हिसाब काँच के बर्तनों का

 आकाश अपनी पत्नी के इस अचानक बदले रूप को देखकर सन्न रह गया। परिवार के अन्य रिश्तेदारों के सामने उसे अपनी घोर बेइज़्ज़ती महसूस हुई। वह गुस्से से लाल होकर शालिनी की तरफ झपटा, “शालिनी! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? भाभी और माँ प्यार से दे रही हैं और तुम यहाँ तमाशा खड़ा कर रही हो? ज़रा सी चीज़ के लिए इतना बखेड़ा?”

दीपावली की चहल-पहल के बाद घर में पसरा सन्नाटा किसी भारी सज़ा की तरह लग रहा था। अभी दो घंटे पहले ही पूरा घर हँसी-ठहाकों, बच्चों की किलकारियों और विदाई की रस्मों से गूँज रहा था। जेठ-जेठानी और ननद अपने-अपने परिवारों के साथ गाड़ियों में बैठ कर जा चुके थे। आँगन में अब भी मुरझाए हुए गेंदे के फूलों की लड़ियाँ और सूखी रंगोली के बिखरे रंग बाकी थे। लेकिन शालिनी को किसी के जाने का रत्ती भर भी अफ़सोस नहीं था। वह बिना किसी भाव के डाइनिंग टेबल पर बिखरे गंदे कप और प्लेटें समेट रही थी। एक दौर वह भी था जब वह हर विदाई पर दरवाज़े की चौखट पकड़ कर रो पड़ती थी, अपनों के चले जाने से उसका कलेजा मुँह को आता था। लेकिन आंसुओं की वह नदी अब सूख कर पथरीली ज़मीन बन चुकी थी।

“बहू… ज़रा इधर तो आना।”

दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी की सुइयों की टिक-टिक के बीच सासू माँ यशोदा जी की खनकती आवाज़ गूँजी। शालिनी ने हाथ में पकड़ा गीला कपड़ा वहीं स्लैब पर छोड़ा, एक गहरी और ठंडी साँस भीतर खींची और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए सासू माँ के कमरे के दरवाज़े पर जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखें सपाट थीं, चेहरे पर न कोई शिकायत थी और न कोई आदर का बनावटी मुखौटा।

“जी माँ जी, कहिए। अब कौन सी नई कमी रह गई जो सुनाने के लिए बुलाया है?” शालिनी के लहज़े में जमी तीखी बर्फ़ ने यशोदा जी को भीतर तक हिला दिया। वह पलंग पर बैठी एक मखमली बैग में हाथ डाले कुछ टटोल रही थीं। शालिनी के इस सीधे और बेबाक सवाल पर उनके हाथ ठिठक गए।

“अरे नहीं बहू, मैं तो… वो मैं कह रही थी कि लगता है अलका की वो काँच की सर्विंग कटोरियाँ और डिनर सेट के कुछ बाउल यहीं रह गए हैं। उसने बड़ी हिफाज़त से रखे थे…” यशोदा जी की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि शालिनी ने तीखे व्यंग्य के साथ बात बीच में ही काट दी।

“माँ जी, आप बिल्कुल फ़िक्र मत कीजिए। आपकी बड़ी बहू का एक-एक चम्मच, हर कटोरी और हर डिब्बा चुन-चुन कर इसी डिब्बे में पैक कर दूँगी। जब आप अगले महीने भोपाल उनके पास रहने जाएँगी, तो सब कुछ अपनी निगरानी में ले जाइएगा। मुझे उनके किसी एहसान या बर्तन की अपने चौके में कोई ज़रूरत नहीं है।”

यशोदा जी का चेहरा फक़ पड़ गया। उन्होंने संभलने की कोशिश करते हुए नर्म आवाज़ में कहा, “बहू, तुम इतने सालों बाद भी उसी एक बात की गाँठ बाँध कर बैठी हो? अरे, उस ज़माने में एक-एक चीज़ पाई-पाई जोड़ कर खरीदी जाती थी, इसलिए ज़ुबान से निकल गया होगा। अब तो ज़माना बदल गया है। मैं तो बस सहज भाव से कह रही थी कि कहीं तुम अनजाने में इस्तेमाल न कर लो।”

