शारदा जी की आवाज में एक कँपकँपाती हुई चीख थी, “पल्लवी! अपने भाई की बात पर अभी इसी वक्त यकीन कर लो… अगर तुमने उसकी खामोश सिसकियों को महज मियां-बीवी की तकरार समझकर टाल दिया, तो पूरी उम्र मेरी तरह पछतावे की आग में जलती रहोगी! देर मत करो, खुदा के लिए देर मत करो!”
पल्लवी हक्की-बक्की रह गई। उसने सहमते हुए कहा, “आंटी… आप? आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मैंने कई बार देखा है, जब भी मैं दोपहर में अचानक आती हूँ, आप बेडरूम की अलमारी के सामने खड़ी होकर किसी की तस्वीर सीने से लगाए रो रही होती हैं। मुझे देखते ही आप वो तस्वीर छिपा देती हैं और अपनी लाल आँखें पोंछ लेती हैं। आंटी, आप मुझसे क्या छुपा रही हैं? मुझे बताइए, क्या हुआ था?”
अक्टूबर की उस गुलाबी ठंड वाली सुबह भोपाल की गुलमोहर कॉलोनी में एक अलग ही ताजगी तैर रही थी। ठीक सुबह के सात बजे, अपने हाथ में अदरक वाली गर्म चाय की प्याली लिए शारदा जी बरामदे में रखे बेंत के झूले पर आकर बैठी थीं। सत्तर की उम्र छू रहीं शारदा जी के चेहरे पर झुर्रियों से ज्यादा एक गंभीर ठहराव था। उनकी नज़र अचानक सामने वाले खाली पड़े दो मंजिला मकान के बाहर रुकी एक नीली पिकअप वैन पर पड़ी। दो मजदूर पीछे का डाला खोलकर सोफा, गद्दे और बड़े-बड़े कार्टन उतार रहे थे। कई महीनों से वीरान पड़े उस घर में हलचल देखकर शारदा जी के चेहरे पर बरसों बाद एक हल्की सी उत्सुकता तैर गई।
चाय की चुस्की लेते हुए वह सोच ही रही थीं कि इस सूने मोहल्ले में अब कौन रहने आ रहा है, तभी उनके मुख्य गेट की घंटी बज उठी। शारदा जी ने चौंककर चश्मा ठीक किया और धीरे-धीरे चलकर गेट खोला। सामने करीब अट्ठाईस-तीस साल की एक सलीकेदार, सौम्य युवती खड़ी थी, जिसके चेहरे पर पसीने की बारीक बूँदें और थकान साफ झलक रही थी।
उसने बड़ी ही सादगी से दोनों हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते आंटीजी! मैं पल्लवी। बस सामने वाले मकान में आज ही शिफ्ट हो रहे हैं। अगर आपके पास अतिरिक्त पेचकस या कोई प्लास मिल जाता, तो अलमारी का लॉक ठीक कर लेते। हमारा टूलबॉक्स किस डिब्बे में बंद है, मिल ही नहीं रहा।”
“अरे बिल्कुल बेटा, तुम अंदर तो आओ,” शारदा जी के स्वर में अनायास ही एक ममत्व छलक आया।
“नहीं आंटी, अभी हाथ-पैर सब गर्द से भरे हैं, सारा सामान बिखरा पड़ा है। फिर कभी इत्मीनान से आऊँगी,” पल्लवी ने मुस्कुराते हुए संकोच जताया।
शारदा जी ने अंदर जाकर औजार का डिब्बा लाकर उसे थमा दिया। पल्लवी धन्यवाद कहकर मुड़ी ही थी कि शारदा जी ने उसे रोककर पानी की एक ठंडी बोतल भी थमा दी। उस एक छोटी सी शुरुआत ने अजनबीपन की दीवार को पहली ही मुलाकात में पिघला दिया था।
हफ्ते भर में पल्लवी का नया आशियाना पूरी तरह सलीके से जम गया। एक दोपहर जब धूप थोड़ी नर्म हुई, तो पल्लवी अपने हाथों से बने बेसन के लड्डू लेकर शारदा जी के घर पहुँची। दोनों ड्राइंग रूम में बैठकर बातें करने लगीं। बातचीत का सिलसिला चला तो पल्लवी ने अपने बारे में बताया। उसके पति अनिकेत एक निजी आईटी फर्म में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट हैं और अक्सर काम के सिलसिले में व्यस्त रहते हैं। सास-ससुर जबलपुर में रहते हैं और बहुत ही सीधे स्वभाव के हैं। पल्लवी की माँ का देहांत बचपन में ही हो गया था, पिता इंदौर में रहते हैं और एक छोटा भाई है—आलोक। आलोक की शादी को अभी मुश्किल से डेढ़ साल हुआ था और वह अपनी पत्नी स्नेहा के साथ पुणे में नौकरी करता था।
