जो बोओगे,वही काटोगे – मृणालिका दुबे
सुनीता की सुबह रोज़ चार बजे शुरू होती थी। मुर्गे की पहली बाँग से भी पहले उसकी आँख खुल जाती। नींद चाहे पूरी हुई हो या नहीं, उसे उठना ही पड़ता था। सबसे पहले वो रसोई में जाती, गैस पर चाय चढ़ाती, फिर आटा गूँधती, बच्चों के टिफिन तैयार करती और साथ-साथ सास के लिए … Read more