जीवनसाथी

कैलाश बाबू ने लैंडलाइन का रिसीवर जैसे ही क्रैडल पर रखा, उनके चेहरे पर एक पुरानी, जानी-पहचानी मुस्कान तैर गई। उनके मुंह से आदतन और बड़े ही उत्साह के साथ निकला, “अरे सावित्री, सुन रही हो? लखनऊ से अपने रमेश बाबू का फोन था, उनकी छोटी बेटी की शादी तय हो…”

शब्द उनके होंठों पर ही जम गए। आवाज़ जैसे गले में किसी खुरदरी चीज से टकराकर छिल गई हो। उनका उठा हुआ हाथ हवा में ही रह गया। उन्होंने पलटकर उस खाली दालान को देखा जहाँ अब कोई नहीं था। सुनने वाली सावित्री तो डेढ़ महीने पहले ही एक खामोश रात में, सोते-सोते ही इस दुनिया को अलविदा कह गई थी। वो दिल का ऐसा दौरा था जिसने सावित्री को संभलने का और कैलाश बाबू को उसे रोकने का कोई मौका ही नहीं दिया।

घर में पिछले डेढ़ महीने से रिश्तेदारों का जो मेला लगा था, वो अब छंट चुका था। शोक संवेदनाएं, रस्में, हवन और शांति पाठ सब पूरे हो चुके थे। उनका इकलौता बेटा, रोहन, जो अपनी माँ के जाने की खबर सुनकर बदहवास सा बेंगलुरु से भागा चला आया था, वो भी आज सुबह ही अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वापस लौट गया था। उसे ऑफिस से जितनी छुट्टियां मिली थीं, वो खत्म हो चुकी थीं। जाते वक्त रोहन की आँखें नम थीं। उसने पिता के गले लगकर कहा था, “पापा, आप भी हमारे साथ चलिए ना, यहाँ इस इतने बड़े घर में आप अकेले कैसे रहेंगे?” लेकिन कैलाश बाबू ने यह कहकर मना कर दिया था कि इस घर के कोने-कोने में तुम्हारी माँ की सांसें बसती हैं, मैं इस घर को छोड़कर कहीं और कैसे जी पाऊंगा।

रोहन ने सुबह निकलते समय हिदायत दी थी, “पापा, काम वाली बाई को मैंने कह दिया है, वो सुबह-शाम आकर साफ-सफाई और बर्तन कर जाएगी। मैंने आपके लिए दोपहर और रात का खाना टिफिन सर्विस वाले से लगवा दिया है, आज का खाना डब्बों में करके फ्रिज में रख दिया है, बस माइक्रोवेव में गर्म कर लीजिएगा। कोई भी दिक्कत हो, मुझे तुरंत फोन कीजिएगा।”

कैलाश बाबू सोफे पर धम्म से बैठ गए। घर में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। वो सन्नाटा जिसे काटने के लिए अब सावित्री की चूड़ियों की खनक, उसकी डांट-डपट या पूजा की घंटी की आवाज़ नहीं थी। अचानक दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम वाली घड़ी ने टन-टन करके पाँच बजाए। पाँच बजते ही कैलाश बाबू की नसों में जैसे एक पुरानी आदत दौड़ गई। शाम के पाँच बजे का मतलब था— सावित्री के हाथ की अदरक और इलायची वाली कड़क चाय।

बैंक मैनेजर के पद से रिटायर होने के बाद पिछले आठ सालों से उनका यही रूटीन था। ठीक पाँच बजे सावित्री चाय की दो प्यालियां लेकर बालकनी में आ जाती थी। वहाँ रखे बेंत के दो मूढ़ों पर बैठकर वे दोनों चाय पीते, मोहल्ले भर की बातें करते, सामने वाले गुलमोहर के पेड़ पर बैठे पक्षियों को देखते और अपने बीते हुए कल को याद करते। चाय सावित्री के बिना और सावित्री चाय के बिना, दोनों ही कैलाश बाबू के लिए अकल्पनीय थे।

लेकिन आज… आज मूढ़ा खाली था और चाय की कोई खुशबू घर में नहीं तैर रही थी। कैलाश बाबू ने एक गहरी सांस ली और कांपते हाथों से सोफे का हत्था पकड़कर खड़े हो गए। ‘अब तुम्हें खुद ही अपने हिस्से की जिंदगी जीनी होगी कैलाश,’ उन्होंने मन ही मन खुद को ढांढस बंधाया और धीरे-धीरे कदमों से रसोईघर की तरफ बढ़ चले।

