सही फ़ैसला

सुबह का समय था। शहर की सड़कों पर हल्की-हल्की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। पूजा तेज़ कदमों से बस स्टॉप की ओर बढ़ रही थी। आज उसका नए स्कूल में पहला दिन था—एक शिक्षिका के रूप में। मन में उत्साह भी था और घबराहट भी। बार-बार घड़ी देख रही थी कि कहीं देर न हो … Read more

ट्रैफिक जाम – एम. पी. सिंह

अरे, बाकी लोग कहाँ है, बॉस आते ही जोर से बोला, 8 बजे का टाइम दिया था, 9 बजे गए है, कब शुरू होंगी पार्टी? मानकी, रोहन,  सुमित और कोमल सब ट्रैफ़िक जाम मे फसे है, बस आते ही होंगे. सोनल की बात सुनकर सब ऑफिस वाले बैंगलोर के ट्रैफिक को कोसने लगे पर खुशी … Read more

परिवार साथ खाए तो अच्छा लगता है – आरती कुशवाहा

सुबह के पाँच बज रहे थे। रसोई में हल्की-हल्की खटर-पटर की आवाज़ आ रही थी। गैस पर चढ़ी चाय उफान मारने को थी और स्नेहा जल्दी-जल्दी उसे उतारने की कोशिश कर रही थी। आज भी उसने अलार्म बजने से पहले ही आँख खोल ली थी। आदत बन चुकी थी—घर के उठने से पहले उठ जाना, … Read more

विदाई का आँसू – शालिनी तिवारी 

स्टेशन पर गाड़ी के आने की घोषणा होते ही अनन्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी भीड़, सामान से भरे ट्रॉली बैग, बच्चों की किलकारियाँ और चायवाले की आवाज़—सब कुछ जैसे अचानक बहुत दूर चला गया हो। वह अपने हाथ में पकड़े टिकट को बार-बार देख रही थी, मानो उस पर लिखा … Read more

मेरी पत्नी मेरी जिंदगी है, और मेरी माँ मेरी जड़। – गरिमा चौधरी

  रसोई में गैस जल रही थी, मसालों की खुशबू फैल रही थी, शारदा देवी ने आँखों पर चढ़े चश्मे को थोड़ा ऊपर किया, फिर धीमे से कमर पकड़कर खड़ी हुईं। घुटने में दर्द था, पर आज दर्द की छुट्टी नहीं थी। आज उनके बेटे सिद्धार्थ का जन्मदिन था। और सिद्धार्थ… बचपन से एक ही चीज़ … Read more

बहू हो, तो थोड़ा मेहमानदारी भी सीखो। – दिव्या सक्सेना

“रीवा, आज तुम ऑफिस से जल्दी आ जाना… मेरे भाई-भाभी आ रहे हैं।”किचन में चाय का पैन चढ़ाते हुए विशाल ने ऐसे कहा जैसे बारिश की सूचना दे रहा हो—सामान्य, निर्विकार। रीवा ने प्लेटों में फल रखते हुए गर्दन घुमा कर देखा। “आज? तुम्हें कल याद आया? और तुमने मुझे अभी बताया?” “अरे बस… अचानक … Read more

आत्मग्लानि – गरिमा चौधरी 

कमला जी हमेशा से अपने परिवार की धुरी थीं—तीन बेटों की माँ, घर-आँगन की मालकिन, और मोहल्ले में सभी के सुख-दुख की साझेदार। घर में उनकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी। लेकिन बीते दो सालों से उनके चेहरे की कोमलता में एक खिंचाव आ गया था। कारण सिर्फ एक—बहू मालिनी को संतान का … Read more

अदालत का अनोखा फैसला – एम. पी. सिंह 

आनंद ने एक हाथ से डोर बेल बजाई, दूसरे हाथ मै मिठाई का डिब्बा और नज़रे नेम प्लेट पर टिकी थी, जहाँ लिखा था ” रिटायरड जज ठाकुर अरविन्द सिंह”. जज साब ने दरवाजा खोला, और आनंद को सामने खड़ा देखकर बोले, मैंने तुम्हे पहचाना नहीं? आनंद ने आगे बढ़कर पाँव छुए और बोला, मै … Read more

मेरा साथी – एम. पी. सिंह 

वरिष्ठ नागरिक होने का सम्मान अधिकांश लोगों को नसीब नहीं होता, और जिन्हे नसीब होता है, उनके लिए भी चुनौतीयों भरा होता है. मैं आपको अपनी कहानी बताता हूँ.  मैं 70+ का एक रिटायर ऑफिसर हूँ, हॉस्टल के दिनों मैं मैंने एक टाइम पीस (घड़ी) लिया था, जो एलार्म बजाकर मेरे प्रत्येक इम्पोर्टेन्ट कार्य की … Read more

मेहमान – एम. पी. सिंह 

बहु, आज खाने मे कुछ अच्छा बना लेना, तेरेे गांव वाले आ रहे है, फोन आया था. माँ जी की बात सुनकर दीपिका बहुत ख़ुश हुई, पर खाना बनाने से जी चुराने वाली, सोच मे पड़ गई, कि कौन आ रहा है, पूछने की हिम्मत नहीं हुई. अमोल और दीपिका की शादी हुए अभी कुछ … Read more

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