जो बोओगे,वही काटोगे – मृणालिका दुबे

सुनीता की सुबह रोज़ चार बजे शुरू होती थी। मुर्गे की पहली बाँग से भी पहले उसकी आँख खुल जाती। नींद चाहे पूरी हुई हो या नहीं, उसे उठना ही पड़ता था। सबसे पहले वो रसोई में जाती, गैस पर चाय चढ़ाती, फिर आटा गूँधती, बच्चों के टिफिन तैयार करती और साथ-साथ सास के लिए … Read more

जो बोया वही पाया – विनीता सिंह

धूल भरी गलियों वाले उस छोटे से गांव में रामदीन बहुत मेहनती था। सुबह हो या शाम, खेत में हल चलाता, बीज बोता। पसीना बहाता, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद की चमक। “थी जो बोया, वही पाया,”उनके पिता का यह कथन उसके खून में घुला था। पत्नी सुशीला दो मासूम बच्चों—लल्ला और गुड़िया—के साथ घर … Read more

जैसी करनी वैसी भरनी – कविता भडाना

“आज फिर से सारा मोहल्ला अपनी अपनी छतों पर जमा होकर रामलाल के घर होने वाले हंगामे को चटखारे लेकर देख रहा था” रामलाल के दोनों बेटे बटवारे को लेकर आपस में हिंसक तरीके से लड़ रहे थे, दोनों की पत्नी और बच्चे भी अपने अपने स्तर पर मोर्चा संभाले हुए थे, गाली गलौच से … Read more

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