रसोईघर… यह इस घर का वो हिस्सा था जहाँ कैलाश बाबू का कोई अधिकार नहीं था। सावित्री उन्हें कभी यहाँ फटकने भी नहीं देती थी। “अरे आप बाहर बैठिए, मैं सब कर लूंगी। आप तो एक पानी का गिलास भी लेते हैं तो चार चीजें गिरा देते हैं,” सावित्री अक्सर उन्हें रसोई से बाहर खदेड़ते हुए कहती थी। और सच भी यही था, कैलाश बाबू को न तो रसोई के काम में कोई दिलचस्पी थी और न ही कभी इसकी ज़रूरत पड़ी।

आज जब वो रसोई के दरवाजे पर खड़े हुए, तो उन्हें ऐसा लगा जैसे वो किसी अनजाने शहर के किसी अनजान घर में आ गए हों। गैस का चूल्हा साफ पुछा हुआ रखा था। उन्होंने सबसे पहले चायदानी खोजी। बर्तन के स्टैंड में उन्हें वो छोटी सी स्टील की चायदानी मिल गई। अब बारी थी चायपत्ती और चीनी की। उन्होंने ऊपर के कैबिनेट खोले। वहाँ कतार से कई पारदर्शी डिब्बे रखे हुए थे। डिब्बों पर सफेद कागज की पट्टियां चिपकी थीं, जिन पर सावित्री की गोल-गोल, सुंदर लिखावट में लिखा था— ‘जीरा’, ‘मेथी’, ‘चाय’, ‘चीनी’।

उस लिखावट को देखते ही कैलाश बाबू की आँखों से एक मोटा सा आंसू छलक कर उनके गाल पर बह निकला। उन्हें लगा जैसे सावित्री आज भी उनके लिए हर चीज़ आसान कर गई है। उन्होंने कांपते हाथों से चाय और चीनी का डिब्बा उतारा। गैस जलाना भी उनके लिए एक चुनौती था, क्योंकि उन्होंने हमेशा लाइटर का इस्तेमाल सावित्री को ही करते देखा था। दो-तीन बार की कोशिश के बाद गैस जली। उन्होंने अंदाज़े से पानी डाला, चायपत्ती डाली और फ्रिज से दूध निकालकर डाला।

चाय उबल रही थी, लेकिन उसमें वो महक नहीं थी जो सावित्री की चाय में होती थी। शायद इसलिए क्योंकि इसमें अदरक कूटना वो भूल गए थे, और शायद इसलिए क्योंकि इसमें उस ममता की मिठास नहीं थी जो सावित्री के हाथों से आती थी।

चाय को छानकर उन्होंने एक ही कप में डाला। जब वो ट्रे में सिर्फ एक कप रखकर बालकनी की तरफ चले, तो उनके कदमों का भारीपन महसूस किया जा सकता था। वो बालकनी में आकर अपने मूढ़े पर बैठ गए। सामने का मूढ़ा खाली था। गुलमोहर के पेड़ पर आज भी पक्षी चहचहा रहे थे, शाम की हवा आज भी वैसी ही ठंडी थी, बस उनके जीवन की गर्माहट कहीं खो गई थी।

कैलाश बाबू ने चाय का घूंट भरा। चाय थोड़ी फीकी थी और पानी ज्यादा हो गया था। लेकिन उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। आज उन्होंने जिंदगी का एक बहुत बड़ा और कड़वा सच सीख लिया था। उम्र के इस पड़ाव पर आकर जब जीवनसाथी साथ छोड़ देता है, तो इंसान को सिर्फ अकेलेपन से ही नहीं, बल्कि अपनी उन छोटी-छोटी कमियों से भी लड़ना पड़ता है जिन्हें अब तक उसका साथी पूरा करता आ रहा था। कैलाश बाबू ने आसमान की तरफ देखा, जहाँ डूबते सूरज की लाली बिखर रही थी। उन्होंने मन ही मन सावित्री से कहा, “तुमने बहुत अच्छी आदतें डाली थीं मुझे, अब उन आदतों के सहारे ही ये बाकी का सफर तय करूंगा… अकेले।”

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एक उम्र के बाद जब जीवनसाथी साथ छोड़ देता है, तो इंसान के लिए सबसे मुश्किल क्या होता है— घर के काम करना, या वो खौफनाक अकेलापन जो हर पल उसे डराता है? क्या हमें अपनी ज़िंदगी में शुरू से ही अपने कामों के लिए आत्मनिर्भर नहीं होना चाहिए, ताकि बुढ़ापे में किसी पर निर्भर न रहना पड़े? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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