मुझे माफ कर दो माँ

“रोहन… तुम्हारी माँ… हमें छोड़कर चली गई।”

वाक्य इतना छोटा था, लेकिन रोहन के कानों में किसी बम के धमाके की तरह गूँजा। उसके हाथ से नाश्ते का निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया।

“क्या… क्या कह रहे हैं आप? ओ गॉड! कब… कैसे? परसों तक तो…” रोहन के मुँह से हकलाते हुए एक साथ कई सवाल निकले।

“अभी… बस पंद्रह मिनट पहले। रात भर साँस लेने में तकलीफ थी। सुबह होते-होते… बस शांत हो गई।” इतना कहकर दूसरी तरफ से फोन कट गया। कोई रोना नहीं, कोई विलाप नहीं। सिर्फ एक भयानक यथार्थ की घोषणा, जिसने रोहन की पूरी दुनिया को एक पल में उलट-पुलट कर रख दिया।

 रविवार की सुबह बड़ी ही फुर्सत और सुकून लेकर आई थी।   रोहन अपने महंगे रेक्लाइनर सोफे पर धँसा हुआ था। उसके एक हाथ में इटैलियन रोस्ट कॉफी का मग था और सामने 65 इंच के स्मार्ट टीवी पर उसकी पसंदीदा वेब सीरीज़ का नया सीज़न चल रहा था।

रसोई से आ रही गरमागरम पूरी और तीखी आलू की सब्ज़ी की महक ने माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया था। उसकी पत्नी, नीलम, को वैसे तो कॉन्टिनेंटल खाना पसंद था, लेकिन रविवार को वह खास तौर पर रोहन की फरमाइश पर उत्तर भारतीय नाश्ता बनाती थी। हफ्ते भर की कॉर्पोरेट की थकान, मीटिंग्स का तनाव, टारगेट्स का बोझ—सब कुछ इस एक दिन की शांति के आगे बौना लग रहा था। रोहन के लिए यह सप्ताहांत (वीकेंड) किसी संजीवनी से कम नहीं था, जिसे वह किसी भी कीमत पर बर्बाद नहीं होने देना चाहता था।

तभी सेंटर टेबल पर रखा उसका स्मार्टफोन वाइब्रेट होने लगा। स्क्रीन पर ‘पापा कॉलिंग’ फ्लैश हो रहा था। रोहन ने एक नज़र फोन पर डाली और फिर से टीवी स्क्रीन की तरफ देखने लगा। फोन लगातार बजता रहा। तीस-चालीस सेकंड के बाद आवाज़ बंद हुई, लेकिन चंद पलों बाद ही वह दोबारा बजने लगा। कोई बड़ी बेचैनी या आपातकाल ही हो सकता है जब कोई इतनी सुबह लगातार फोन करे, लेकिन रोहन ने एक गहरी साँस छोड़ी और बिना फोन उठाए उसे साइलेंट मोड पर डाल दिया।

“किसका फोन है? सुबह-सुबह कौन परेशान कर रहा है?” नीलम ने डाइनिंग टेबल पर नाश्ते की प्लेटें सजाते हुए थोड़ी झुंझलाहट से पूछा।

“अरे वही… पापा का है,” रोहन ने मुँह बनाते हुए कहा। “पता नहीं इन्हें रविवार को भी क्या सूझता है। इंसान हफ्ते में एक दिन तो चैन से जी ले।”

नीलम ने तंज कसते हुए कहा, “मैंने तो पहले ही कहा था, एक बार फोन उठा लोगे तो फिर वही पुरानी रामायण शुरू हो जाएगी। लखनऊ की गर्मी, तुम्हारी माँ की तबीयत, पड़ोसियों की पंचायत। और अंत में वही एक बात—’बेटा, तुम लोग मिलने कब आ रहे हो?'”

