मायका टूरिस्ट  प्लेस  से  भी आगे – उमा वर्मा

मायका टूरिस्ट  प्लेस  से  भी आगे बहुत कुछ है ।यादों के खजाने में असीमित भंडार  भरे पड़े हैं ।किसे याद करें किसे छोड़ दे।नहीं छोड़ देने  जैसा कुछ भी नहीं है ।किसे मायका कहें? वह छःदशक पहले वाली? वह गांव देहात में खूब बडा सा हवेली नुमा  घर ।जहां पूरा कुनबा समाया रहता था ।दादा … Read more

ईश्वर का कैमरा – भगवती सक्सेना गौड़

बैंक मैनेजर रमेश अपनी कुर्सी पर बैठकर जल्दी जल्दी सारी ईमेल फाइल्स चेक कर रहे थे, तभी कोई बुजुर्ग दरवाजा खोलते हुए अचानक आफिस में घुसे। उन्होंने जोर से चपरासी राजू को इण्टरकॉम पर कहा, “कहाँ हो, ध्यान नही रखते हो, कैसे बिना बताए कोई आ जाता है।” दौड़ते हुए राजू ने आकर कहा, “सर्, … Read more

नोक झोंक – रीटा मक्कड़

“सुनो आज लगता है पुदीने की चटनी में तुम हरी मिर्ची डालना भूल गयी हो..” “क्या कह रहे हो कभी मिर्ची के बिना भी चटनी बनती है” “सच कह रहा हूँ खुद ही खा कर देख लो..आज तो दाल भी बीमारों जैसी लग रही है बिल्कुल फीकी सी..!!” “अब इस उम्र में कितनी मिर्ची खाओगे..रोज़ … Read more

मायका:बेटियों का आसरा – ऋतु अग्रवाल

अरुणिमा एक उच्च वर्गीय संपन्न परिवार की लड़की थी।ताऊ-चाचाओं का बहुत बड़ा संयुक्त परिवार, हाई क्लास बिजनेस और नौकर चाकरों का रेला तो परिवार में बहू बेटियों को ज्यादा काम करने की आदत नहीं थी। अरुणिमा देखने में औसत ही थी और पढ़ाई में भी औसत। पर परिवार वाले चाहते थे कि दामाद खूबसूरत होने … Read more

मायका : बेटियों का टूरिस्ट प्लेस   अरुण कुमार अविनाश

नैना देवी बहुत बीमार थी।  डॉक्टर ने अत्यधिक देखभाल की ज़रूरत बतायी थी। इलाज लंबा चलने वाला था – जिसमें उचित दवाइयों के साथ-साथ समुचित परहेज़ भी तजवीज़ की गई थी। स्थिति ये थी कि या तो महीनों अस्पताल में भर्ती रहतीं या घर में अस्पताल जैसा माहौल बना दिया जाता। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं … Read more

स्वर से स्वर मिले – सरला मेहता

” अरे, ये कौन है ? ये तो स्वरा लग रही है। सफेद साड़ी व लम्बी दो चोटियों में कॉलेज आती थी। यथा नाम तथा मधुर आवाज़। सबने उसका नाम लता ही रख दिया था। और आज ये लकदक बनारसी साड़ी व गहनों में पूरी सेठानी लग रही है। ” कोई पहचान वाला देखता तो … Read more

खोया पीहर लौट आया – रीता मिश्रा तिवारी

टूल पर रखी चाय  ठंडी हो गई और मान्या वालकोनी में चुपचाप उदास बैठी थी। सामने ही रास्ते के उस पार के एक घर के आंगन में आम से लदा पेड़ था। पेड़ के नीचे चार पांच बच्चे धमा चौकड़ी मचा रहे थे। कोई उचक कर तो कोई गुलेल से कोई डंडा मारकर आम तोड़ने … Read more

बहु या बेटी –  किरण केशरे 

एक प्याली चाय’ मन को  कितनी संतुष्टि प्रदान करती है ! जब हम थककर चूर हो ,सर्दियों भरे दिन हो ,बारिश का हरियाली मौसम हो और साथ मे कोई मनपसंद स्नैक्स । “बस ऐसा लगता है  ,जैसे इससे बड़ा सुख कोई नही” । लेकिन मानू को ये सब कहाँ नसीब ,सुबह से शाम कब हो … Read more

आकाशवाणी  –  बालेश्वर गुप्ता

कहाँ हो तुम – – तुम्हें कुछ पता भी है – पता नही तुम कहां रहती हो – तुरंत आओ –       पिताजी जोर से चीख कर माँ को बुला रहे थे.     क्या आफत आ गयी जो इतना जोर से बोल रहे हो, यही तो हूँ, बताओ क्या आसमान टूट पड़ा है?      तुम्हारा चहेता बेटा, शादी … Read more

“निर्जला एकादशी” – ऋतु अग्रवाल

 “अरे! ओ बहुरिया, कल निर्जला एकादशी है। कल सब का निर्जला व्रत होगा। सुन रही हो ना सब की सब?” अम्मा ने अहाते में खड़े होकर आवाज लगाई।     “हाँ,हाँ, अम्मा जी! हमें याद है। हम सब कल निर्जला व्रत रखेंगी।” मंझली बहू ने अम्मा जी को दवाई देते हुए कहा।    अम्मा जी का भरा पूरा … Read more

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