खामोश प्यार की गूंज – पुष्पा जोशी

दरवाजे की घंटी बजी तो सुमित्रा जी अपनी पुरानी आदत के मुताबिक थोड़ा बुदबुदाईं, “इस वक्त कौन आ गया? दोपहर की नींद का भी समय नहीं मिलता।” उन्होंने पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। सामने अपनी बेटी रिया को खड़ा देख उनकी आँखों में चमक आ गई। “अरे रिया! तू? और वो भी बिना बताए?” … Read more

वह मकान बिकाऊ नहीं है – के कामेश्वरी 

दीनानाथ जी ने अपने चश्मे को कुर्ते के कोने से साफ किया और फिर से नाक पर टिका लिया। सामने गेट पर पेंटर ‘शांति-कुंज’ लिख रहा था। नीले रंग के गेट पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जा रहा वह नाम दीनानाथ जी के लिए सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि चालीस साल की तपस्या का फल … Read more

पुराना कोट

 “सुधा! अभी तक बाबूजी नहीं आए?” समीर ने अपनी पत्नी से ऊँची आवाज़ में पूछा, जो रसोई में खाना गर्म कर रही थी। सुधा बाहर आई, उसके चेहरे पर भी चिंता थी। “नहीं, मैंने फोन भी किया था, पर वो उठा नहीं रहे। बारिश बहुत तेज़ है, शायद कहीं रुक गए होंगे। आप नाहक ही … Read more

अहंकार की राख

 सुमित्रा जी ने एक निवाला खाया और प्लेट सरका दी। “ये क्या बनाया है? इसमें न घी है न मेवा। हमारे यहाँ खाना शाही होता है। तुम्हें तो बस दाल-रोटी ही बनानी आती होगी। तुम्हारे बाप ने सिखाया ही क्या है?” शहर के पॉश इलाके में बने ‘विला नंबर 40’ के बाहर आज अलग ही … Read more

वक्त की बिसात

समीर रोता हुआ उठा था। उसे चोट शरीर पर नहीं, बल्कि रूह पर लगी थी। उस दिन उसके पिता रामदीन ने भी उसे डांटा था और समझाया था कि “बेटा, हम छोटे लोग हैं। हमें बड़े लोगों की बराबरी नहीं करनी चाहिए। वो सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और हम लोहे की कुदाल।” … Read more

सूटकेस में बंद खुशियां

शिखा ने आगे कहा, “पापा, हम आपको यहाँ ‘बोझ’ समझकर नहीं लाए हैं। सच तो यह है कि हमें आपकी ज़रूरत थी। उस घर की चारदीवारी में हम सिर्फ़ ‘ज़िम्मेदारियाँ’ निभा रहे थे, ‘रिश्ते’ नहीं। रवि को अपना बचपन याद आ रहा था, जब आप उसे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। आज वो आपको घुमाना … Read more

खनकते सिक्के

रवि एक मेधावी छात्र था। उसके पिता, सोहनलाल, एक पुरानी कपड़ा मिल में दिहाड़ी मज़दूर थे, जहाँ काम मिलने का कोई पक्का भरोसा नहीं होता था। माँ, कौशल्या, घर पर ही बीड़ी बनाने का काम करती थीं, जिससे घर में नमक-तेल का खर्च निकल आता था। रवि ने बारहवीं की परीक्षा ज़िले में टॉप की … Read more

 ब्याज़ में मिली इज़्ज़त – लतिका श्रीवास्तव 

“अंजलि ने जैसे ही उस पुराने, काई लगे लोहे के गेट का ताला खोला, उसकी माँ, सावित्री का हाथ कांप गया। वह चाबी, जो अंजलि ने अभी-अभी उनकी हथेली पर रखी थी, उसका वज़न सावित्री को पहाड़ जैसा लग रहा था। यह सिर्फ़ एक मकान की चाबी नहीं थी, यह उस खोए हुए सम्मान की … Read more

ममता की चौखट – हेमलता गुप्ता 

 गरिमा उस रात बहुत रोई। सुमित ने उसे समझाया, “गरिमा, माँ का स्वभाव ऐसा ही है। तुम दिल पर मत लो। मेरे लिए तुम ही इस घर की लक्ष्मी हो।” पर गरिमा के मन में एक सवाल घर कर गया था—क्या प्यार और सेवा का कोई मोल नहीं होता? क्या रिश्तों की बोली सिर्फ पैसों … Read more

फर्ज़ – रश्मि झा

“मैंने जो कहा, वो तूने सुना नहीं आरुषि? कल से तेरी जेठानी, वंदना, अस्पताल से घर आ रही है। डॉक्टर ने उसे पूरे दो महीने के ‘बेड-रेस्ट’ (बिस्तर पर आराम) के लिए कहा है। मैंने फैसला किया है कि तू अपनी यह ऑनलाइन नौकरी-वौकरी कुछ दिन के लिए बंद कर दे। घर की इज़्ज़त और … Read more

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