रोहन ने हामी भरते हुए कॉफी का एक घूंट लिया। उसे नीलम की बात शत-प्रतिशत सही लग रही थी। अभी पिछले ही गुरुवार को तो उसने अपने पिता से बात की थी। तब भी उन्होंने यही कहा था कि माँ की तबीयत इस बार ज़्यादा खराब है। उम्र के साथ दमा बिगड़ गया है और उन्हें रात-रात भर खाँसी के मारे नींद नहीं आती। पापा ने बड़ी उम्मीद से कहा था कि अगर रोहन छुट्टी न ले सके, तो कम से कम कुछ दिनों के लिए नीलम को ही लखनऊ भेज दे ताकि माँ को थोड़ा संबल मिल सके और उनकी देखभाल हो जाए।

लेकिन रोहन ने बड़ी ही रुखाई से उन्हें मना कर दिया था। उसने तर्क दिया था कि आरव के फाइनल एग्जाम सिर पर हैं, नीलम को उसे पढ़ाना होता है और वह इस वक्त शहर से बाहर नहीं जा सकती। “पापा, आप भैया और भाभी को क्यों नहीं बुला लेते? और रही बात देखभाल की, तो मैंने आपको उस दिन बीस हज़ार रुपये अलग से भेजे तो थे। आप एक चौबीस घंटे वाली फुल-टाइम नर्स क्यों नहीं रख लेते? हर बात के लिए हमारा वहाँ आना ज़रूरी तो नहीं है न,” रोहन ने अपनी ज़िम्मेदारी को पैसों के तराज़ू में तौलते हुए बड़ी आसानी से पल्ला झाड़ लिया था।

उसे लगता था कि बुज़ुर्गों को तो बस शिकायत करने की आदत होती है। थोड़ा सा बुखार क्या हुआ, उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया उनके इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए। यह सब सोचते हुए उसने फिर से अपने टीवी शो पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की, लेकिन मन के किसी कोने में एक अजीब सी खलबली मच रही थी। फोन स्क्रीन की ब्लिंक होती लाइट उसे बार-बार अपनी ओर खींच रही थी।

नीलम ने गरमागरम पूरियाँ परोसते हुए कहा, “छोड़ो भी, तुम नाश्ता करो। ठंडी हो जाएंगी तो मज़ा नहीं आएगा। और हाँ, अगर पापा ज़्यादा ही पीछे पड़ें, तो साफ कह देना कि हम दिवाली से पहले नहीं आ सकते। अभी हमारी अपनी ज़िंदगी में कम झमेले हैं क्या?”

रोहन ने नाश्ते का पहला निवाला तोड़ा ही था कि फोन स्क्रीन फिर से जगमगा उठी। लगातार तीसरी बार। अब रोहन का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसका पूरा मूड खराब हो चुका था। ‘क्या मुसीबत है! एक दिन, सिर्फ एक दिन इंसान अपने परिवार के साथ शांति से नहीं बिता सकता?’ उसने बड़बड़ाते हुए फोन हाथ में लिया। उसने तय कर लिया था कि आज वह कड़े शब्दों में पापा को समझा देगा कि बार-बार फोन करके इस तरह उसे परेशान न किया करें।

उसने गले को साफ किया, अपनी आवाज़ में बनावटी मिठास और छिपी हुई झुंझलाहट का एक मिश्रण तैयार किया और कॉल रिसीव करते हुए बोला, “हैलो पापा! कैसे… हैं आप? इतनी सुबह-सुबह क्या…”

उसके शब्द उसके होंठों पर ही जम गए। दूसरी तरफ से पापा की वह जानी-पहचानी, कांपती हुई और हमेशा शिकायत करने वाली आवाज़ नहीं थी। बल्कि एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा था। और उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद भारी, पथराई हुई आवाज़ आई।

“रोहन… तुम्हारी माँ… हमें छोड़कर चली गई।”

वाक्य इतना छोटा था, लेकिन रोहन के कानों में किसी बम के धमाके की तरह गूँजा। उसके हाथ से नाश्ते का निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया।

“क्या… क्या कह रहे हैं आप? ओ गॉड! कब… कैसे? परसों तक तो…” रोहन के मुँह से हकलाते हुए एक साथ कई सवाल निकले।

“अभी… बस पंद्रह मिनट पहले। रात भर साँस लेने में तकलीफ थी। सुबह होते-होते… बस शांत हो गई।” इतना कहकर दूसरी तरफ से फोन कट गया। कोई रोना नहीं, कोई विलाप नहीं। सिर्फ एक भयानक यथार्थ की घोषणा, जिसने रोहन की पूरी दुनिया को एक पल में उलट-पुलट कर रख दिया।

“क्या हुआ रोहन? तुम्हारा चेहरा इतना पीला क्यों पड़ गया?” नीलम ने घबराते हुए पूछा।

