आग पर तेल छिड़कना – विनीता सिंह

सरला जी ने अपने बेटे की  शादी की थी ,उनकी बहू सुरभि जो की एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की है। लेकिन दोनों की सोच में जमीन आसमान का अंतर था ।सरला जी जहां परंपरा को मानने वाली और उनका विचार था की बहू को घूंघट में रहना चाहिए, और वहीं दूसरी तरफ सुरभि  खुले विचारों … Read more

जेवर – प्रियंका पांडेय त्रिपाठी

प्रिया की शादी का दूसरा दिन था। सुबह का समय जेठानी जी फर्श पर बैठी हुई थी ननद रसोई में नाश्ता बना रही थी अचानक ननद प्रिया के पास आई ,उसे आंगन में ले गई और ऊंचे स्वर में प्रिया से कहने लगी कि….      “भाभी ने हमारे लिए बहुत किया है वो मां के समान … Read more

वो भी तो मेरा अंश था… – चंचल नरूला

काश कोई बड़ा भाई या बहन होती जो संभाल लेती मेरी लाडो को हम बुड्ढा बुढ़िया के बाद | जाने किस उधेड़ बुन मे फंसी थी चेतना जब डॉ. ने कहा माँ जी आपको अपने लिए नहीं अपनी इकलोती  बेटी के लिए जीना है | ” कितनी खुश थी न चेतना उन 2 लकीरों को … Read more

चकल्लस – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“अरे नामाकूलो, मेरा चश्मा कहाँ मर गया” मां जी पूरी ताकत से चिल्लाईं। “फिर ये शैतान की औलाद मेरा चश्मा उठाकर ले गए। मेरा तो इस घर में जीना मुहाल हो गया है। पता नहीं क्या खाकर पैदा किया है इन चुड़ैलों ने औलादों को। सारे दिन मेरे ही सामानों के पीछे पड़े रहते हैं। … Read more

“ये जीवन है…।” – रवीन्द्र कान्त त्यागी

आह… कितनी देर सोया। पता ही नहीं चला। सुबह होने वाली है शायद। मगर… मगर अभी तो अंधेरा सा है। ओह, कई दिन की थकान से पूरा शरीर दुख रहा है। तेरह दिन तक जमीन पर बैठे बैठे। और उसके बाद… उसके बाद मौत का उत्सव। मेरी बीवी की मौत का जश्न। ओह… मेरी परम्पराओं … Read more

रिटायरमेंट – प्रतिमा पाठक

रेलवे स्टेशन की पुरानी घड़ी ने जैसे ही शाम के पाँच बजाए, राघव बाबू की ड्यूटी खत्म हो गई। आज का दिन उनके जीवन का सबसे अलग दिन था, क्योंकि यह उनकी नौकरी का आख़िरी दिन था। चालीस वर्षों की अनवरत सेवा के बाद वे आज रिटायर हो रहे थे। स्टेशन मास्टर की वर्दी उतारते … Read more

ज़हर बुझे – रवीन्द्र कांत त्यागी

नहीं, ये कहानी नहीं है. कहानी तो बिलकुल नहीं है. साहित्य वाहित्य का भी इस से कुछ लेना देना नहीं. इंसान के भीतर, जन्म से लेकर उम्र भर तक जो ग्रंथियां बनती बिगड़ती रहती हैं, जिनमे से कई अनसुलझी गुंन्थियाँ बन जाती हैं और उन पर जीवन भर एक बड़ा वाला अलीगढ़ का ताला पड़ा … Read more

अपने अपने पैमाने – रवीन्द्र कान्त त्यागी

बात कुछ बारह या तेरह वर्ष पुरानी है। मेरे एक रिश्तेदार ने अपनी मेधावी बेटी का रिश्ता दिल्ली में रहने वाले एक अच्छी जॉब और सम्पन्न घराने के लड़के से तय किया था। लड़का और लड़की दोनों एक दूसरे के बिलकुल अनुकूल थे और परिवार के लोग भी इस रिश्ते से बहुत खुश दिखाई दे … Read more

संयम जरूरी है

सुबह के सात बजे होगें, शनिवार की सुबह, नीरजा चाय बनाने के लिए रसोई में गई ही थी कि मोबाईल बज उठा, देखा तो मिनी का फोन था, मिनी यानि की नीरजा और लोकेश की लाडली बेटी। इतनी सुबह फोन और वो भी शनिवार को, मिनी तो छुट्टी वाले दिन दस बजे से पहले बिस्तर … Read more

रिटायरमेंट – सीमा सिंघी

जब से आरती जी का रिटायरमेंट हुआ है। तब से घर वालों की नजरे उन्हें कुछ अलग अलग सी लग रही थी, फिर भी उन्होंने ज्यादा गौर नहीं किया और वे मन ही मन सोचने लगी।  शायद यह मेरा भरम हो सकता है और बागवानी करने में व्यस्त हो गई। ऐसे भी हमेशा से उन्हें … Read more

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