मां कोई ज़रूरत नहीं होती, मां तो वो नीव होती है – लतिका श्रीवास्तव 

“मां..! अब मैं यहां एक पल भी नहीं रुक सकता। इस घर की दीवारों में अब मेरा और मेघा का दम घुटता है।” राघव ने अपना सूटकेस डाइनिंग टेबल पर पटकते हुए चीखकर कहा। उसकी आंखों में आंसू और गुस्सा दोनों एक साथ तैर रहे थे। “तो रुकने को कहा किसने है?” कौशल्या देवी ने … Read more

बुढ़ापे की लाठी – नरेंद्र चावला 

अनन्या अपने घर के आंगन की वह गौरैया थी, जिसके चहकने से ही सुबह होती थी। घर की सबसे छोटी संतान होने के नाते, उसे कभी ज़मीन पर पैर रखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। पिता हरिशंकर जी शहर के नामी व्यापारी थे, और उन्होंने अपनी इस लाडली को दुनिया की हर धूप-छांव से बचाकर … Read more

झांसी की रानी – सीमा राय 

खाकी वर्दी की बांह चढ़ाते हुए वाणी जैसे ही अपनी कॉलोनी के नुक्कड़ पर स्थित ‘दीनानाथ जनरल स्टोर’ के पास से गुजरी, हवा में तैरता हुआ एक तंज उसके कानों से टकराया। “-लो भाई, आ गई ‘झांसी की रानी’! घर में बीमार आदमी पड़ा है और मैडम को देखो, पुरुषों की तरह ऑटो दौड़ाने का … Read more

अपना घर – मनमोहन तिवारी 

“लो, तुम फिर यहाँ अँधेरे में खड़ी आँसू बहा रही हो… अब क्या हुआ? अभी तो अंदर सब कितना हँस-बोल रहे थे, समीर की प्रमोशन की खुशी मना रहे थे और तुम अचानक उठ कर यहाँ बालकनी में आकर रोना चालू हो गई।” पति, विवेक ने झुंझलाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में चिंता कम और … Read more

पैसे ने खून को पानी बना दिया था – डॉ उर्मिला सिन्हा

आंगन में खड़ी पुरानी नीम की छांव अब भी वही थी, लेकिन उसके नीचे खड़ी गाड़ियों ने घर की तस्वीर बदल दी थी। एक तरफ विनय की चमचमाती एस.यू.वी. खड़ी थी, और दूसरी तरफ समीर की पुरानी, जंग लगी स्कूटर। यह सिर्फ़ वाहनों का अंतर नहीं था; यह उस खाई का भौतिक रूप था जो … Read more

तिरछी नज़र – मुकेश पटेल

शाम के छह बजते ही घर की घंटी बजी। रमेश बाबू ऑफिस से लौटते ही सोफे पर धप्प से बैठ गए और पसीने से तरबतर रूमाल से अपना माथा पोंछने लगे। “सुधा! ओ सुधा! एक गिलास पानी लाना जरा,” उन्होंने हाँफते हुए आवाज लगाई। रसोई से सुधा जी हाथ में पानी का गिलास और दूसरे … Read more

यह घर है या कोई धर्मशाला – करुणा मलिक

देहरादून की वादियों में बरसात का मौसम था और ‘गुलमोहर विला’ की बड़ी सी बालकनी में पुराने ज़माने का ग्रामोफोन बज रहा था। लता मंगेशकर की मखमली आवाज़ हवा में तैर रही थी— “लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो…” रिटायर्ड कर्नल विक्रमजीत सिंह और उनकी धर्मपत्नी मोहिनी देवी, दोनों ही … Read more

तोफे की कीमत नहीं नियत देखी जाती है – लेखिका बबीता झा

अमन और आकाश बचपन के दोस्त थे। सुख-दुख में दोनों हमेशा एक दूसरे के साथ रहते थे। सब उनकी दोस्ती को कृष्ण और सुदामा की दोस्ती मानते थे, क्योंकि अमन बहुत अमीर था। उसके आगे पीछे नौकर चाकर गाड़ी सब रहती थी, और आकाश के घर में उसे दो टाइम की रोटी भी बड़ी किल्लत … Read more

ऑनलाइन ज़िंदगी – मुकेश पटेल 

रामकिशोर जी ने अपने चश्मे को नाक पर थोड़ा ऊपर खिसकाया और हाथ में पकड़े हुए त्यागपत्र (Resignation Letter) को दोबारा पढ़ा। उनके हाथ हल्के से काँप रहे थे। सामने उनका बेटा मोहित सोफे पर टांग पर टांग चढ़ाए अपने मोबाइल में कुछ टाइप कर रहा था, उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री थी। … Read more

रीत इंसानों के लिए होती है – पुष्पा जोशी 

रघुनाथ बाबू ने अपने कंधे पर टंगा हुआ पुराना चमड़े का बैग कसकर पकड़ रखा था। उनके चेहरे की लकीरें आज किसी पत्थर की तरह सख्त हो गई थीं। आंगन में तुलसी के चौरे के पास खड़ी उनकी बूढ़ी मां, काशी देवी, कांपती हुई आवाज़ में चिल्ला रही थीं। “रघुनाथ! तू उस दहलीज को लांघ … Read more

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