बातों के बीच पल्लवी ने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, “आंटी, आप इस इतने बड़े घर में बिल्कुल अकेले रहती हैं? अंकलजी…”
शारदा जी की आँखें दीवार पर टँगी एक शांत, मुस्कुराती तस्वीर पर जाकर टिक गईं। उन्होंने एक गहरी और सर्द साँस खींचते हुए कहा, “तुम्हारे अंकल वन विभाग में बड़े अफसर थे। पूरी जिंदगी जंगलों और हरियाली के बीच कटी। रिटायर हुए तो बोले कि भोपाल के इसी शांत कोने में आखिरी दिन बिताएँगे। उन्होंने बड़े चाव से यह घर बनवाया था। पर चार साल पहले एक रात अचानक दिल का दौरा पड़ा और वो मुझे तन्हा छोड़ गए। बस, एक बेटी है अंजलि, जिसकी शादी हमने बैंगलोर में कर दी है। दामाद बहुत सुलझे हुए हैं, दो प्यारे बच्चे हैं। वे लोग छुट्टियों में आते हैं, फोन पर रोज हाल-चाल लेते हैं। पर अपनी गृहस्थी की एक अलग दुनिया होती है बेटा। जिंदगी कट रही है, और अब तुम जैसी पड़ोसिन मिल गई तो दिन का अकेलापन कुछ कम हो जाएगा।”
उस दिन के बाद से पल्लवी और शारदा जी के बीच एक अटूट, सहज रिश्ता कायम हो गया। उम्र की चार दशकों की खाई मानों दोनों के अपनेपन के आगे मिट गई थी। दोपहर के ढलते ही पल्लवी अक्सर अपनी सिलाई-कढ़ाई या कभी कोई किताब लेकर शारदा जी के पास आ बैठती। दोनों मिलकर कभी सब्जियाँ काटतीं, कभी चाय की चुस्कियों के साथ पुरानी यादें टटोलतीं। शारदा जी उसे जिंदगी के तजुर्बे सिखातीं और पल्लवी उन्हें आज के दौर के गैजेट्स और दुनियादारी की बातें बताती।
एक दिन जब सूरज ढलने को था, पल्लवी शारदा जी के दीवान पर बैठी उनसे स्वेटर का एक नया डिजाइन सीख रही थी। तभी पल्लवी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर भाई ‘आलोक’ का नाम चमक रहा था। पल्लवी ने हंसते हुए फोन उठाया, “हाँ बोल भाई, आज बड़ी फुर्सत मिल गई दीदी की…”
पर दूसरी तरफ से जो आवाज आई, उसने पल्लवी के चेहरे का सारा रंग उड़ा दिया। आलोक की आवाज में एक असहज हड़बड़ाहट, बेबसी और कंपकंपाहट थी। वह लगभग रोते हुए हांफ रहा था, “दीदी… मैं अब और नहीं झेल सकता। मैं घुट रहा हूँ दीदी! स्नेहा के साथ इस घर में एक-एक पल काटना मेरे लिए नरक बन चुका है। मैं पागल हो जाऊँगा… मुझे बस यहाँ से निकाल लो, वरना मैं कुछ ऐसा कर बैठूँगा जो…”
“आलोक! तू होश में तो है? क्या बोल रहा है ये सब? शांत हो जा पहले, मुझे साफ-साफ बता क्या हुआ है…” पल्लवी घबराकर सोफे से उठ खड़ी हुई।
लेकिन आलोक ने फोन पर एक दबी हुई हिचकी ली और बिना कुछ कहे अचानक कॉल काट दिया। पल्लवी ने दोबारा नंबर मिलाया, पर फोन ‘स्विच ऑफ’ आने लगा। पल्लवी के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए, माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं।
शारदा जी, जो किचन से दोनों के लिए इलायची वाली चाय लेकर आ रही थीं, पल्लवी का उतरा हुआ और काँपता चेहरा देखकर ठिठक गईं। उन्होंने मेज पर कप रखे और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, “क्या बात है पल्लवी? किसका फोन था? इतनी घबराई हुई क्यों हो बेटा?”
