माँ का अदृश्य दर्द – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

“चुप रहिये माँ जी!” काव्या पहली बार सास पर चिल्लाई, लेकिन इस चिल्लाने में डांट नहीं, बल्कि एक बेटी का अधिकार और डर था। “आप हमें अनाथ करके जाना चाहती हैं? इतना दर्द छिपाकर आप… आप हमारे लिए…” काव्या का गला रुंध गया। रसोई में कुकर की सीटी की आवाज़ ने सुमित्रा जी की तंद्रा … Read more

पुरानी नींव, नई दीवारें – लतिका श्रीवास्तव

“मुझे अपनी लाचारी पर गुस्सा आता है, सुमन। मुझे गुस्सा आता है कि मैं अब ‘जरूरत’ नहीं रही, बस एक ‘बोझ’ बन गई हूँ। जब मैं तुझे घर के काम करते देखती हूँ, तो मुझे अपनी जवानी याद आती है। और जब तू कोई काम छोड़ देती है या गलती करती है, तो मुझे लगता … Read more

बूढ़े हाथों की नई परिभाषा – रीमा ठाकुर

 “मुझे पता है, यदि एक बार कामवाली लगा ली या तुम पर छोड़ दिया, तो इन बर्तनों की चमक चली जाएगी। कामवाली तो बस ऊपर-ऊपर से कपड़ा मारती है। ये पूजा के बर्तन हैं, इनमें मेरी आत्मा बसती है। और रही बात मेरे दर्द की, तो शरीर चलता रहे तभी तक ठीक है। किसी पर … Read more

संस्कारों की असली परीक्षा – आरती झा 

“सुमित्रा, आज मेरे सामने से हट जाओ। आज या तो इस घर में मेरे उसूल रहेंगे या फिर यह कल का छोकरा, जिसे मैंने अपनी उंगली पकड़कर दुनिया दिखाई है।” दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक के बीच हरीशंकर जी की गरजती हुई आवाज़ ने घर के सन्नाटे को चीर दिया। उनका चेहरा गुस्से से … Read more

बेटे की गद्दारी? – डॉ पारुल अग्रवाल 

“वाह!” कावेरी देवी ने ताली बजाई। “अब बहू मुझे बताएगी कि मुझे कहाँ रहना है? यह मेरा घर है, तेरे ससुर की निशानी। मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी। और तुम दोनों का असल मकसद तो ‘अलग’ होना है। यह लिफ्ट और ऑफिस की दूरी तो बस बहाने हैं। साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते कि अब … Read more

विदाई के बाद का हक़ – संगीता श्रीवास्तव

कल्याणी देवी ने निवाला तोड़ते हुए बेटे की आँखों में देखा। “मोहित, जब तू दसवीं में फेल हुआ था और पड़ोसियों ने कहा था कि ‘शर्मा जी का लड़का तो आवारा हो गया’, तब मैंने तुझे घर से निकाला था क्या? नहीं न? तो आज जब तेरी बहन की ज़िंदगी में तूफ़ान आया है, तो … Read more

वजूद का सौदा – रमा मिश्रा

“चुप रहो!” हेमंत बाबू ने हाथ उठाया। “मैं गलत नहीं समझ रहा। मैं साफ़ देख रहा हूँ। तुझे डर है कि तेरे गंवार रिश्तेदार, तेरे फटेहाल पिता और तेरी साधारण माँ तेरी ‘हाई प्रोफाइल’ दुनिया में धब्बा लगा देंगे? तुझे शर्म आती है न कि तेरे मामा धोती पहनते हैं? अरे, उसी मामा ने अपनी … Read more

शोर में गूंजता प्रेम – माता प्रसाद 

“चोर! यह साड़ी मेरी है। तूने चुराकर अपनी अलमारी में रख ली थी न? मैंने रंगे हाथों पकड़ लिया आज। सब देख लो, यह बहू नहीं, चोर है!” रेवती देवी चिल्लाईं। पूरे ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया। विकास का चेहरा शर्म से लाल हो गया। बॉस और उनकी पत्नी असहज हो गए। रसोई से … Read more

मैं बोझ बनकर नहीं जीना चाहता। – सीमा ऋषभ

रात के सन्नाटे में सूटकेस की चेन बंद करने की आवाज़ किसी धमाके जैसी गूंजी। 72 वर्षीय रमाकांत बाबू ने एक नज़र उस कमरे पर डाली जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पिछले चालीस साल गुज़ारे थे। दीवारों पर लगीं पुरानी तस्वीरें, अलमारी में सजी उनकी किताबें और कोने में रखी उनकी पत्नी की तस्वीर, जिन … Read more

आख़िर उसके सब्र का बांध टूट ही गया – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

सुबह के छह बजते ही ‘शांति-निवास’ में घंटी की नहीं, बल्कि सावित्री देवी के नाम की गूंज शुरू हो जाती थी। सत्तर वर्षीय दीनदयाल जी की चाय से लेकर, पोते चिंटू के स्कूल के मोज़े तक, सब कुछ सावित्री के हाथों से होकर ही गुजरता था। वह इस घर की वो नींव थीं जो ज़मीन … Read more

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