औलाद बेटा-बेटी नहीं होती… औलाद बस औलाद होती है – विधि जैन

घर के आँगन में तुलसी के पास खड़ी इंदु की उंगलियाँ काँप रही थीं। सामने बरामदे में बैठी उसकी जेठानी नीलम चाय की चुस्की लेते हुए फिर वही बात दोहरा रही थी—वो बात जो सालों से इंदु के कानों में काँटे की तरह चुभती आई थी। “अरे इंदु, बेटियाँ हैं तुम्हारी… ज्यादा पढ़ा-लिखाकर क्या करेगी? … Read more

शादी या समझौता – अर्चना खंडेलवाल

“तू पढ़-लिख गई, नौकरी कर रही है, अपने पैरों पर खड़ी है—बहुत अच्छा,” माँ ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए कहा, “पर जीवन सिर्फ अपने दम पर चल लेने का नाम नहीं है। हर स्त्री को कभी न कभी किसी का साथ चाहिए होता है। और तुझे शादी करनी होगी।” अदिति ने लैपटॉप … Read more

बदलाव – रोनिता कुंडु

“बस बहुत हो गया!”दहलीज़ पर खड़ी इशिता की आवाज़ में आज पहली बार काँप नहीं, आग थी। हाथ में उसके पुराने सर्टिफिकेट्स की फाइल थी और आँखों में वह चमक, जो वर्षों से भीतर दबाई गई थी। ड्रॉइंग रूम में सब बैठे थे—सास पद्मा देवी, पति नील, ननद सृष्टि, नील के मामा-मामी और दो-तीन रिश्तेदार, … Read more

तलाक़शुदा – अर्चना खंडेलवाल

“दीदी, मैं तुम्हें रोक नहीं रहा… बस सच बता रहा हूँ,” राघव ने शांत आवाज़ में कहा, “तुम नौकरी करती हो, अपने पैरों पर खड़ी हो—ये बहुत अच्छी बात है। लेकिन जीवन सिर्फ अपने पैरों पर खड़े होने से नहीं चलता। जीवनसाथी और परिवार भी चाहिए। कल को मेरी शादी हो जाएगी, मैं अपने घर … Read more

**प्रीत की रीत** – अंजली शर्मा

    “सुरभि वैसे भी अपनी सास शारदा के आये दिन अनाथालय जाने, अनाथालय में जाकर दान करने वहाँ के बच्चों में सामान बाँटने से तंग आ गयी थी कितनी बार मना कर चुकी थी लेकिन शारदा है कि मानती ही नहीं थी। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था लेकिन, आज तो हद हो गयी जब … Read more

एक रिश्ता ऐसा भी ! – स्वाती जैंन !

निकल जाओ अभी की अभी मेरे घर से , मुझे लगा था शादी के बाद तुम हमारे घर को बच्चों की किलकारियों से भर दोगी मगर नहीं मेरा सपना तो कभी साकार ही नहीं होगा , मुझे और मेरे घर को तुम जैसी बांझ औरत की कोई जरूरत नहीं, मेरी मां को भी तुम जैसी … Read more

अंजलि नहीं रही – के आर अमित

हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों में बसा छोटा सा गांव जो देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ। इसी गांव के एक साधारण परिवार की बेटी थी अंजलि मेहनती शांत स्वभाव की आँखों में सपने और दिल में कुछ कर गुजरने की आग। कॉलेज में दाख़िला उसके लिए सिर्फ़ पढ़ाई नहीं था बल्कि उनका सपना था कि … Read more

रीचार्ज – शुभ्रा बैनर्जी 

पचासी साल पूरे कर चुकीं हैं सासू मां।सारे दांत निकलवा लिए है, दर्द से हार कर।अपनी जिंदगी में क्या कुछ नहीं सहा है उन्होंने? उन्हें देखकर तो शुभा खुद से ही लड़ती रहती है।जब मां इस उम्र में अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को खुश रख सकतीं हैं, तो वह क्यों नहीं?  आंखों की … Read more

एक माँ – एम. पी. सिंह

आशा और गोपाल दास के दो बेटे थे, राम और श्याम. दोनों मे 2 साल का अंतर था. घर के पास ही गोपाल जी का अपना किराना स्टोर था और काफ़ी अच्छा कमा लेते थे. सवेरे दुकान पर जाते तो रात को ही वापस आते. लंच नौकर घर से ले जाता था. माँ का प्यार … Read more

थोड़ा और कमा लूं – के आर अमित

ये कहानी एक मनोज की नही बल्कि हर उस आदमी की है जो हजारों सपने लेकर घर से बाहर निकलता है । स्कूल की पढ़ाई खत्म करके अभी जवानी में कदम रखा ही था कि नौकरी की फिक्र सताने लगी। कुछ छोटी मोटी नौकरी मिली भी तो सैलेरी इतनी कम थी कि अपना गुजारा करना … Read more

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