शहर के एक छोटे से लेकिन बेहद खूबसूरत मोहल्ले में दो भाई-बहन पले-बढ़े थे, जिनका नाम था रोहन और स्नेहा। दोनों के पिता एक ईमानदार स्कूल टीचर थे, जिनका देहांत तब हो गया था जब ये दोनों बहुत छोटे थे। पिता के जाने के बाद माँ ने सिलाई-बुनाई करके दोनों को पाला था। माँ की हमेशा से यही सीख थी कि शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है जिससे दुनिया जीती जा सकती है। रोहन बचपन से ही मशीनों और विज्ञान में रुचि रखता था, उसका सपना एक बड़ा एयरोनॉटिकल इंजीनियर बनने का था। वहीं दूसरी तरफ, स्नेहा बेहद गंभीर और समाज को करीब से देखने वाली लड़की थी, जिसका एकमात्र लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा पास करके आईएएस अफसर बनना था। दोनों भाई-बहन अपनी कक्षाओं में हमेशा अव्वल आते थे। उनके घर में भले ही पैसों की कमी थी, लेकिन सपनों की कोई कमी नहीं थी। रोहन अपनी बहन का बहुत ख्याल रखता था। दोनों अक्सर रात-रात भर एक ही लैंप की रोशनी में साथ बैठकर पढ़ाई किया करते थे।
लेकिन इंसान अपने भविष्य के लिए जो ताने-बाने बुनता है, नियति अक्सर उसे अपने तरीके से सुलझाती या उलझाती है। जब रोहन ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में था और स्नेहा अपनी सिविल सेवा की तैयारी के लिए दिल्ली जाने की सोच रही थी, तभी उनके जीवन में एक भयानक तूफान आया। उनकी माँ को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया। इलाज में घर की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई, लेकिन माँ को बचाया नहीं जा सका। माँ के निधन ने दोनों भाई-बहनों को भीतर तक तोड़ कर रख दिया। अब रोहन पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई थी। उसे समझ आ गया था कि अगर उसने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई आगे जारी रखी, तो स्नेहा कभी दिल्ली जाकर अपना सपना पूरा नहीं कर पाएगी। परिस्थितियों के आगे घुटने टेकते हुए रोहन ने अपने सपनों का गला घोंट दिया। उसने कॉलेज छोड़ दिया और शहर की ही एक लॉजिस्टिक कंपनी में साधारण क्लर्क की नौकरी कर ली। उसने स्नेहा से अपनी आँखों के आँसू छिपाते हुए कहा कि उसे पढ़ाई से ज्यादा नौकरी में दिलचस्पी है। उसने स्नेहा को दिल्ली भेजा और अपनी छोटी सी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा हर महीने उसे भेजने लगा।
स्नेहा जानती थी कि उसके भाई ने उसके लिए क्या त्याग किया है। उसने भी दिन-रात एक कर दिया। उसकी मेहनत रंग लाई और कुछ ही सालों में उसने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली। आज स्नेहा एक बड़े जिले की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (डीएम) थी, जबकि उसका भाई रोहन आज भी उसी कंपनी में एक साधारण क्लर्क था। रोहन की जिंदगी में भी बदलाव आए थे। कंपनी के ही एक पुराने कर्मचारी की सादगी पसंद बेटी अंजलि से रोहन का विवाह हो गया था। अंजलि एक बहुत ही समझदार और सुलझी हुई लड़की थी। रोहन दहेज प्रथा के सख्त खिलाफ था, इसलिए उसने बिना एक पैसा लिए अंजलि को अपनी जीवनसंगिनी बनाया था। अंजलि ने रोहन के छोटे से घर को स्वर्ग बना दिया था। एक साल बाद उनके आंगन में एक बेटे की किलकारियां भी गूंजने लगीं। रोहन का जीवन भले ही अभावों में बीत रहा था, लेकिन उसमें प्यार और संतोष की कोई कमी नहीं थी।
दूसरी ओर, स्नेहा की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। वह एक बड़े बंगले में रहती थी, उसके आगे-पीछे गाड़ियां और सुरक्षाकर्मी चलते थे। लेकिन उसे अपने भाई की याद हमेशा आती थी। वह रोहन को अपने पास बुलाना चाहती थी, लेकिन रोहन का स्वाभिमान उसे अपनी बहन के रसूख के साये में जीने से रोकता था। वह हमेशा कहता कि वह अपनी मेहनत की रोटी खाकर खुश है।
