अनकही चिट्ठियाँ – निभा राजीव
सुमेधा का सब्र का बांध टूट गया। वह चिल्लाई, “रोज़! रोज़ यही सुनती हूँ मैं रवि। माँ की हालत खराब है, माँ को दवाई देनी है, माँ को नेबुलाइज़र लगाना है। **24 घंटे जब अपनी माँ की ही सेवा करनी थी, तो तुमने मुझसे शादी ही क्यों की?** कमरे में सूटकेस बंद करने की तेज़ … Read more