गणिका और सन्यासी – कमलेश राणा
आज नींद कोसों दूर थी आँखों से,,गिनती भी गिन ली, सरहाना भी बदल लिया पर न जाने कहाँ कहाँ के ख्याल आ जाते और फिर नींद उड़ जाती कल्पनाओं के देश में। इसी उहापोह में भोर होने को आई और थक हार कर नींद भी बोझिल पलकों में समा ही गई। एक बार फिर सपनों … Read more