मदद की और उसे ठंडा पानी दिया। एसी की ठंडी हवा और कुणाल के इस स्नेहपूर्ण स्पर्श ने आरुषि को तुरंत राहत पहुंचाई। उसकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं।

आरुषि ने अपनी आँखें खोलीं और कुणाल की तरफ देखा। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन यह आंसू दर्द के नहीं, बल्कि एक गहरे सम्मान और प्रेम के थे। आज उसे इस बात का अहसास हो गया था कि भले ही उसका शरीर भारी गहनों और रस्मों के बोझ से दब गया था, लेकिन उसके पति ने उसे एक ऐसा अदृश्य सुरक्षा कवच पहना दिया था, जिसे दुनिया की कोई भी रूढ़िवादी सोच नहीं भेद सकती थी। कुणाल ने बिना कुछ कहे, सिर्फ अपने कर्मों से यह साबित कर दिया था कि विवाह सिर्फ रस्मों का नहीं, बल्कि एक-दूसरे की ढाल बनने का नाम है। उस वातानुकूलित कमरे की ठंडक में, आरुषि ने महसूस किया कि इस तपती दोपहर ने उसे जीवन भर के लिए एक अटूट और सच्चे प्रेम की छांव दे दी है।

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लेखिका : प्रियंका नाथ

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