“माँ जी, ज़माना बदला होगा, लेकिन अपनों के दिए हुए वो घाव आज भी ताज़ा हैं,” शालिनी की आवाज़ बेहद शांत थी, पर उस शांति में पुराना तूफ़ान छुपा था। “खैर, मुझे अब गड़े मुर्दे उखाड़ कर इस खाली घर में कोई महाभारत नहीं रचनी। मैं एक बड़ा कार्टन ला देती हूँ, आप सारा सामान उसमें सहेज लीजिए। और हाँ, वो गत्ते का कार्टन और टेप मेरे मायके से आए सामान का है, उसे लौटाने का कष्ट मत कीजिएगा। चीज़ें मेरी हों या उनकी, आपके लिए तो सिर्फ़ बड़ी बहू की चीज़ें ही अनमोल हैं।” इतना कह कर शालिनी मुड़ी और बिना उनके जवाब का इंतज़ार किए कमरे से बाहर निकल गई।

कमरे में बैठी यशोदा जी की नज़रें झुक गईं। शालिनी के इस कड़वे और उखड़े व्यवहार की टीस उन्हें अंदर ही अंदर कचोट रही थी। वह जानती थीं कि आज शालिनी जिस पथरीली दीवार की तरह उनके सामने खड़ी है, उस दीवार की हर ईंट उन्होंने खुद अपने हाथों से रखी थी।

अलमारी से काँच के बर्तन निकालते हुए यशोदा जी का मन स्मृतियों के उस भंवर में डूब गया, जो आज से सात साल पहले घटा था। तब शालिनी की शादी को महज़ दो ही साल हुए थे। शालिनी के पति आकाश एक निजी बैंक में नौकरी करते थे और परिवार सहित इंदौर में रहते थे, जबकि बड़े बेटे सुमित और जेठानी अलका भोपाल में एक बड़े कारोबार के मालिक थे। यशोदा जी का ज़्यादातर वक़्त भोपाल में ही बीतता था, क्योंकि वहाँ बड़ा मकान, नौकर-चाकर और ऐशो-आराम था। इंदौर तो वह साल-छह महीने में कुछ हफ़्तों के लिए ही आती थीं।

उस साल गर्मियों की छुट्टियों में आकाश और शालिनी दस दिनों के लिए भोपाल गए थे। शालिनी ने उन दस दिनों में पूरे घर को सम्भालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, वह अलका भाभी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रसोई में खटती रही। मायके से जो काजू की कतली और साड़ियाँ वह जेठानी और सास के लिए लाई थी, उन्हें सबने बड़ी शान से स्वीकारा था।

वापसी वाले दिन रात की ट्रेन थी। आकाश ने शाम को प्यार से भाभी से कहा, “भाभी, ट्रेन रात को बारह बजे है। बाहर का खाना पेट खराब करता है, तो शालिनी को बोल दिया है कि वह परांठे और भुजिया बना लेगी।”

शालिनी ने झटपट खाना तैयार किया। जब वह खाना पैक करने के लिए फॉयल पेपर और साधारण डिब्बे ढूंढ रही थी, तभी अलका ने अलमारी से एक चमचमाता, डिज़ाइनर टिफिन बॉक्स निकालते हुए बड़े अपनेपन से कहा, “अरे शालिनी, फॉयल में खाना ठंडा हो जाएगा। तुम इस हॉट-पैक वाले टिफिन में रख लो। इसमें चार खाने हैं, अचार और सब्ज़ी भी आराम से आ जाएगी। रास्ते में कोई दिक्कत नहीं होगी।”

शालिनी को अपनी जेठानी का यह रूप देखकर बहुत अच्छा लगा था। उसने कृतज्ञता से टिफिन लिया, खाना पैक किया और वे लोग इंदौर आ गए। इंदौर आकर शालिनी ने सफर खत्म होते ही सबसे पहले उस टिफिन को धोकर, चमकाकर धूप में सुखाया और सुरक्षित किचन की सबसे ऊपर वाली रैक पर रख दिया ताकि अगली बार जब वे भोपाल जाएं तो लौटा सकें।

महीना भर बीत गया। घर-गृहस्थी की आपाधापी में शालिनी उस टिफिन के बारे में भूल भी चुकी थी। एक दोपहर जब आकाश ऑफिस में थे, लैंडलाइन फोन की घंटी बजी। शालिनी ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ सासू माँ यशोदा जी थीं। बिना हाल-चाल पूछे, उनकी आवाज़ में गज़ब की तल्खी थी, “शालिनी, भोपाल से जो अलका का नया टिफिन लेकर गई थी, वो कहाँ फेंक आई हो? यहाँ मिल ही नहीं रहा है।”

शालिनी हक्की-बक्की रह गई। उसने संकोच से कहा, “माँ जी, प्रणाम। वो टिफिन तो मेरे पास ही है। मैंने धोकर ऊपर रैक पर रख दिया था। क्या उसे तुरंत भेजना था?”

