अनुपस्थित

आज एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, जगदीश बाबू सुबह की सैर पर नहीं आ रहे हैं. शायद बीमार हो गये हों. अब बुढापे में बीमार होना कौन बडी बात है. सर्दी के प्रकोप को इस उमर में झेलना आसान भी नहीं है. इस साल लगता है सर्दी सारे रिकार्ड तोड कर रहेगी.आठ बजे के … Read more

 अनकही चुभन: शहनाइयों के बीच एक खामोश चीख

 “अरे विशाखा! तुम कहां छुप कर बैठी हो अपने कमरे में? आज तुम्हारी सगी बहन की मेहंदी है और तुम ही पूरे घर से गायब हो? माना कि तुम्हारे अपने भाग्य में सुख नहीं लिखा, पर कम से कम बहन की खुशियों में तो ऐसे मनहूसियत मत फैलाओ। मुंह लटका कर बैठने से क्या अब … Read more

शीशे का महल: एक अनकही पारिवारिक दास्तान

 राधिका को देखते ही सीमा  अपने आंसुओं का बांध नहीं रोक पाई और फूट-फूटकर रोते हुए उसके गले लग गई। राधिका उसे संभालते हुए अंदर ले गई। कमरा अस्त-व्यस्त था। राधिका ने सीमा  को बिस्तर पर बिठाया और पानी पिलाया। जब सीमा  थोड़ी शांत हुई, तो राधिका ने उससे वे सारे सवाल किए जो पिछले … Read more

खामोश चीखें और एक माँ की दहाड़

 एक माँ का दिल सब समझता है। कल्याणी को यह समझते देर नहीं लगी कि वह जिस भेड़िये से अपनी बच्चियों को बचाने के लिए भागी थी, वह भेड़िया तो रक्षक का रूप धरकर उसके घर में ही बैठा है। उस रात कल्याणी सो नहीं पाई। उसने काव्या और दिशा से बात की, तो बच्चियों … Read more

ज़मीर का आईना: एक बेटे की अधूरी पहचान

 आज रामनाथ और कौशल्या की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। विकास के मन में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी थी। उसे याद था कि बचपन में वह इस दिन अपने माता-पिता के लिए अपने गुल्लक के पैसे तोड़कर एक छोटा सा केक लाता था। ग्लानि के एक क्षणिक झोंके ने आज उसे मजबूर … Read more

टूटे हुए सपनो की सुबह

शिखा की आँखों के सामने का वो सुनहरा सपना, जो उसने पिछले कई महीनों से बुना था, एक पल में कांच की तरह टूट कर बिखर गया। जिन रिश्तेदारों ने कहा था कि भाभी माँ बनकर आएगी, उनके सारे वादे और सारी बातें उस ठंडी सुबह के कोहरे में कहीं गायब हो गई थीं। उसे … Read more

एक रात का सफर

आज, मोहिनी  ने वही किया था। वह अपने ही घर में एक चोर की तरह दबे पांव उठी थी। अलमारी से अपनी मां के गहनों का डिब्बा निकाला, कुछ नगद रुपये रखे और अपनी सालों की यादों को एक छोटे से बैग में ठूंसकर उस दहलीज को पार कर गई, जिसने उसे चलना सिखाया था। … Read more

परछाइयों की तलाश – अनीता रवि

ऐसे लगता है जैसे सारी मनौतियाँ पूरी करने कर के गंगा नहा आई हूँ या हज से लौटी हूँ या पवित्र रोमनगरी से हो आई हूँ । शब्‍दों के धागे जैसे मन की भावनाओं को गूँथ ही नहीं पा रहे । बस महक रही हूँ मैं अखंड तृप्ति के फूलों की सुगंध से । विश्‍वास … Read more

विश्वास की कसौटी

अगले कुछ दिन नेहा के लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं थे। वह हर रात विकास के कपड़ों से किसी अजनबी परफ्यूम की महक सूंघने की कोशिश करती। जब विकास सो जाता, तो वह दबे पाँव उसका फोन चेक करने की कोशिश करती, लेकिन फोन में नया पासवर्ड लगा था जो उसे नहीं पता … Read more

सच्चे रिश्ते की कीमत – मुकेश पटेल

 सुशीला ने जब अपने पति को इस कदर उदास देखा, तो वह उनके पास आई और लिफाफे में रखे पैसों को देखकर सब समझ गई। उसने दीनानाथ के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद प्यार से समझाया, “आप क्यों इतना सोच रहे हैं? बड़े लोग हैं, उनका काम करने का तरीका अलग होता है। उन्होंने … Read more

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