विवान ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “हां, मैं मान गया कि हक मांगना कोई गलत बात नहीं है। आखिर कानून भी कहता है कि संपत्ति में बराबरी का अधिकार होना चाहिए। लेकिन सौम्या, एक बात बताओ, यह बराबरी का अधिकार सिर्फ बेटों तक ही सीमित क्यों रहे?”
सौम्या की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी। “तुम्हारा क्या मतलब है?”
रात के ग्यारह बज चुके थे। कमरे में पसरी खामोशी को सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और सीलिंग फैन की हल्की गड़गड़ाहट ही तोड़ रही थी। बिस्तर के एक कोने पर सात साल का अयान गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन कमरे के दूसरे हिस्से में तनाव का माहौल था। खिड़की के पास खड़ी सौम्या बार-बार अपनी उंगलियाँ चटका रही थी। उसकी आँखों में नींद नहीं, बल्कि भविष्य की गहरी चिंता और एक अजीब सी खीझ तैर रही थी। दूसरी तरफ, उसका पति विवान लैपटॉप की स्क्रीन पर आँखें गड़ाए बैठा था। वह पिछले चार घंटों से अलग-अलग जॉब पोर्टल्स पर अपनी सीवी अपडेट कर रहा था और नई नौकरियों के लिए आवेदन कर रहा था।
पिछले छह महीनों से विवान की नौकरी छूटी हुई थी। जिस आईटी कंपनी में वह पिछले आठ सालों से काम कर रहा था, उसने अचानक छंटनी का फैसला लिया और विवान भी उस छंटनी का शिकार हो गया। शुरुआत के एक-दो महीने तो सौम्या ने बहुत धैर्य दिखाया, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और बैंक का बैलेंस कम होता गया, उसकी चिंता हताशा में और हताशा गुस्से में बदलने लगी।
“क्या कोई जवाब आया वहां से?” सौम्या ने खिड़की से बाहर देखते हुए बिना मुड़े पूछा।
विवान ने एक लंबी गहरी सांस ली और लैपटॉप की स्क्रीन को आधा बंद करते हुए अपनी थकी हुई आँखों को मलता हुआ बोला, “नहीं सौम्या, अभी तक तो नहीं। मैंने आज भी तीन जगह इंटरव्यू दिया है। एचआर ने कहा है कि वो अगले हफ्ते तक बताएंगे। मार्केट अभी बहुत खराब चल रहा है, कोई भी कंपनी आसानी से हायरिंग नहीं कर रही है।”
सौम्या अचानक पलटी और तेज कदमों से चलकर बिस्तर के पास आ गई। उसकी आवाज में अब वह मिठास नहीं थी जो कभी हुआ करती थी। “मार्केट खराब है, मार्केट खराब है! पिछले तीन महीने से मैं यही रटा-रटाया जवाब सुन रही हूँ विवान। आखिर कब तक चलेगा ये सब? अयान की स्कूल की फीस का रिमाइंडर आ चुका है, घर के खर्चों की लिस्ट लंबी होती जा रही है और तुम बस इसी लैपटॉप में घुसे रहते हो।”
विवान ने शांति से उसे देखा। वह जानता था कि सौम्या की चिंता जायज है, लेकिन वह भी तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा था। “मैं हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठा हूँ ना सौम्या? तुम देख रही हो कि मैं रोज कितनी कोशिश कर रहा हूँ। कभी अपने पुराने दोस्तों को कॉल करता हूँ, कभी प्लेसमेंट एजेंसियों के चक्कर लगाता हूँ। मुझे भी अपने परिवार की फिक्र है।”
“फिक्र है? अगर वाकई फिक्र होती तो तुम कोई ठोस कदम उठाते,” सौम्या ने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा।
विवान को समझ नहीं आया कि सौम्या किस ठोस कदम की बात कर रही है। उसने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा। “ठोस कदम से तुम्हारा क्या मतलब है? क्या मैं जाकर कोई भी काम करना शुरू कर दूं?”
सौम्या ने एक पल के लिए अपनी नजरें चुराईं, जैसे वह कोई ऐसी बात कहने जा रही हो जिसे कहने में उसे भी थोड़ी हिचकिचाहट हो रही थी, लेकिन फिर उसने खुद को संभाला और तीखे स्वर में बोली, “मेरा मतलब तुम्हारे पिताजी से है। घर में इतनी बड़ी पुश्तैनी जमीन पड़ी है शहर के बीचों-बीच। अगर उसका एक हिस्सा भी बिक जाए या तुम अपना हिस्सा मांग लो, तो हम अपना कोई काम शुरू कर सकते हैं। आखिर कब तक हम इस घुटन में जिएंगे?”