पल्लवी की आँखों में आँसू छलक आए। उसने खुद को संभालते हुए कहा, “आंटी… आलोक का फोन था। मैं आपको क्या बताऊँ, शादी के कुछ महीनों बाद से ही उसके और स्नेहा के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा। आलोक जब भी फोन करता है, रोने लगता है। वह कहता है कि स्नेहा छोटी-छोटी बातों पर पूरे घर में चीखने-चिल्लाने लगती है, बर्तन पटकती है, उसका फोन हर वक्त चेक करती है। यहाँ तक कि ऑफिस के कलीग्स के सामने भी उसे बेइज्जत करने से नहीं चूकती। बिना बताए घंटों गायब रहती है और पूछो तो आत्महत्या की धमकी देकर उसे फंसाने की बात करती है।”
शारदा जी ने गौर से सुना और बहुत शांत स्वर में पूछा, “और स्नेहा? उसका क्या कहना होता है?”
पल्लवी अपना सिर पकड़कर बैठ गई, “यही तो सबसे बड़ी पहेली है आंटी! आलोक कहता है कि स्नेहा ने उसे परिवार से पूरी तरह काट दिया है, उसे मेरा फोन उठाना तक गवारा नहीं। पर जब मैं खुद पिछले महीने पुणे जाकर उनके साथ तीन दिन रहकर आई, तो स्नेहा का बर्ताव किसी देवदूत जैसा था। उसने बड़े प्यार से मेरे लिए खाना बनाया, मुझसे साड़ियों की राय ली, बार-बार मेरे पैर छूकर बोली कि दीदी आप हमेशा आया कीजिए, मुझे आपसे बहुत प्रेरणा मिलती है। अब आप ही बताइए आंटी, जो लड़की मेरे सामने इतनी विनीत, इतनी संस्कारी दिखती है, वो अपने ही पति के साथ इतनी बेरहम कैसे हो सकती है? मुझे कभी-कभी लगता है कि शायद आलोक ही ज्यादा सोचता है, शायद वो नई पीढ़ी के एडजस्टमेंट को समझ नहीं पा रहा और छोटी-मोटी नोकझोंक को पहाड़ बना रहा है।”
शारदा जी के चेहरे पर जो शांति थी, वह अचानक एक भयावह सन्नाटे में बदल गई। उनके हाथ कांपने लगे और आँखों में बरसों से दबा एक खौफनाक तूफान जाग उठा। उन्होंने झटके से पल्लवी की कलाई थाम ली। उनकी पकड़ इतनी सख्त थी कि पल्लवी सिहर उठी।
शारदा जी की आवाज में एक कँपकँपाती हुई चीख थी, “पल्लवी! अपने भाई की बात पर अभी इसी वक्त यकीन कर लो… अगर तुमने उसकी खामोश सिसकियों को महज मियां-बीवी की तकरार समझकर टाल दिया, तो पूरी उम्र मेरी तरह पछतावे की आग में जलती रहोगी! देर मत करो, खुदा के लिए देर मत करो!”
पल्लवी हक्की-बक्की रह गई। उसने सहमते हुए कहा, “आंटी… आप? आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मैंने कई बार देखा है, जब भी मैं दोपहर में अचानक आती हूँ, आप बेडरूम की अलमारी के सामने खड़ी होकर किसी की तस्वीर सीने से लगाए रो रही होती हैं। मुझे देखते ही आप वो तस्वीर छिपा देती हैं और अपनी लाल आँखें पोंछ लेती हैं। आंटी, आप मुझसे क्या छुपा रही हैं? मुझे बताइए, क्या हुआ था?”