“और नहीं तो क्या! बहू, वो कोई आम प्लास्टिक का डिब्बा नहीं था, अलका के मायके से आया हुआ महँगा ब्रांडेड टिफिन था। अब यहाँ सुमित को कहीं बाहर जाना है तो क्या हम नया खरीदने बाज़ार दौड़ें? जब तुम्हें पता था कि वो अलका की अमानत है, तो किसी के हाथ भिजवाना चाहिए था न! अलका बेचारी सीधे मुँह तुमसे कुछ कह नहीं पाती, इसलिए मुझे कहना पड़ रहा है।” यशोदा जी की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि बगल में बैठी पड़ोसन तक साफ सुन सकती थी।

शालिनी का आत्मसम्मान तार-तार हो गया। उसकी आँखों में पानी भर आया। उसने गला साफ़ करते हुए कहा, “माँ जी, एक मामूली टिफिन के लिए आप इस तरह बात कर रही हैं? जब हम भोपाल आते हैं, तो आकाश हज़ारों रुपये का सामान, राशन और फल-मेवे ले आते हैं, तब तो आपने कभी नहीं गिना। अगर अलका दीदी को टिफिन इतना ही प्यारा था, तो मुझे दिया ही क्यों था? खैर, परसों आकाश के एक दोस्त भोपाल जा रहे हैं, मैं उनके हाथ भिजवा दूँगी।”

उस दिन शालिनी खूब रोई थी। लेकिन असली तमाशा तो तब हुआ जब उसके अगले साल पूरा परिवार फिर से भोपाल में इकट्ठा हुआ। आकाश के सामने अलका और यशोदा जी का व्यवहार शालिनी के प्रति इतना मीठा था मानो वह उनकी सगी बेटी हो। आकाश जब भी कमरे में आता, अलका कहती, “शालिनी, तुम बैठो, मैं चाय बनाती हूँ। सफर से आई हो, थक गई होगी।”

लेकिन जैसे ही आकाश बाहर जाता, यशोदा जी शालिनी के पास आकर धीमी आवाज़ में फुसफुसातीं, “शालिनी, पिछली बार जो तुम यहाँ से दो स्टील के चम्मच ले गई थी, वो वापस नहीं लाईं? और हाँ, इस बार नाश्ते के लिए जो डिब्बे तुम्हें अलका दे रही है, उन्हें संभाल कर रखना, कहीं भूल मत जाना।”

शालिनी के भीतर घुटता हुआ गुस्सा ज्वालामुखी बन चुका था। विदाई की घड़ी आई। आकाश हॉल में खड़ा था। अलका भाभी ने फिर से एक महंगा काँच का कंटेनर और दो चमचमाते प्लास्टिक के डिब्बे टेबल पर रखते हुए बड़े प्यार भरे अंदाज़ में आकाश से कहा, “आकाश, इसमें मैंने शालिनी के हाथ की बनी बेसन की बर्फी और नमकीन रख दी है। रास्ते में खाते हुए जाना।”

शालिनी का सब्र उस दिन जवाब दे गया। उसने आगे बढ़कर उन डिब्बों को हाथ लगाने से साफ मना कर दिया। उसका चेहरा तमतमा उठा। वह तीखी आवाज़ में बोली, “भाभी जी, आप अपने ये कीमती काँच के कंटेनर और डिब्बे अपने पास ही रखिए। हमें जो कुछ ले जाना होगा, हम अख़बार में लपेट कर या साधारण पॉलीथिन में ले जाएँगे। आप लोग हर बार आकाश के सामने यह दिखावा करते हैं कि आप कितना लुटा रहे हैं, और हमारे इंदौर पहुँचते ही माँ जी का फोन आ जाता है कि हमारा महँगा बर्तन कब लौटा रही हो! मुझे आपके इन बर्तनों का मानसिक किराया नहीं चुकाना।”

आकाश अपनी पत्नी के इस अचानक बदले रूप को देखकर सन्न रह गया। परिवार के अन्य रिश्तेदारों के सामने उसे अपनी घोर बेइज़्ज़ती महसूस हुई। वह गुस्से से लाल होकर शालिनी की तरफ झपटा, “शालिनी! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? भाभी और माँ प्यार से दे रही हैं और तुम यहाँ तमाशा खड़ा कर रही हो? ज़रा सी चीज़ के लिए इतना बखेड़ा?”