विवान स्तब्ध रह गया। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ कि सौम्या ऐसी बात कर सकती है। उसके पिता, श्री रघुनाथ जी, एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्चों को एक अच्छा जीवन देने में लगा दी थी। जब से विवान की नौकरी गई थी, रघुनाथ जी ने घर के सारे आर्थिक खर्चे अपने कंधों पर ले लिए थे। राशन से लेकर बिजली के बिल तक, सब कुछ वही अपनी पेंशन से संभाल रहे थे ताकि विवान पर कोई दबाव न पड़े।
“सौम्या, तुम होश में तो हो? तुम क्या कह रही हो?” विवान ने अपनी आवाज को नीचा रखते हुए कहा ताकि अयान न जाग जाए, लेकिन उसकी आवाज में नाराजगी साफ झलक रही थी।
“मैं बिल्कुल होश में हूँ विवान, और बिल्कुल सही कह रही हूँ,” सौम्या अब अपनी बात पर अड़ गई थी। “आखिर आज नहीं तो कल वो जायदाद बंटनी ही है ना? तुम्हारे बड़े भाई साहब वैसे भी विदेश में सेटल हैं, उन्हें यहां की प्रॉपर्टी से क्या लेना-देना। ऐसे मुश्किल वक्त में अगर वो प्रॉपर्टी हमारे काम नहीं आएगी तो कब आएगी? तुम पापाजी से अपने हिस्से की बात क्यों नहीं करते?”
विवान ने लैपटॉप को पूरी तरह बंद कर दिया और खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी निराशा थी, अपनी पत्नी की सोच को लेकर। “मुझसे यह नीचता नहीं होगी सौम्या। पिताजी ने हमें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। आज जब मेरे पास नौकरी नहीं है, तो वो अपनी उम्र और अपनी बीमारियों को भूलकर हमारी जिम्मेदारियां उठा रहे हैं। उन्होंने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा कि मैं उन्हें पैसे क्यों नहीं दे रहा। उल्टे वो मुझे रोज ढांढस बंधाते हैं कि मैं चिंता न करूं। और तुम चाहती हो कि मैं उनके जीते जी उनसे जायदाद का बंटवारा मांगू?”
सौम्या झल्ला गई। “इसमें नीचता कैसी? यह तुम्हारा हक है! हम कोई भीख थोड़ी मांग रहे हैं। हर बेटे का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार होता है। तुम भी तो उनके बेटे हो। अगर तुम अपना हक मांग लोगे तो हम कोई छोटा-मोटा बिजनेस शुरू कर लेंगे। कम से कम दूसरों के टुकड़ों पर तो नहीं पलेंगे।”
“दूसरों के टुकड़े? वो मेरे पिता हैं सौम्या!” विवान की आवाज थोड़ी तेज हो गई, लेकिन उसने तुरंत खुद को काबू में किया। “और हम खुशनसीब हैं कि हमारे सिर पर उनका हाथ है। जरा सोचो उन लोगों के बारे में जिनकी नौकरी चली जाती है और उनके ऊपर किराए के मकान का बोझ होता है, ईएमआई का बोझ होता है। हमें कम से कम यह चिंता तो नहीं है कि कल सुबह के नाश्ते का इंतजाम कहां से होगा। पिताजी ने साफ कहा है कि जब तक मुझे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल जाती, मैं आराम से रहूं और सिर्फ अपने करियर पर फोकस करूं। उनका यह बड़प्पन है, और मैं उनके इस बड़प्पन का सिला उन्हें जायदाद के लिए परेशान करके नहीं दूंगा।”
सौम्या ने मुंह बनाते हुए कहा, “तुम हमेशा ऐसे ही भावुक होकर सोचते हो। दुनिया भावनाओं से नहीं चलती विवान। कल को अगर कुछ हो गया, तो क्या हम सड़क पर आ जाएंगे? मैं एक पढ़ी-लिखी महिला हूँ, मैं प्रेक्टिकल होकर सोच रही हूँ। तुम्हारे भाई ने तो अपना करियर बना लिया, लेकिन तुम्हारा क्या? तुम्हारे हिस्से का क्या? मैं बस इतना चाहती हूँ कि तुम अपने भविष्य को सुरक्षित करो। और अगर तुम नहीं बोल सकते, तो ठीक है, कल सुबह नाश्ते की मेज पर मैं ही पापाजी से बात करूंगी।”
विवान ने गहरी सांस ली। वह जानता था कि सौम्या गुस्से में है, लेकिन उसकी सोच पूरी तरह से स्वार्थ पर टिकी थी। वह कमरे में कुछ कदम चला और फिर वापस सौम्या के सामने आकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर अब एक अजीब सी शांति थी, वह शांति जो किसी तूफान के आने से पहले होती है।
“ठीक है सौम्या, अगर तुम्हें लगता है कि प्रैक्टिकल होना ही जिंदगी जीने का सही तरीका है, और हर इंसान को अपना हक मांगना चाहिए, तो मुझे तुम्हारी बात से कोई ऐतराज नहीं है,” विवान ने बहुत ही सहज और शांत स्वर में कहा।
सौम्या की आंखों में एक चमक आ गई। उसे लगा कि उसकी दलील काम कर गई है और विवान उसकी बात मान गया है। “सच? तुम मान गए?”
विवान ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “हां, मैं मान गया कि हक मांगना कोई गलत बात नहीं है। आखिर कानून भी कहता है कि संपत्ति में बराबरी का अधिकार होना चाहिए। लेकिन सौम्या, एक बात बताओ, यह बराबरी का अधिकार सिर्फ बेटों तक ही सीमित क्यों रहे?”