समय का पहिया अपनी गति से घूम रहा था। पिछले कुछ महीनों से रोहन के परिवार पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। रोहन को पीलिया हो गया था और वह कई हफ्तों से दफ्तर नहीं जा पा रहा था। बिना काम के तनख्वाह कट रही थी और जो कुछ बचत थी, वह दवाओं और अस्पताल के बिलों में खर्च हो चुकी थी। अंजलि बहुत ही मितव्ययी थी, लेकिन अब घर का खर्च चलाना उसके लिए भी मुश्किल हो रहा था। वह रात-रात भर जागकर सोचती कि घर का राशन कैसे आएगा और बच्चे की फीस कैसे भरी जाएगी। रोहन अपनी इस लाचारी पर अंदर ही अंदर घुट रहा था। वह अपनी पत्नी को इस हाल में देखकर बहुत दुखी होता था, लेकिन स्वाभिमान के कारण उसने कभी स्नेहा को अपनी इस स्थिति के बारे में नहीं बताया।
इसी बीच एक दिन स्नेहा का फोन आया। उसने बहुत खुशी-खुशी अंजलि को बताया, “भाभी, मेरी शादी तय हो गई है! मेरे ही बैच के एक आईपीएस अधिकारी हैं, विकास। हम दोनों ने जीवन भर साथ निभाने का फैसला किया है।”
अंजलि ने खुशी से चहकते हुए कहा, “यह तो बहुत ही अच्छी खबर है स्नेहा! भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।”
स्नेहा ने आगे कहा, “भाभी, विकास के परिवार वाले एक बहुत बड़ा आयोजन कर रहे हैं। शादी उदयपुर के एक फाइव स्टार हेरिटेज होटल में होगी। लेकिन मेरी एक शर्त है। मेरी शादी तब तक नहीं हो सकती जब तक आप और भइया मेरा कन्यादान नहीं करते। पिता और माँ के जाने के बाद भइया ही मेरे पिता हैं और आप मेरी माँ। आप दोनों को पंद्रह दिन पहले ही यहाँ आना होगा ताकि सारी रस्में आप दोनों के हाथों से पूरी हो सकें।”
अंजलि ने भारी मन से मुस्कुराते हुए फोन रख तो दिया, लेकिन अंदर से वह पूरी तरह टूट चुकी थी। उसने मुड़कर रोहन को देखा, जो बिस्तर पर लेटा हुआ उसकी बातें सुन रहा था। रोहन की आँखों में जहाँ एक तरफ बहन की शादी की खुशी थी, वहीं दूसरी तरफ अपनी बेबसी का गहरा दर्द भी।
अंजलि अपनी अलमारी के पास गई और उसे खोलकर देखने लगी। उसमें कुछ पुरानी साड़ियां थीं जो उसने अपनी शादी के समय पहनी थीं। रोहन के पास भी कोई ढंग का सूट या शेरवानी नहीं थी जो वह इतने बड़े फाइव स्टार होटल में पहन सके। अंजलि सोचने लगी, “इतने बड़े लोग, इतने बड़े अफसर और फाइव स्टार होटल… हम वहां कैसे जाएंगे? हमारे पास तो पहनने के लिए ढंग के कपड़े तक नहीं हैं। कन्यादान करना है, तो बहन को देने के लिए कोई अच्छा शगुन या उपहार भी चाहिए। मेरे पास तो अपने जेवर तक नहीं बचे जो मैं स्नेहा को दे सकूं।”
उस रात रोहन और अंजलि दोनों सो नहीं पाए। रोहन को लग रहा था कि उसका क्लर्क होना और उसकी गरीबी आज उसकी बहन की खुशियों के बीच दीवार बन रही है। अंजलि ने अगले दिन हिम्मत करके रोहन से कहा, “रोहन, हम कोई बहाना बना देते हैं। आप कह देना कि डॉक्टर ने सफर करने से मना किया है। हम स्नेहा की शादी में इस हाल में नहीं जा सकते। वहां सब बड़े लोग होंगे, हमारी वजह से स्नेहा को नीचा देखना पड़ेगा।” रोहन ने एक गहरी सांस ली और अपनी आंखें बंद कर लीं। उसका दिल रो रहा था, लेकिन उसे अंजलि की बात सही लग रही थी।
शादी में सिर्फ एक हफ्ता बचा था। अंजलि रसोई में कुछ बना रही थी कि तभी बाहर एक गाड़ी के रुकने की आवाज आई। अंजलि ने बाहर जाकर देखा तो दरवाजे पर स्नेहा खड़ी थी। उसके साथ उसका होने वाला पति विकास भी था। अंजलि घबरा गई। घर की हालत अस्त-व्यस्त थी। रोहन कमजोर हालत में चारपाई पर लेटा था।
स्नेहा ने आते ही सबसे पहले रोहन को गले लगाया और रोने लगी। “भइया, आपकी इतनी तबीयत खराब है और आपने मुझे बताया तक नहीं? क्या मैं आपके लिए सिर्फ एक अफसर बन गई हूँ, आपकी छोटी बहन नहीं रही?”
