साठ वर्षीय सुलोचना जी अपने दोनों हाथों में ताजी सब्जियों, फलों और कुछ घरेलू सामानों से भरे भारी थैले पकड़े, अपनी सोसायटी के मुख्य गेट से अंदर दाखिल हो रही थीं। उम्र के इस पड़ाव पर घुटनों में गठिया का दर्द अक्सर उन्हें परेशान करता था, लेकिन आज उनके चेहरे पर एक अजीब सी ऊर्जा और शांत संतुष्टि थी। सुलोचना जी शहर के एक प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेज की रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं। उनके जीवन का सफर आसान नहीं रहा था। जब उनका इकलौता बेटा चिराग महज पांच साल का था, तभी उनके पति एक भयानक सड़क दुर्घटना में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए थे। उस युवा उम्र में भी सुलोचना जी ने हार नहीं मानी। समाज के तानों और अकेलेपन से लड़ते हुए उन्होंने अकेले दम पर चिराग को पाला, उसे बेहतरीन शिक्षा दी और शहर के शिक्षा जगत में अपना एक सम्मानजनक रुतबा कायम किया। अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई और एक-एक पाई जोड़कर उन्होंने शहर के एक शांत और पॉश इलाके में यह चार कमरों का आलीशान घर बनाया था, जिसे उन्होंने बहुत प्यार से ‘स्मृति’ नाम दिया था। यह घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उनकी दशकों की तपस्या, संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक था। उनका सपना था कि बुढ़ापे में जब चिराग की शादी हो जाए, तो उसके बच्चे इस घर के बड़े से आंगन में खेलें।
चिराग अब एक बड़ी मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में ऊंचे पद पर काम कर रहा था और उसकी पत्नी काव्या भी एक निजी बैंक में मैनेजर थी। काव्या आधुनिक विचारों वाली एक तेज-तर्रार महिला थी, जिसके लिए जीवन का हर फैसला नफा-नुकसान देखकर किया जाता था। कुछ दिन पहले ही चिराग और काव्या मुंबई से सुलोचना जी के पास छुट्टियां बिताने आए हुए थे। सुलोचना जी बहुत खुश थीं। उन्होंने अपनी बहू और बेटे की पसंद का हर काम खुद करने की ठान रखी थी। वे सुबह सबसे पहले उठकर उनके लिए चाय बनातीं, उनके मनपसंद व्यंजन तैयार करतीं और बाजार से ताजी सब्जियां भी खुद ही लाती थीं ताकि बच्चों को कोई कमी न महसूस हो। वे चाहती थीं कि उनके बच्चे जब तक यहां हैं, उन्हें दफ्तर की कोई थकान न रहे।
सीढ़ियां चढ़कर जैसे ही सुलोचना जी अपने घर के दरवाजे पर पहुंचीं, उन्होंने देखा कि मुख्य दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था। वे अंदर कदम रखने ही वाली थीं कि भीतर से आ रही काव्या की तेज और स्पष्ट आवाज ने उनके कदमों को वहीं जड़ दिया। वे चाह कर भी अंदर नहीं जा सकीं।
“चिराग, तुम इमोशनल होकर क्यों सोच रहे हो? मेरी बात को प्रैक्टिकली समझने की कोशिश करो,” काव्या कह रही थी। “मम्मी जी अकेले इस इतने बड़े चार कमरों के घर में क्या करेंगी? यह प्रॉपर्टी शहर के बीचों-बीच है और इसकी कीमत इस वक्त आसमान छू रही है। इसे बेच देते हैं। करोड़ों रुपये मिलेंगे, जिससे हम मुंबई वाले फ्लैट का भारी-भरकम लोन भी एक झटके में चुका देंगे और बाकी बचे पैसे कहीं इन्वेस्ट कर देंगे। और मम्मी जी को हम हमेशा के लिए अपने साथ मुंबई ले चलेंगे।”
चिराग की आवाज शांत लेकिन उलझी हुई थी, “पर काव्या, यह मां का अपना घर है। उनकी यादें जुड़ी हैं यहाँ से। और वो वहां मुंबई के छोटे से फ्लैट में कैसे एडजस्ट करेंगी? उनका यहाँ अपना एक सर्कल है, अपनी एक पहचान है।”
“अरे, एडजस्ट क्यों नहीं करेंगी?” काव्या ने तपाक से कहा। “तुम खुद देखो, इस उम्र में भी वो कितनी एक्टिव हैं! सुबह उठकर फर्राटे से नाश्ता बना देती हैं, बाजार से ताजी सब्जी ले आती हैं, और खाना तो क्या लाजवाब बनाती हैं। मुंबई में हमारे पास वक्त ही कहां होता है। हम दोनों वर्किंग हैं। वो वहां रहेंगी तो हमारा कितना फायदा होगा सोचो जरा। कामवाली बाई के नखरों और उसकी रोज-रोज की छुट्टी से हमेशा के लिए निजात मिल जाएगी। हमें आया भी नहीं रखनी पड़ेगी, बच्चे को वो आसानी से संभाल लेंगी। बाहर का गंदा खाना नहीं खाना पड़ेगा, घर का बना शुद्ध खाना मिलेगा। और सबसे बड़ी बात, हमारे हर महीने हजारों रुपये बचेंगे और घर में किसी बाहरी नौकरानी के होने का कोई रिस्क भी नहीं रहेगा। वो खुश रहेंगी कि हम उन्हें साथ ले जा रहे हैं, और हमारा काम आसान हो जाएगा।”
