नई सुबह की देहरी

 “मुझे माफ़ कर दीजियेगा बाबूजी,” राधिका का गला बुरी तरह रुंध चुका था। “मुझे पता है, मेरा चेहरा देखकर हर कोई ऐसे ही डर जाता है। मैं यहां से चली जाती हूँ।” वह पीछे मुड़ने लगी, लेकिन उसका दर्द आंसुओं और शब्दों के रूप में बह निकला। वह बिना उनकी तरफ देखे, रुंधे हुए गले … Read more

कागज़ के रिश्ते

सुधीर अकेला पड़ गया। उसे अपने माता-पिता को जेल जाने से बचाना था। उसने राधिका के वकील से मिन्नतें कीं। सौदा तीस लाख में तय हुआ। सुधीर ने अपनी ज़िंदगी भर की सारी बचत तोड़ दी। अपने प्रोविडेंट फंड के पैसे निकाले। जब उससे भी काम नहीं चला, तो उसने अपने गाँव की वो पुश्तैनी … Read more

विदाई की वह रात: माँ के तीन अनोखे उपहार

अनन्या ने वह डिब्बी अपने सीने से लगा ली और माँ के गले लगकर बोली, “माँ, मुझे अब कोई डर नहीं लग रहा। आपने मुझे गृहस्थी को जोड़ने और खुद को न टूटने देने का जो अचूक मंत्र दिया है, मैं उसे अपनी सांसों में बसा कर रखूंगी। मैं पहले सबको समझूंगी, बिना वजह न … Read more

एक बेटे का एहसास

रमाकांत जी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उन्हें लगा जैसे किसी ने उन्हें सरेआम नंगा कर दिया हो। उनका सिर झुक गया और आँखों से आंसू बहने लगे। “बेटा… वो… समाज की रस्में… हमारी इज्जत…” उनके मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे। विक्रम आगे बढ़ा और उसने रमाकांत जी के दोनों हाथ … Read more

रिश्तों की संजीवनी

 सावित्री देवी खुलकर हंस पड़ीं। यह वही हँसी थी जिसे सुनने के लिए समीर और शिखा के कान तरस गए थे। आज उन्हें डॉ. भार्गव की बात का असली मतलब समझ में आ गया था। उन्होंने जान लिया था कि बुज़ुर्गों को सिर्फ आराम, दवा या नौकरों की जरूरत नहीं होती। उन्हें जरूरत होती है … Read more

विरासत के धागे – सुधा जैन

जैसे ही राघवेंद्र नित्या को लेकर हवेली की चौखट पर पहुंचे, कौशल्या देवी और शालिनी का चेहरा उतर गया। दोनों को उम्मीद थी कि राघवेंद्र किसी तरह कोई लड़का ही लाएंगे। कौशल्या देवी ने उसी वक्त अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि एक पराई लड़की उनके खानदान की वारिस कैसे बन सकती है? लड़कियां … Read more

फ़र्ज़ की वेदी

शाम के धुंधलके ने अभी घर के आँगन में कदम ही रखा था कि तभी अंदर के कमरे से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। मीरा दौड़कर अपनी सास, शांति देवी के कमरे में पहुँची। शांति देवी ज़मीन पर बेसुध पड़ी थीं। उनके हाथ से पानी का गिलास छूटकर टूट चुका था। मीरा की साँसें जैसे गले … Read more

कच्चे धागे

रिया के इन कड़वे और जहरीले शब्दों ने डाइनिंग टेबल पर एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया। हर कोई सन्न रह गया। मीरा, जिसने हमेशा अमन को अपने छोटे भाई या यूं कहें कि अपने बेटे की तरह माना था, उसके लिए यह आरोप किसी खंजर के घोंपे जाने से कम नहीं था। उसकी आँखों से … Read more

कड़ियां

राज के बाल सुलभ मन पर दादाजी की पहली छवि यह बनी थी कि दादाजी उसे अपने साथ नहीं रखना चाहते। आख़िर क्यों?       दफ़्तर के लिए तैयार होने लगा राज। उसका मन कुछ उचाट-सा हो रहा था। रह-रहकर एक ही बात उसके दिमाग में घुमड़ रही थी कि दादाजी के जीवन में … Read more

घीसू

संध्या की कालिमा और निर्जनता  में किसी कुँए पर नगर के बाहर खड़ी प्यारी स्वर लहरी गूंजने लगती। घीसू को गाने का चस्का था, परन्तु जब कोई न सुने? वह अपनी बूटी अपने लिए घोटता और आप ही पीता। जब उसकी रसीली तान दो चार को पास बुला लेती, वह चुप हो जाता। अपनी बटुई … Read more

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