रोहन ने खाली नज़रों से नीलम की तरफ देखा और बुदबुदाया, “माँ नहीं रहीं।”

यह सुनते ही कमरे में जैसे मौत का सन्नाटा छा गया। वो टीवी शो जो अभी तक मनोरंजन कर रहा था, अब उसकी आवाज़ किसी शोर की तरह चुभने लगी।

“हे भगवान! यह कैसे हो गया?” नीलम ने मुँह पर हाथ रखते हुए कहा, लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर एक अजीब सी लकीर खिंच गई। “अब… अब तो हमें जाना ही पड़ेगा। अंतिम संस्कार के लिए।”

नीलम की आवाज़ में दुख से ज़्यादा इस बात की परेशानी थी कि उसका सप्ताहांत खराब हो गया और अब उसे एक लंबी थकाऊ यात्रा करनी पड़ेगी। “उफ्फ! अब तुरंत फ्लाइट की टिकटें देखनी पड़ेंगी। पता नहीं आज के दिन टिकट मिलेगी भी या नहीं,” वह बड़बड़ाते हुए उठी और ज़ोर-ज़ोर से पैर पटकती हुई बेडरूम की तरफ पैकिंग करने चली गई। उसका यह व्यवहार आज रोहन को बहुत अखर रहा था, लेकिन वह कुछ कह नहीं सका।

रोहन सोफे पर बुत बनकर बैठा रहा। उसकी आँखों के सामने परसों की वह बातचीत घूमने लगी। पापा ने कितनी मिन्नतें की थीं। उन्होंने कहा था कि माँ उसे एक बार देखना चाहती हैं। लेकिन उसने क्या कहा था? ‘बीस हज़ार रुपये भेज दिए हैं, नर्स रख लो।’ क्या रुपये माँ के उन हाथों की कमी पूरी कर सकते थे जो उसे बचपन में सहलाते थे? क्या वह फुल-टाइम नर्स माँ को उस बेटे का प्यार दे सकती थी, जिसके इंतज़ार में उनकी आँखें दरवाज़े पर ही टिकी रहती थीं?

कुछ ही घंटों बाद, रोहन, नीलम और उनका बेटा आरव एयरपोर्ट पर थे। फ्लाइट में बैठते हुए भी रोहन का मन उसी अपराधबोध में जल रहा था। वह सोच रहा था कि काश, उसने उस दिन पापा की बात मान ली होती। काश, वह इस ‘वीकेंड’ की रट छोड़कर दो दिन पहले ही लखनऊ चला गया होता। तो शायद वह अपनी माँ को आखिरी बार ज़िंदा देख पाता। उनसे बातें कर पाता।

बेंगलुरु से लखनऊ का वह सफर रोहन को अपनी ज़िंदगी का सबसे लंबा सफर लग रहा था। जब उनकी कैब लखनऊ के उस पुराने मोहल्ले में पहुँची, तो शाम घिर आई थी। घर के बाहर भीड़ जमा थी। वही घर जहाँ से वह अक्सर दूर भागने की कोशिश करता था, आज उसे अपनी ओर खींच रहा था।

दालान में एक सफेद चादर में लिपटी उसकी माँ की देह रखी थी। और उसी के पास एक पुरानी कुर्सी पर उसके पिता बैठे थे—बिल्कुल शांत, शून्य में ताकते हुए। उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी। रोहन लड़खड़ाते कदमों से माँ के पास पहुँचा। उसने चादर हटाई। माँ का चेहरा शांत था, लेकिन उनकी आँखें जो हमेशा रोहन की राह तकती थीं, अब हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं।

रोहन वहीं ज़मीन पर बैठ गया और फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो माँ… मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा इंतज़ार नहीं समझ पाया,” वह चिल्ला रहा था, लेकिन अब सुनने वाला कोई नहीं था। उसका सारा पैसा, उसका रुतबा, उसकी वातानुकूलित ज़िंदगी—सब कुछ उस सफेद चादर के सामने मिट्टी हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते और प्यार ‘फुर्सत’ के मोहताज नहीं होते, वे बस समय माँगते हैं। और जो समय आज उसने अपनी माँ को नहीं दिया, वह समय अब लौटकर कभी नहीं आएगा। वह सिर्फ एक पछतावा बनकर ताउम्र उसके सीने में धड़कता रहेगा।

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लेखिका : विनीता सिंह

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