पल्लवी ने कांपते हाथों से शारदा जी के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उस निश्छल और आत्मीय स्पर्श ने मानों शारदा जी के भीतर के बाँध को पूरी तरह तोड़ दिया। सत्तर साल की वह गंभीर महिला किसी बेसहारा बच्ची की तरह फूट-फूटकर रो पड़ीं। उनके आँसुओं से पल्लवी की हथेलियाँ भीग गईं। कुछ देर बाद, कांपते कदमों से शारदा जी बेडरूम में गईं और अलमारी के सबसे गहरे लॉकर में से एक फ्रेम की हुई तस्वीर निकाल लाईं।
तस्वीर को पल्लवी की गोद में रखते हुए रुंधे गले से बोलीं, “ये मेरा बेटा है… मलय।”
पल्लवी ने तस्वीर देखी। चौड़े माथे, आँखों में चमक और चेहरे पर एक मासूम, निश्चल मुस्कान लिए एक बेहद खूबसूरत नौजवान की तस्वीर थी।
“बेटा? पर आंटी… आपने तो कहा था कि आपकी सिर्फ एक बेटी है अंजलि?” पल्लवी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
शारदा जी ने दीवार से सिर टिका लिया और शून्य में ताकते हुए अपने सीने में दफन अतीत के पन्नों को खोलना शुरू किया।
“हाँ पल्लवी… मेरा एक बेटा भी था। मेरा मलय, मेरी अंजलि से दो साल बड़ा। पढ़ाई में इतना कुशाग्र कि जो किताब एक बार छू ले, उसे कंठस्थ हो जाती। उसने ग्वालियर से बी.टेक किया और फिर उसका चयन गुड़गांव की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में हो गया। जब अंजलि की शादी हो गई, तो मलय ने बड़े संकोच से अपने पिता से कहा था, ‘पापा, मेरे ऑफिस में एक लड़की है तन्वी। हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। आप और माँ एक बार आकर मिल लीजिए।’ हम लोग गुड़गांव गए। तन्वी बोलने में बहुत तेज-तर्रार, आकर्षक और पढ़ी-लिखी थी। उसने हमारे सामने इतने अदब से बात की कि हम मुग्ध हो गए। हमने सोचा कि आज के दौर के बच्चे हैं, साथ काम करते हैं, एक-दूसरे को बेहतर समझते हैं। बड़ी धूमधाम से दोनों का ब्याह कर दिया।”
शारदा जी की हिचकियाँ तेज हो गईं। उन्होंने अपना आँचल मुँह में दबाया और फिर खुद को संभालते हुए आगे बोलीं, “शादी के छह महीने बाद से ही मलय के फोन आने लगे थे। कभी रात के दो बजे, कभी सुबह के पाँच बजे। वह अक्सर कहता, ‘माँ, तन्वी का मिजाज बहुत हिंसक है। वह बात-बात पर गाली-गलौज करती है, मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है। अगर मैं उसके मनमुताबिक न चलूँ तो वो हाथ की नस काटने की धमकी देती है और कहती है कि पूरे परिवार को दहेज के झूठे केस में जेल भिजवा दूँगी।’ पर पल्लवी, जब भी तन्वी हमसे बात करती, उसकी आवाज में शहद घुला होता। वह कहती, ‘मम्मीजी, मलय बहुत पजेसिव हैं, मुझ पर शक करते हैं, मैं तो बस इस रिश्ते को बचाना चाहती हूँ।’
