वह छाँव जिसे हम बेड़ियाँ समझ बैठे
“रोज-रोज की ये किचकिच अब और बर्दाश्त नहीं होती!” शिखा ने अपना हैंडबैग सोफे पर जोर से पटकते हुए कहा था। आज फिर वही बात हुई थी। ऑफिस से आने में थोड़ी देर क्या हो गई, उसकी माँ ने लगातार दस बार फोन कर दिया था। जब शिखा घर पहुंची, तो माँ दरवाजे पर ही … Read more