हैसियत – एम. पी. सिंह

सेठ मोहन दास आज जयपुर के जाने माने मार्बल एक्सपोर्टर है. ये सब उनकी मेहनत का नतीजा था. उनका बेटा रोहित भी एम.बी.ए. करने के बाद पिताजी के साथ काम करने लगा था. रोहित के आने के बाद एक्सपोर्ट की नई उचाईयो क़ो छू लिया. वैसे रोहित के दादाजी की साइकिल रिपेयर की दुकान थीं … Read more

 बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – आर्या विनोद

 श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी। पिछले दो सालों से जिस आर्किटेक्चरल प्रोजेक्ट पर वह और उसकी कंपनी काम कर रही थी, वह आज सफलतापूर्वक पूरा हो गया था। अब उसकी कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो चुका था और कल से उसे इस ऑफिस में नहीं आना था। फाइलों को … Read more

कर्मों का अनकहा हिसाब: एक निस्वार्थ कदम

अनिकेत के जीवन में पिछले कुछ महीने किसी डरावने सपने से कम नहीं थे। पिता के अचानक हुए देहांत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उसके युवा कंधों पर आ गिरी थी। घर में एक बीमार माँ और कॉलेज के अंतिम वर्ष में पढ़ रही छोटी बहन रिया थी। पिता की जमा-पूंजी माँ के इलाज … Read more

बेनाम रिश्तों की अनकही दास्तान – कृतिका भण्डारी

शाम के धुंधलके में बारिश की हल्की फुहारें शहर की सड़कों को भिगो रही थीं। ऑफिस की दसवीं मंजिल पर स्थित केबिन में खामोशी छाई हुई थी। यह खामोशी किसी उदासी की नहीं, बल्कि एक लंबे और सफल सफर के खत्म होने की थी। श्रुति अपनी डेस्क पर रखा अपना सारा सामान समेट रही थी। … Read more

जब स्वाभिमान ने तोड़ी अपमान की बेड़ियां – निधि सहाय

अवनि आज बहुत देर तक आईने के सामने खड़ी रही। कांच में उभरने वाला अक्स उसे अपना सा नहीं लग रहा था। यह वह अवनि तो बिल्कुल नहीं थी जो पांच साल पहले इस घर में दुल्हन बनकर आई थी। तब वह छरहरी थी, उसके चेहरे पर एक अलग सा नूर था और उसके पति … Read more

**एक अधूरी तस्वीर: दर्द और प्यार का सफर** – मीरा महेश

काव्या ने अपनी माँ, नंदिनी को सिर्फ दीवारों पर टंगी उन बेजान तस्वीरों में ही देखा था। उन तस्वीरों में नंदिनी की आँखें इतनी जीवंत लगती थीं, मानो वो अभी तस्वीर से बाहर आकर काव्या को गले लगा लेंगी। काव्या के लिए उसकी माँ किसी परीकथा की उस रानी जैसी थी, जिसके किस्से उसने अपनी … Read more

एक ज़िद्दी इश्क – नमिता पंडित

 सुहानी अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही एक सफेद रंग की एसयूवी आकर ठीक उसके सामने रुकी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और इससे पहले कि सुहानी कोई प्रतिक्रिया दे पाती, शौर्य ने उसका हाथ पकड़ा और उसे गाड़ी में बैठने का इशारा किया। उसकी आँखों में एक अजीब सी जल्दबाज़ी और एक ऐसा अधिकार … Read more

अप्रैल फूल – एम. पी. सिंह

हमारी कॉलोनी मैं शीतल कुमार नाम का एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता है. उसके नाम के जैसा ही उसका चरित्र था. खाना बनाना, कपड़े धोना, हर आने जाने वाली औरतो से बातें करना. सारी कॉलोनी की खबर रखना उसकी हॉबी थीं. इसके अलावा आते जाते लोगों से मजाख भी करता था, कई बार … Read more

प्रायश्चित – उषा भारद्वाज

   घर में शादी का माहौल था। रिया कुछ घंटे पहले ही दिल्ली से आई है। साथ में उसका 5 साल का बेटा मंटू भी है। अक्षांश रिया के पति को समय न मिल पाने के कारण वह नहीं आ सके। उनका मन तो बहुत था छोटी साली की शादी में सम्मिलित होने का, मगर नहीं … Read more

खुद से मुलाकात – उषा भारद्वाज

कितनी अजीब बात है ना… तुम जब दूर हो रहे थे, तब हम घबरा रहे थे। सब कुछ खाली-खाली सा लग रहा था। कितनी अजीब बात है ना… घर में सब थे, मगर हम अकेले हो रहे थे। कितनी अजीब बात है ना… दिल में डर, चिंता, थोड़ा-थोड़ा गुस्सा भी भर रहा था, मगर तुमसे … Read more

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