रोहन ने स्नेहा के आंसू पोंछते हुए कहा, “पागल लड़की, मैं ठीक हूँ। तू क्यों परेशान होती है? और विकास जी को भी इस छोटे से घर में ले आई।”
विकास ने आगे बढ़कर रोहन के पैर छुए और कहा, “भइया, स्नेहा ने मुझे बताया है कि आज वह जो कुछ भी है, वह आपके त्याग की वजह से है। मेरे लिए यह घर किसी मंदिर से कम नहीं है, जहां आप जैसे देवता रहते हैं।”
अंजलि ने जल्दी-जल्दी चाय बनाई। वह अंदर ही अंदर शर्मिंदगी महसूस कर रही थी कि वह अपनी ननद और होने वाले नंदोई को कुछ अच्छा खिलाने में भी असमर्थ थी। चाय पीने के बाद स्नेहा ने विकास को कार से कुछ बैग लाने को कहा। विकास ने कई बड़े-बड़े और सुंदर पैकेट लाकर कमरे में रख दिए।
स्नेहा ने पहला पैकेट अंजलि के हाथ में रखते हुए कहा, “भाभी, यह आपकी साड़ी है, जिसे पहनकर आप मेरी हल्दी की रस्म करेंगी। और भइया, यह आपकी शेरवानी है जो मैंने खुद अपनी पसंद से बनवाई है। विकास ने मुन्ने के लिए भी कपड़े लिए हैं।”
अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा, “स्नेहा, इन सब की क्या जरूरत थी? तू तो जानती है कि हम…”
स्नेहा ने अंजलि के होठों पर उंगली रखते हुए उसे चुप करा दिया। फिर उसने अपने पर्स से एक मोटा लिफाफा निकाला और अंजलि के हाथों में थमा दिया। “भाभी, इसमें एक लाख रुपये हैं। मैं जानती हूँ कि भइया की तबीयत ठीक नहीं है और घर में पैसों की दिक्कत है। आप सोच रही होंगी कि यह मैं आपकी मदद कर रही हूँ, लेकिन यह मदद नहीं है। यह मेरा वो कर्ज है जो भइया ने मेरी पढ़ाई के लिए उठाया था। यह उस बहन का प्यार है जिसने अपने भाई को रातों की नींद खराब करते हुए देखा है। यह आपकी ननद का हक है, जो वह अपने मायके में दे रही है। आपको यह रखना ही होगा।”
अंजलि फूट-फूट कर रोने लगी। उसने स्नेहा को गले लगा लिया। रोहन की आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली। स्नेहा ने रोहन का हाथ पकड़कर कहा, “भइया, दुनिया के लिए मैं कितनी भी बड़ी अफसर क्यों न बन जाऊं, लेकिन आपके बिना मेरी हर पहचान अधूरी है। मेरी शादी के मंडप में मेरा कन्यादान सिर्फ और सिर्फ आप करेंगे। और भाभी, आपको किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है, सारी जिम्मेदारी मैंने विकास पर छोड़ दी है।”
स्नेहा की इस समझदारी और अटूट प्रेम ने अंजलि और रोहन के मन से हीन भावना के सारे बादल छांट दिए। अंजलि को समझ आ गया कि खून के रिश्ते कपड़ों और हैसियत से नहीं, बल्कि दिलों की गहराइयों से जुड़े होते हैं। स्नेहा ने यह साबित कर दिया था कि सफलता चाहे इंसान को आसमान तक ले जाए, लेकिन उसकी जड़ें हमेशा अपने परिवार और अपनों के प्यार में ही रहनी चाहिए। उस दिन उस छोटे से घर में जो खुशी थी, वह दुनिया के किसी भी फाइव स्टार होटल से कहीं ज्यादा कीमती और खूबसूरत थी।
आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है!
इस कहानी में स्नेहा द्वारा उठाए गए कदम के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आज के समय में भी भाई-बहनों के बीच ऐसा निःस्वार्थ प्यार देखने को मिलता है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
लेखिका : अर्चना परिकर