सौम्या की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी। “तुम्हारा क्या मतलब है?”
विवान ने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “मेरा मतलब बहुत सीधा है सौम्या। अगर तुम भविष्य को लेकर इतनी ही चिंतित हो और तुम्हें लगता है कि पुश्तैनी संपत्ति ही हमारी सुरक्षा का एकमात्र उपाय है, तो क्यों न शुरुआत तुम्हारे घर से की जाए? तुम्हारे पिताजी के पास भी तो शहर के सबसे पॉश इलाके में एक बड़ी सी कोठी है, और उनके नाम पर दो दुकानें भी हैं। कानून के हिसाब से तुम्हारा और तुम्हारे भाई समीर का उस पर बराबर का हक है। तो क्यों न कल तुम अपने पिताजी को फोन करो और उनसे अपने हिस्से की मांग करो?”
कमरे में अचानक एक सन्नाटा छा गया। सौम्या के चेहरे का रंग उड़ गया था। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
विवान ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा, “क्या हुआ? तुम तो अभी कह रही थीं कि तुम पढ़ी-लिखी हो और प्रैक्टिकल सोचती हो। तो फिर अपने घर के मामले में यह प्रैक्टिकल सोच कहां चली गई? वहां तुम्हें लगता है कि सब कुछ तुम्हारे भाई का है, और यहां तुम्हें लगता है कि सब कुछ मेरा है? अगर मेरे पिता की संपत्ति पर मेरा हक है और मुझे वह मांगना चाहिए, तो तुम्हारे पिता की संपत्ति पर तुम्हारा हक है, तुम्हें भी वह मांगना चाहिए। जाओ, करो फोन अपने पिताजी को और कहो कि तुम्हारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए वे आधी कोठी तुम्हारे नाम कर दें।”
सौम्या के होंठ कांपने लगे। उसने हकलाते हुए कहा, “त..तुम यह कैसी बातें कर रहे हो विवान? मेरे पिताजी ने मेरी शादी में इतना खर्च किया था। और फिर समीर मेरा इकलौता भाई है, मैं अपने ही मायके में हिस्सा कैसे मांग सकती हूँ? समाज क्या कहेगा? मेरे माता-पिता मुझे क्या समझेंगे?”
विवान ने एक हल्की, लेकिन तीखी मुस्कान के साथ कहा, “वाह सौम्या! अपने मायके में हिस्सा मांगना तुम्हें समाज का डर और माता-पिता का अपमान लगता है, लेकिन ससुराल में एक बेरोजगार बेटे का अपने बुजुर्ग बाप से बंटवारा मांगना तुम्हें ‘प्रैक्टिकल सोच’ और ‘हक’ लगता है? तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लिए आदरणीय हैं, लेकिन मेरे पिता सिर्फ एक एटीएम मशीन हैं जिनसे जब चाहो पैसे या जमीन निकलवा लो?”
सौम्या के पास विवान के इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। उसका अपना बुना हुआ जाल उसी पर भारी पड़ गया था।
“सौम्या, बराबरी सिर्फ तब अच्छी नहीं लगनी चाहिए जब वह हमारे फायदे की हो,” विवान ने गंभीर स्वर में कहा। “जब तक मेरे पास नौकरी थी, मैं तुम्हारी हर जरूरत, हर ख्वाहिश पूरी करता था। आज मेरे बुरे वक्त में, जब मुझे तुम्हारे और परिवार के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत है, तुम मुझे मेरे ही पिता के खिलाफ खड़ा करना चाहती हो। मेरे पिता ने मुझे पाला है, मुझे काबिल बनाया है। अगर आज मैं गिर गया हूँ, तो मैं खुद अपने पैरों पर खड़ा होऊंगा। अगर कुछ भी नहीं हो पाया, तो मैं गांव जाकर अपनी पुश्तैनी खेती कर लूंगा, पसीना बहा लूंगा, लेकिन इस उम्र में अपने पिता के सीने पर मूंग नहीं दलूंगा। रही बात हिस्से की, तो मेरे संस्कार मुझे इसकी इजाजत नहीं देते।”
विवान मुड़ा और वापस अपने लैपटॉप के पास जाकर बैठ गया। उसने स्क्रीन खोली और फिर से अपना काम करने लगा। सौम्या वहीं की वहीं बुत बनकर खड़ी रह गई। विवान के कहे एक-एक शब्द उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसे अपने अंदर झांकने पर मजबूर होना पड़ रहा था, जहां उसे अपनी ही सोच की कड़वी सच्चाई नजर आ रही थी।
उसे एहसास हो गया था कि अधिकार की मांग करना जितना आसान दूसरों के लिए लगता है, जब बात खुद पर आती है तो वही अधिकार एक पाप लगने लगता है। कमरे में फिर से वही खामोशी छा गई थी, लेकिन इस बार यह खामोशी सौम्या के अंदर उठ रहे सवालों के तूफान की गवाह थी।
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