दरवाजे के बाहर खड़ी सुलोचना जी के हाथों से थैले छूटने ही वाले थे। उनका दिल किसी ने जैसे मुट्ठी में भींच लिया था। जिस ममता, प्यार और वात्सल्य के वशीभूत होकर वे अपने घुटनों का दर्द भूलकर बच्चों की सेवा कर रही थीं, उनकी पढ़ी-लिखी बहू उसे एक ‘मुफ्त की नौकरानी’ और ‘मुफ्त की नैनी’ के विकल्प के रूप में देख रही थी। क्या जीवन भर का उनका संघर्ष, उनकी उच्च शिक्षा, उनका समाज में रुतबा और उनका आत्मसम्मान सब कुछ काव्या की नजर में सिर्फ एक ‘कामवाली बाई’ की जगह लेने के योग्य था? क्या एक मां के प्यार का यही मोल था? उनकी आंखें डबडबा गईं। उनका मन किया कि वो ये सब्जियां यहीं छोड़कर कहीं दूर चली जाएं, जहां कोई स्वार्थ न हो।
लेकिन तभी अंदर से एक जोर की आवाज आई। किसी ने कांच की मेज पर बहुत जोर से हाथ मारा था। यह चिराग था।
“काव्या! अपनी जुबान पर लगाम दो!” चिराग की आवाज में जो क्रोध, पीड़ा और आक्रोश था, उसने पूरे घर में एक भयानक सन्नाटा ला दिया। “तुम्हें शर्म नहीं आती ये सब घटिया बातें बकते हुए? तुम बात किसके बारे में कर रही हो, इसका तुम्हें रत्ती भर भी अंदाजा है? वो मेरी मां हैं, मां! मेरी जन्मदात्री हैं, कोई किराए की नैनी या मुफ्त की नौकरानी नहीं हैं।”
बाहर खड़ी सुलोचना जी की धड़कनें रुक सी गईं।
चिराग हांफते हुए आगे बोल रहा था, “तुम शायद भूल रही हो काव्या कि वो कोई अनपढ़, बेबस और लाचार औरत नहीं हैं जो तुम्हारे टुकड़ों पर पलने के लिए मुंबई जाएंगी। वो अपने समय की क्लास-वन राजपत्रित अधिकारी रही हैं! उनके ऑफिस में तुम्हारे जैसे दर्जनों लोग उनके एक इशारे पर काम करते थे। सरकारी गाड़ी, बड़ा सा बंगला, चपरासी, सम्मान… सब कुछ था उनके पास। उन्होंने यह फ्लैट अपनी उस खून-पसीने की कमाई से खरीदा है, जिसके लिए उन्होंने दिन-रात एक किया था। पापा के जाने के बाद उन्होंने मुझे कभी अनाथ होने का अहसास नहीं होने दिया। मेरे लिए उन्होंने अपनी जवानी, अपने शौक, अपने सपने सब कुछ एक भट्टी में जला दिए। और तुम? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यह सोचने की कि मैं उस मां को, जिसने मुझे सिर उठाकर जीना सिखाया, तुम्हारे लिए मुंबई ले जाकर बर्तन मांजने और बच्चा संभालने वाली नैनी बना दूं?”
काव्या घबरा गई थी। उसने शायद चिराग का यह रौद्र रूप पहली बार देखा था। “चिराग… शांत हो जाओ। मेरा वो मतलब नहीं था… मैं तो बस हमारे भविष्य के लिए…”
“तुम्हारा बिल्कुल वही मतलब था!” चिराग ने बीच में ही बात काट दी। “तुम्हें उनकी ममता में अपना स्वार्थ नजर आ रहा है। वो अगर तुम्हारे लिए अपने दर्द में भी रसोई में खड़ी हैं, तो इसलिए नहीं कि उन्हें नौकरों की तरह काम करने का शौक है, बल्कि इसलिए कि वो हम दोनों से अथाह प्यार करती हैं। तुम इस पवित्र प्यार को उनकी मजबूरी या अपनी सहूलियत समझने की भूल मत करो। यह घर उनका मंदिर है, और वो अपनी आखिरी सांस तक यहीं पूरे सम्मान के साथ इस घर की मालकिन बनकर रहेंगी। अगर तुम्हें कामवाली की जरूरत है तो मुंबई जाकर दस महंगी कामवालियां रख लेना, लेकिन मेरी मां को अपनी सहूलियत की नौकरानी का दर्जा देने की हिम्मत आज के बाद कभी मत करना। अगर दोबारा यह बात तुम्हारे मुंह से निकली, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”
दरवाजे के बाहर अंधेरा घिर आया था, लेकिन सुलोचना जी की आंखों से अब आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। पर ये आंसू दुख, अपमान या लाचारी के नहीं थे। ये आंसू एक अथाह गर्व, सुकून और जीत के थे। जीवन की जिस सबसे बड़ी परीक्षा में वे खुद को हारा हुआ और ठगा हुआ महसूस कर रही थीं, उनके बेटे ने आज उन्हें उस परीक्षा में विजयी बना दिया था। उनकी तपस्या, उनके संस्कार आज चिराग के रूप में उनके सामने एक अभेद्य ढाल बनकर खड़े थे। सुलोचना जी ने अपनी सूती साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे। उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर एक विजयी और संतुष्ट मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी पीठ सीधी की, थैलों की पकड़ मजबूत की और चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए दरवाजे की घंटी बजा दी। अंदर उनका बेटा उनके सम्मान के लिए खड़ा था, और एक मां के लिए यही उसके जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची कमाई थी।
क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता और स्वार्थ की अंधी दौड़ में हम अक्सर माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम को अपनी सहूलियत का जरिया मान लेते हैं? क्या एक बेटे का अपनी माँ के स्वाभिमान के लिए यूं खड़ा होना सही था? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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