मखमली पर्दे

स्मिता ने अपना रेशमी पल्लू सँभालते हुए कहा। “ये जो लड़का है ना सूरज, इसका बाप एक नंबर का जुआरी और शराबी था। सिर पर लाखों का कर्ज़ा छोड़कर लिवर खराब होने से मर गया। इसकी माँ, कमला, मेरे पैरों में गिरकर रोने लगी। मेरे पति राकेश जी का दिल बहुत बड़ा है। उन्होंने कमला … Read more

मृगतृष्णा: एक अधूरे सच की कहानी

इस बार सुमित्रा जी ठीक नीरजा के पीछे खड़ी थीं और उन्होंने अपने ‘वारिस’ का हर एक शब्द सुन लिया था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा पराया समझा, जिस बेटे की खातिर उन्होंने अपने पति की सारी ज़िंदगी की कमाई लुटा दी, आज वो बेटा … Read more

स्वाभिमान की चौखट

“तूने बिल्कुल सही किया बेटा,” रामदीन जी ने शिखा का माथा चूमते हुए कहा। “मैं एक बाप होकर जो नहीं कह पाया, वो तूने कह दिया। मेरी बेटियां मेरे गुरूर हैं, कोई बाज़ार में बिकने वाला सामान नहीं। अनुराधा की शादी जब होगी, तब होगी, लेकिन आज के बाद मेरी किसी बेटी को ऐसे अपमान … Read more

एहसास के धागे

मेघा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह गुस्से से तमतमाती हुई समीर के पास गई। “समीर! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पापा से यह सब कहने की? तुम्हें पता नहीं है कि उन्हें अस्थमा है? वो यहाँ हमारे घर काम करने आए हैं क्या? कार साफ करने के लिए कॉलोनी में लड़के आते हैं, … Read more

आत्मसम्मान

“महक , मेरी बात ध्यान से सुनो…” मीरा ने एक गहरी साँस लेते हुए अपनी छोटी बहन की आँखों में देखा। “आज तुम जिस मोड़ पर खड़ी हो, सालों पहले मैं भी ठीक वहीं खड़ी थी। तुम कहती हो कि तुम्हें अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीनी है, ये समाज और इसके बनाए नियम तुम्हें … Read more

एक नई शुरुआत

“मैं वहां खड़ा रहा, बुत बनकर,” अमन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा। “मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। एक तरफ वो लोग थे जो बिना सोचे-समझे खाना फेंक रहे थे, और दूसरी तरफ वो मासूम जो उसी जूठन को अपनी ज़िंदगी मानकर खा रहे थे। ये कैसी दुनिया है नेहा? एक ही शहर … Read more

यादों की पगडंडी और सूना आँगन

रघुनाथ जी के लिए अपने ही घर के एक कोने में बैठकर अपनी बहू कृतिका की शिकायतें सुनना अब दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। आज सुबह भी कृतिका फोन पर अपनी सहेली से बात कर रही थी और उसकी आवाज़ रसोई से होते हुए रघुनाथ जी के कमरे तक साफ़ आ रही थी। “अरे … Read more

किराए का बचपन

मेघा को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। रातों की नींद जो पिछले कई महीनों से हराम थी, वह अब वापस लौट आई थी। रात को कियान रोता, तो सुभद्रा ही उठकर उसे संभालती। अब मेघा सुबह उठकर आराम से योग करती, अपना डाइट नाश्ता लेती और सज-धज कर ऑफिस निकल जाती। वीकेंड्स पर भी … Read more

रिश्तों की धूप-छाँव

“मम्मी जी,” स्वाति ने बहुत ही कोमलता से सुमित्रा जी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “मैं देख रही हूँ कि आप पिछले कुछ महीनों से बहुत परेशान हैं। हमने ममता को इसलिए रखा था ताकि आपको आराम मिले, लेकिन आप तो पहले से भी ज़्यादा थकने लगी हैं।” सुमित्रा जी ने गहरी … Read more

रिश्तों के खाली पन्ने

रोहन अपने कमरे से फोन पर बात करते हुए बाहर निकला। सामने माँ-बाप को देखकर उसके भी कदम रुक गए। उसने जल्दी से फोन काटा और आगे बढ़कर पिता के पैर छुए। फिर माँ के पैर छूते हुए थोड़ा झेंपते हुए बोला, “पापा, आप लोगों ने आने से पहले एक बार फोन तो किया होता! … Read more

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