हम पुराने जमाने के लोग थे पल्लवी… हमारे दौर में सिखाया जाता था कि गृहस्थी में चार बर्तन खड़कते ही हैं, लड़कों को थोड़ा झुकना चाहिए, औरत का मिजाज समझना चाहिए। मैंने हर बार मलय से यही कहा—’बेटा, तू ही थोड़ा समझौता कर ले। औरत घर की लक्ष्मी होती है, उसका दिल जीत। तू समझदार है, बात को मत बढ़ा।’ उसके पिता भी यही कहते रहे कि नई उम्र की लड़की है, करियर का तनाव होगा, तू सब्र रख।
मलय बार-बार कहता रहा कि माँ, वो सबके सामने जो मुखौटा पहनती है, बंद कमरों में वो वैसी नहीं है। वो मुझे तिल-तिल कर मार रही है। पर हमने… हमने उसके उस दर्द को, उसके उस खामोश चीत्कार को नहीं समझा। हमें लगा कि वह अपनी पत्नी को संभाल नहीं पा रहा है। और फिर एक दिन…”
शारदा जी का गला पूरी तरह रुंध गया। वह अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर दहाड़े मारकर रोने लगीं।
“एक दिन… ऑफिस से आकर मलय ने अपने उस आलीशान फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसने पंखे से लटककर अपनी जान दे दी! उसने अपनी डायरी में लिखा था—’माँ-पापा, मैं कमजोर नहीं था, पर मैं उस रोज-रोज की मानसिक हिंसा, उस अपमान और उस अकेलेपन से हार गया। जब मेरे अपने ही मेरी बेबसी को मेरा वहम समझने लगे, तो मेरे पास खामोश हो जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।’
उस दिन के बाद हमारे घर का चिराग बुझ गया पल्लवी। उसके जाने के छह महीने बाद उसके पिता भी उस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और उनका दिल हमेशा के लिए थम गया। मैं… मैं अपने ही बेटे की कातिल बन गई पल्लवी! समाज के डर से, ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से, मैंने अपने जीते-जागते बेटे को एक झूठे रिश्ते की वेदी पर चढ़ा दिया। तब से मैं इस दुनिया से अपना मुँह छिपाए जी रही हूँ। मैं किसी से नहीं कहती कि मेरा एक बेटा भी था… क्योंकि मैं एक ऐसी अभागी माँ हूँ जो अपने बच्चे की पुकार नहीं सुन सकी!”
शारदा जी की इस दास्तान ने पल्लवी की रूह को झकझोर कर रख दिया। उसके रोंगटे खड़े हो गए और आँखों से आँसू बहने लगे। उसके कानों में अभी थोड़ी देर पहले कही आलोक की बात गूँजने लगी—”दीदी, मैं घुट रहा हूँ… मुझे निकाल लो वरना मैं कुछ ऐसा कर बैठूँगा…”
पल्लवी को अपनी भूल का अहसास बिजली के कौंधे की तरह हुआ। उसने समझा कि कैसे एक पुरुष जब मानसिक प्रताड़ना का शिकार होता है, तो पूरा समाज—यहाँ तक कि उसका अपना परिवार भी—यह मान लेता है कि गलती उसी की होगी। क्योंकि औरत को हमेशा पीड़ित और पुरुष को हमेशा सक्षम मान लिया जाता है।
पल्लवी ने फौरन अपने आँसू पोंछे। शारदा जी के पैरों को छूकर उसने दृढ़ता से कहा, “नहीं आंटी… आपने अपनी कहानी मुझे आज यूँ ही नहीं सुनाई है। यह ऊपर वाले का इशारा है। मैं आपके मलय को तो वापस नहीं ला सकती, लेकिन मैं आपके दिए इस सबक से अपने आलोक को तिल-तिल कर मरने नहीं दूँगी। मैं उसे उस नरक से बचाऊँगी!”