“प्यार नहीं, यह दिखावे का जाल है आकाश!” शालिनी चीख पड़ी। “आपको नहीं पता कि आपके पीठ पीछे मुझे एक-एक चम्मच और टिफिन के लिए भिखारी की तरह ताने दिए जाते हैं। मुझे हिदायत दी जाती है कि आपको न बताऊँ! जो चीज़ें हम फेंक देते हैं, ये लोग उन चीज़ों का भी हिसाब रखती हैं और आपके सामने देवी बन जाती हैं!”

क्रोध, झूठी मर्यादा और अहंकार में अंधे होकर आकाश ने बिना सोचे-समझे भरी महफ़िल में सबके सामने शालिनी के गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया था। उस थप्पड़ की गूँज से वह कमरा ही नहीं, शालिनी का वैवाहिक जीवन भी थर्रा गया था। उस दिन शालिनी ने रोना बंद कर दिया था। उस एक थप्पड़ ने उसके दिल से ससुराल वालों के झूठे अपनत्व और पति के अंधे विश्वास दोनों को एक झटके में बेदखल कर दिया था।

उस घटना के बाद कई साल बीत गए। शालिनी ने उस अपमान को कभी भूला नहीं। उसने घर में अपना दायित्व तो निभाया, लेकिन अपने आत्मसम्मान की एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी जिसे पार करने की हिम्मत फिर कभी किसी में नहीं हुई। यहाँ तक कि आकाश को भी जब धीरे-धीरे अपनी माँ और भाभी के इस दोहरे चेहरे की सच्चाई का अहसास हुआ, तो वह अंदर ही अंदर ग्लानि से भर गया था। उसने शालिनी से अकेले में कई बार माफ़ी मांगी थी, लेकिन टूटे हुए शीशे पर पड़ी दरार कभी पूरी तरह नहीं भरती।

फ्लैशबैक से बाहर आते ही यशोदा जी की आँखों से एक बूँद टपक कर उनके हाथ पर गिरी। आज वही शालिनी थी, वही घर था, और वही अलका का छोड़ा हुआ सामान था। लेकिन आज यशोदा जी की हिम्मत नहीं थी कि वह शालिनी पर अपना पुराना रौब जमा सकें। आज जब उनके अपने हाथ काँप रहे थे, तो उन्हें समझ आया कि जो बहू चुपचाप हर ज़ुल्म सहती थी, असल में वही इस घर की सबसे मज़बूत नींव थी।

शालिनी एक बड़ा गत्ते का डिब्बा और टेप लेकर कमरे में आई। उसने बिना कुछ कहे नीचे झुक कर अलका की छोड़ी हुई काँच की कटोरियाँ, महँगी क्रॉकरी और कुछ डब्बे उसमें करीने से रखने शुरू कर दिए। वह इतनी सावधानी से रख रही थी कि कोई चीज़ चटक न जाए।

यशोदा जी से अब और रहा नहीं गया। उनका गला रुंध गया। वह आगे बढ़ीं और उन्होंने शालिनी के दोनों हाथों को अपने काँपते हाथों में थाम लिया।

शालिनी चौंक कर रुक गई। उसने अपनी सास की तरफ देखा। यशोदा जी की आँखों में आज वह कठोरता और अधिकार नहीं था, बल्कि एक गहरी याचना और पश्चाताप था।

“बहू… मुझे माफ़ कर दे,” यशोदा जी की आवाज़ थरथरा रही थी। “आज जब तू यह डिब्बा इतनी हिफाज़त से पैक कर रही है, तो मुझे अपनी औकात समझ आ रही है। मैंने हमेशा चीज़ों को, उन बेजान काँच और प्लास्टिक के बर्तनों को रिश्तों से ऊपर समझा। अलका के झूठे मान को रखने के लिए मैंने तेरी सच्ची निष्ठा और आत्मसम्मान को कुचल दिया। उस दिन जो थप्पड़ आकाश ने तुझे मारा था, उसका असली गुनाहगार आकाश नहीं, मेरी यह संकीर्ण सोच थी।”

