वेलेंटाईन डे – विमला गुगलानी

   ज्यों ज्यों चौदह फरवरी का दिन पास आ रहा था महक मन ही मन और भी महकती जा रही थी। सादा लिबास पहनने वाली को अब कुछ सजना संवरना भी आ गया था। कालिज की पढ़ाई का आखरी साल था।पांच साल पहले गांव से पढ़ने के लिए शहर आना जैसे सपने जैसा था।          अच्छे खाते … Read more

मैं बोझ बनकर नहीं जीना चाहता। – सीमा ऋषभ

रात के सन्नाटे में सूटकेस की चेन बंद करने की आवाज़ किसी धमाके जैसी गूंजी। 72 वर्षीय रमाकांत बाबू ने एक नज़र उस कमरे पर डाली जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पिछले चालीस साल गुज़ारे थे। दीवारों पर लगीं पुरानी तस्वीरें, अलमारी में सजी उनकी किताबें और कोने में रखी उनकी पत्नी की तस्वीर, जिन … Read more

आख़िर उसके सब्र का बांध टूट ही गया – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

सुबह के छह बजते ही ‘शांति-निवास’ में घंटी की नहीं, बल्कि सावित्री देवी के नाम की गूंज शुरू हो जाती थी। सत्तर वर्षीय दीनदयाल जी की चाय से लेकर, पोते चिंटू के स्कूल के मोज़े तक, सब कुछ सावित्री के हाथों से होकर ही गुजरता था। वह इस घर की वो नींव थीं जो ज़मीन … Read more

सोने का दिल – सावित्री गोंड

शादी की शहनाइयों का शोर अभी थमा भी नहीं था कि सुमेधा के कानों में एक अलग ही सुर घोला जाने लगा था। वह सुर था उसकी ममीरी सास, यानी उसके पति आलोक की बुआ, सरला जी का। सुमेधा जब ब्याह कर ‘शांति-निवास’ में आई, तो उसे लगा था कि संयुक्त परिवार में रहना थोड़ा … Read more

कांच के महल – मंजू घोष

मुंबई के सबसे पॉश इलाके ‘स्काईलाइन टावर्स’ की 45वीं मंजिल पर बने पेंटहाउस की बालकनी में खड़ा होकर शेखर शहर की टिमटिमाती बत्तियों को देख रहा था। उसके हाथ में स्कॉच का गिलास था और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान। आज उसकी कंपनी ‘शेखर इंफ्राटेक’ ने शहर का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट हासिल किया था। वह … Read more

काजल की कोठरी – मुकेश पटेल

“अरे ओ कुल-नाशक! डूब मर किसी चुल्लू भर पानी में। पूरे खानदान की नाक कटाकर रख दी है तूने। मेरे तो भाग फूट गए जो तुझ जैसी औलाद को जन्म दिया। लोग सही कहते थे, सांप को कितना भी दूध पिला लो, वो डसता ही है।” सावित्री देवी का गला चिल्लाते-चिल्लाते बैठ गया था, लेकिन … Read more

मखमली पिंजरा – रश्मि प्रकाश 

“प्रीति, बेटा… अरे वाह! आज तो तुम बहुत सुंदर लग रही हो। कहाँ की तैयारी है?” वंदना जी ने अपनी बहू के कमरे में प्रवेश करते हुए बड़े उत्साह से पूछा। उनके हाथ में गरमा-गरम अदरक वाली चाय का प्याला था। प्रीति ने कानों में झुमके पहनते हुए आईने में देखा और फीकी मुस्कान के … Read more

गिरवी रखे कंगन – नम्रता सिंह 

जेठ की तपती दुपहरी थी। सूरज आग उगल रहा था और गांव की पगडंडियों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। अमराइयों में छिपी कोयल भी गर्मी के मारे चुप थी। इसी सन्नाटे को चीरती हुई एक सफेद रंग की बड़ी गाड़ी धूल उड़ाती हुई ‘चौधरी विला’ के पुराने लेकिन भव्य लोहे के गेट पर आकर रुकी। … Read more

देहरी के पार – डॉ उर्मिला शर्मा 

घर के आंगन में गेंदे के फूलों की सजावट और रसोई से आती देसी घी की महक बता रही थी कि आज तिवारी जी के घर में कोई खास उत्सव है। और हो भी क्यों न? उनकी लाड़ली बेटी, वंदना, पूरे दो साल बाद अपने मायके जो आई थी। घर का कोना-कोना खिल उठा था। … Read more

कंगन की गूंज – निभा राजीव “निर्वि”

“एक मां ने अपनी बेटी के लिए वो दुनिया चुनी जो समाज की नजर में ‘उतरन’ थी, लेकिन उस दुनिया में बेटी को वो मिला जो मां ने पूरी जिंदगी खोया था।” शादी की शहनाई की आवाज़ के बीच, हर तरफ जश्न का माहौल था। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजी-धजी औरतें, मेहमानों की हंसी-ठिठोली और पकवानों … Read more

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