पल्लवी ने उसी वक्त अपने पति अनिकेत को फोन किया और पूरी बात बताई। अनिकेत एक समझदार और संवेदनशील इंसान थे। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को तुरंत भाँपा। शाम की फ्लाइट से पल्लवी और अनिकेत सीधे पुणे के लिए रवाना हो गए।
रात के ग्यारह बजे जब वे पुणे में आलोक के फ्लैट पर पहुँचे, तो घर का मंजर देखकर उनके होश उड़ गए। घर का सारा सामान इधर-उधर टूटा पड़ा था। आलोक बेडरूम के कोने में जमीन पर बैठा अपने सिर को घुटनों में छुपाए सुबक रहा था, उसके हाथ पर खरोंच के निशान थे। स्नेहा हॉल में आराम से बैठी टीवी देख रही थी और उनके अचानक पहुँचने पर उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। उसने तुरंत अपने चेहरे पर एक झूठी मासूमियत ओढ़ने की कोशिश की, “दीदी! आप इस वक्त? देखिए ना, आलोक किस तरह पागलों जैसा बर्ताव कर रहे हैं…”
पर इस बार पल्लवी उस मीठे छलावे में नहीं फँसी। उसने स्नेहा को बीच में ही रोकते हुए बेहद सख्त और शांत लहजे में कहा, “बस स्नेहा, अब और नहीं। हमने सब देख लिया है और सब समझ लिया है।”
अनिकेत ने आगे बढ़कर आलोक को सहारा देकर उठाया और अपने सीने से लगा लिया। अपने जीजा के गले लगते ही पच्चीस साल का वह नौजवान फफक-फफक कर रो पड़ा, “जीजू… मुझे बचा लीजिए, मैं मर जाता…”
पल्लवी और अनिकेत ने उस रात कोई तमाशा नहीं किया, कोई चीख-पुकार नहीं की। वे बहुत ही परिपक्वता से आलोक को उसी वक्त अपने साथ लेकर होटल चले गए। अगले दिन, उन्होंने दोनों परिवारों के वरिष्ठ लोगों को पुणे बुलाया। किसी भी आरोप-प्रत्यारोप या पुलिस-कचहरी के गंदे ड्रामे में उलझने के बजाय, उन्होंने दोनों की काउंसलिंग कराई। काउंसलर के सामने जब सच्चाई की परतें खुलीं, तो साफ हो गया कि दोनों का व्यक्तित्व एक-दूसरे के लिए बिल्कुल विषैला था और स्नेहा एक गंभीर पर्सनालिटी डिसऑर्डर और गहरे इनसिक्योरिटी सिंड्रोम से जूझ रही थी।
पल्लवी और उसके परिवार ने लोक-लाज और ‘समाज क्या कहेगा’ के झूठे आडंबर को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। उन्होंने साफ फैसला लिया कि किसी गलत और दमघोंटू रिश्ते को ढोने से हजार गुना बेहतर है कि उसे सम्मानपूर्वक खत्म कर दिया जाए। दोनों पक्षों की सहमति से कानूनी तौर पर तलाक की प्रक्रिया शुरू की गई और आपसी रजामंदी से दोनों अलग हो गए।
आलोक को उस दमघोंटू रिश्ते से मुक्ति मिल चुकी थी। अनिकेत और पल्लवी उसे कुछ महीनों के लिए अपने साथ भोपाल ले आए। यहाँ की शांत हवा, परिवार का प्यार और एक सुरक्षित माहौल ने धीरे-धीरे आलोक के मानसिक घावों को भरना शुरू किया।
एक सुहानी शाम, आलोक शारदा जी के बरामदे में बैठा था। शारदा जी ने बड़े प्यार से अपने हाथों से बनाई खीर की कटोरी उसके हाथ में थमाई और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “जिंदगी बहुत खूबसूरत है बेटा। कभी किसी एक बंद दरवाजे को पूरी जिंदगी का अंत मत समझना। जब इंसान खुद से प्यार करना सीख जाता है, तो ईश्वर उसके लिए नए रास्ते खोल देता है।”
आलोक ने नम आँखों से शारदा जी के हाथ चूम लिए।
शारदा जी ने उस शाम अपने कमरे में जाकर बरसों बाद अपने बेटे मलय की तस्वीर को अलमारी से निकाला और उसे छुपाने के बजाय, अपने पति की तस्वीर के ठीक बगल में दीवार पर गर्व और शांति से सजा दिया। आज उनकी आत्मा का बोझ हल्का हो गया था। उन्होंने अपने बेटे को खो दिया था, पर उसके दर्द की दास्तान ने आज किसी दूसरे घर के चिराग को बुझने से बचा लिया था।
अक्सर हमारे समाज में यह मान लिया जाता है कि दर्द सिर्फ उसी का होता है जो चीख सकता है, और पुरुष कभी पीड़ित नहीं हो सकता। क्या आपके आस-पास भी कोई अपना किसी ऐसे ही खामोश, दमघोंटू रिश्ते में घुट रहा है जिसकी चुप्पी को हम ‘सामान्य तकरार’ समझकर अनदेखा कर रहे हैं? रिश्तों को बचाने की जिद में क्या कभी किसी इंसान की जिंदगी से बड़ा समझौता करना सही है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
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