शालिनी चुप रही। उसकी पलकें हल्की सी भीगीं, पर उसने खुद को कठोर बनाए रखा।

यशोदा जी ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “बड़ी बहू ने इतने सालों में मुझे कभी अपने दिल में जगह नहीं दी। जब तक मेरी सेहत ठीक थी, उसने मेरी तीमारदारी का ढोंग किया। आज जब मुझे चलने-फिरने में तकलीफ होती है, तो वह मुझे तुम्हारे पास छोड़कर यह कहकर चली गई कि उसके पास वक़्त नहीं है। और जाते-जाते भी इन बर्तनों की फिक्र उसे थी, मेरी नहीं। लेकिन तूने… तूने इस कड़वाहट के बाद भी कभी मेरी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी। मैंने इंसान खो दिए और डिब्बे सहेजती रही।”

उसी समय आकाश कमरे के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी माँ की बातें सुन ली थीं। वह धीरे से अंदर आया और शालिनी के पास घुटनों के बल बैठ गया।

“शालिनी, उस दिन का गुनाह ऐसा है जिसकी कोई माफ़ी नहीं हो सकती,” आकाश ने भर्राए स्वर में कहा। “मैंने एक बेटे और देवर होने के अहंकार में एक पति होने का सबसे बुनियादी फ़र्ज़ भुला दिया था। मैंने बिना सच जाने तुम पर हाथ उठाया। आज इतने सालों बाद जब माँ ने खुद यह सच स्वीकारा है, तो मैं तुमसे सिर्फ़ एक मौका माँगता हूँ। इन बेजान चीज़ों की वजह से हमारे बीच जो दीवार खड़ी हुई है, उसे अपनी इस बड़ी सी माफ़ी से गिरा दो।”

शालिनी ने एक नज़र आकाश पर डाली और फिर अपनी सास पर। इतने बरसों से उसके सीने पर जो भारी पत्थर रखा हुआ था, वह पिघलने लगा। उसने महसूस किया कि बदले की भावना और कड़वाहट इंसान को अंदर से खोखला कर देती है। अगर गलती करने वाले को अपनी भूल का सच्चा पश्चाताप हो जाए, तो माफ़ कर देना ही अपने दिल को आज़ाद करने का सबसे बेहतरीन रास्ता है।

शालिनी ने धीरे से यशोदा जी के हाथों को अपने हाथों में दबाया और फिर आकाश को सहारा देकर खड़ा किया।

“माँ जी, जो बीत गया, वह एक बुरा सपना था,” शालिनी की आवाज़ में बरसों बाद वही पुरानी मिठास और आत्मीयता लौट आई थी। “अगर मैं आज भी उस बात को पकड़ कर बैठूँगी, तो मुझमें और उन संकीर्ण सोच वाले लोगों में क्या फर्क रह जाएगा? यह सामान अलका दीदी का है, इसलिए सुरक्षित उन तक पहुँच जाएगा। लेकिन इस घर में अब किसी चीज़ की कीमत इंसान से ज़्यादा नहीं होगी। आप इस घर की नींव हैं, और अब आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। आपका यह बेटा और यह बहू आपका ख्याल रखने के लिए काफी हैं।”

यशोदा जी ने रोते हुए शालिनी को अपने सीने से लगा लिया। वर्षों से जमी बर्फ़ पिघल कर बह निकली थी। आकाश ने दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया। घर का वह सन्नाटा अब अकेलापन नहीं, बल्कि एक नए, पवित्र और सुलझे हुए रिश्ते की शुरुआत की गवाही दे रहा था। काँच के बर्तन तो टूट कर बिखर सकते थे, लेकिन माफ़ी और समझदारी से जुड़ा यह पारिवारिक रिश्ता अब फौलाद की तरह अटूट हो चुका था।

हर परिवार में गलतफहमियां और चीज़ों को लेकर संकीर्णता जन्म ले सकती है, लेकिन जब गलती का सच्चा अहसास और माफ़ी का बड़प्पन मिल जाए, तो बड़े से बड़ा बिखराव भी एक खूबसूरत जुड़ाव में बदल जाता है। क्या आपके साथ या आपके आसपास भी कभी ऐसी स्थिति बनी है जहाँ छोटी-छोटी चीज़ों ने रिश्तों में दरार डाल दी हो? अपनी राय नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें।

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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश

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