बचपन – एम. पी. सिंह

रोहन एक सीमेंट फैक्ट्री में टेक्निशियन था और उसकी एकलौती बेटी कान्ता क्लास 8 में पड़ती थी. फैक्ट्री केम्पेस में कम्पनी का 2 बेड रूम का मकान. उसकी क्लास में एक नया एडमिशन हुआ, जिसका नाम था पायल. पायल के पिता फैक्ट्री में सीनियर अधिकारी थे, कम्पनी का बड़ा बंगला, नौकर चाकर, कारें ड्राइवर, गार्ड … Read more

आधुनिक परिवार – कमलेश राणा

सुमन ने जब ब्याह के बाद अपने ससुराल की चौखट पर कदम रखा था, तो भीतर ही भीतर उसके मन में कई तरह की आशंकाएँ थीं। वह अपने मायके में जैसी पली-बढ़ी थी, वहाँ नियम-कायदे बहुत थे—कौन कहाँ जाएगा, कितनी देर रुकेगा, क्या पहनेगा, किससे बात करेगा, इन सब पर घर के बड़े नज़र रखते … Read more

अपमान का दर्द – गरिमा चौधरी 

“देखा, सुधीर… वही लोग… जिनके लिए मैं कभी ‘कम पढ़ी-लिखी’, ‘कम हैसियत वाली’, ‘बस पापड़ बेलने वाली’ थी… आज मुझे ‘बड़ी दीदी’ कहकर ऐसे लिपट रहे थे, जैसे बरसों की ममता उमड़ आई हो।” गीली आँखों के साथ गौरी ने कमरे की दीवार पर टंगी अपने पति सुधीर की तस्वीर से कहा। तस्वीर में सुधीर … Read more

रिश्तों का गणित – सरोज माहेश्वरी 

         रोज़ाना की तरह रवि ने अपने ऑफिस में प्रवेश किया और अपने सभी सहकर्मियों से हाय हैलो करता हुआ अपनी टेबल तक आ गया। आज उसके सहकर्मी अजय का जो कि उसका मित्र भी है, चेहरा थोड़ा सा मुरझाया हुआ था जबकि हमेशा दिलकश मुस्कान के साथ खिला रहता है।वह उसकी उदासी का कारण समझ … Read more

इंसानियत – खुशी

गीता जी एक सीधी साधी महिला थी उनके पति थे गोपाल।गीता जी बीटेक थी और उन्हें कंप्यूटर की बहुत अच्छी नॉलेज थी ।शादी से पहले वो नौकरी करती थी परंतु शादी के बाद गोपाल को घर में रहने वाली बीवी चाहिए थी जो घर का मां पिताजी का ध्यान रखें सब काम टाइम पर हो … Read more

दर्शन, माँ  वैष्णों देवी – एम. पी. सिंह 

कहते है कि जब तक बुलावा नहीं आता, माता के दर्शन नहीं होते. मुझे इस पर पूरा विश्वास नहीं था, ऐसा नहीं कि मैं नास्तिक हूँ, पर भक्त भी नहीं था, बस सब भगवान को मानता हूँ. फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मुझे विश्वास हो गया कि बुलावा आता है. मैं विस्तार से … Read more

बाई की बेटी -कान्ता – एम. पी. सिंह

संजय और सुधा दिल्ली मै रहते थे. दोनों पढे लिखे थे और नौकरी करते थे, संजय सी.ए. था और सुधा टीचर. बेटा होने के बाद सुधा ने नौकरी छोड़ दी. सुधा बेटी चाहती थी, पर संतोष कर लिया की दूसरी संतान बेटी होंगी. पर संजय दूसरा बच्चा नहीं चाहता था. दो दो बच्चों से जिम्मेदारी … Read more

आँगन की रौनक – डॉ बीना कुण्डलिया 

मीनाक्षी की बेटी नैना की विदाई धीरे-धीरे सभी मेहमान विदा हो गये । ज्यादातर तो अपने इसी शहर में रहते तो दोपहर तक घर खाली हो गया । कल तक कितनी चहल-पहल इसलिए आज आँगन की रौनक फीकी लग रही थी । वैसे विवाह कार्यक्रम तो वैडिंग प्वाइंट में सम्पन्न हुए और आधे दूर दराज … Read more

समय का फेर – हेमलता गुप्ता

रमन और महेश की दोस्ती शहर में मिसाल मानी जाती थी। दोनों ने बचपन एक ही मोहल्ले में गुज़ारा था। स्कूल की घंटी बजते ही दोनों साथ भागते, एक ही टिफिन से रोटी बाँटते, और शाम को गली के मोड़ पर खड़े होकर बड़े-बड़े सपने देखते—“एक दिन अपना भी नाम होगा, अपना भी काम होगा।” … Read more

अनोखा जन्मदिन – रीतू गुप्ता

जानकी जी के आश्रम में आज सुबह से ही एक अजीब-सी हलचल थी—वैसी हलचल जैसी बच्चों के स्कूल में “बर्थडे सेलिब्रेशन” वाले दिन होती है। कोई रंग-बिरंगे गुब्बारे फुला रहा था, कोई दीवार पर कागज़ के फूल चिपका रहा था, कोई रसोई में जाकर बार-बार झाँक रहा था कि केक आया या नहीं। यहाँ “जन्मदिन” … Read more

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