“मुझे आपकी दौलत या आपके रुतबे से कोई मतलब नहीं है ठाकुर साहब,” समर की आवाज में एक अजीब सी दृढ़ता और दर्द था। “मैं बस इतना बताने के लिए फोन कर रहा हूँ कि जिस बेटी को आपने अपनी झूठी शान के लिए मृत मान लिया था, वो आज सच में मौत के दरवाजे पर खड़ी है। पुष्पा आईसीयू में है। वो बेहोशी में भी आपका और अपनी माँ का हाथ ढूँढ रही है। अगर उसे कुछ हो गया, तो शायद मैं तो पूरी जिंदगी रोऊँगा, लेकिन आपका ये गुरूर आपको एक घूंट पानी भी चैन से नहीं पीने देगा। फैसला आपका है।” समर ने फोन काट दिया।
बारिश की बूंदें पुणे के उस छोटे मगर खूबसूरत फ्लैट की खिड़की से टकरा रही थीं। बालकनी में खड़ी पुष्पा की नज़रें दूर आसमान में किसी अनजान बिंदु पर टिकी थीं। वह आठ महीने की गर्भवती थी। उसके चेहरे पर मातृत्व की वो चमक तो थी, लेकिन आँखों की गहराइयों में एक ऐसा सूनापन था जिसे उसका पति समर अक्सर पढ़ लिया करता था। पुष्पा और समर की शादी को चार साल बीत चुके थे। यह एक ऐसी प्रेम कहानी थी जिसने समाज की नजरों में एक बहुत बड़ा ‘अपराध’ किया था – जाति और रुतबे की दीवार को लांघने का अपराध।
पुष्पा बनारस के एक बहुत ही रसूखदार और प्रतिष्ठित परिवार की इकलौती बेटी थी। उसके पिता, ठाकुर सूर्यप्रताप सिंह, शहर के उन चंद लोगों में से थे जिनकी बात को कानून माना जाता था। उनकी हवेली के नियम-कायदे और उनकी इज्जत उनके लिए उनके प्राणों से भी प्यारे थे। पुष्पा ने जब अपनी उच्च शिक्षा के दौरान समर से प्यार किया, तो उसने कभी नहीं सोचा था कि यह बात उसके घर में एक भूचाल ला देगी। समर एक बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखता था, एक मध्यमवर्गीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जिसकी ना तो सूर्यप्रताप सिंह के बराबर कोई हैसियत थी और ना ही उनकी जाति का तमगा।
जब यह बात हवेली की चारदीवारी तक पहुँची, तो सूर्यप्रताप सिंह का गुरूर जैसे फनकार उठा। उन्होंने पुष्पा पर पाबंदियां लगा दीं, लेकिन जब पुष्पा ने स्पष्ट कर दिया कि वह समर के बिना नहीं जी सकती, तो सूर्यप्रताप ने एक कठोर फैसला सुनाया। उन्होंने पुष्पा को घर से तो जाने दिया, लेकिन हवेली की चौखट पर खड़े होकर जो शब्द उन्होंने कहे थे, वे आज भी पुष्पा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंजते थे। उन्होंने कहा था, “आज से तुम मेरे लिए मर चुकी हो। इस चौखट को पार कर रही हो तो याद रखना, पलटकर कभी मत आना। मेरे घर के दरवाजे अब तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। मेरे जीते जी मेरा मरा हुआ मुँह भी तुम्हें देखना नसीब नहीं होगा।”
एक बेटी के लिए इससे बड़ा श्राप और क्या हो सकता था? पुष्पा भारी कदमों और उससे भी भारी दिल के साथ उस दिन हवेली से विदा हो गई थी। समर ने उसे पलकों पर बिठाकर रखा। समर का परिवार नहीं था, वह एक अनाथालय में पला-बढ़ा था, इसलिए उसने पुष्पा को ही अपनी दुनिया मान लिया था। उसने पुष्पा की हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखा, उसे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। पुष्पा समर के साथ बहुत खुश थी, लेकिन किसी भी लड़की के लिए उसका मायका, उसकी माँ की गोद और उसके पिता का साया उसकी आत्मा का एक अहम हिस्सा होते हैं। जैसे-जैसे पुष्पा की डिलीवरी का समय पास आ रहा था, उसे अपनी माँ देवकी की याद बहुत सताने लगी थी। वह रात-रात भर जागकर अपनी माँ की तस्वीर सीने से लगाए रोती रहती। समर ने कई बार कोशिश की कि वह सूर्यप्रताप सिंह से बात करे, लेकिन पुष्पा का आत्मसम्मान और पिता के उन कठोर शब्दों की गूंज उसे ऐसा करने से रोक देती थी।
वक्त अपनी रफ्तार से बीत रहा था। अचानक एक रात पुष्पा की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उसे तेज दर्द उठा और उसका रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) खतरनाक स्तर तक बढ़ गया। यह प्री-एक्लेमप्सिया का मामला था। समर घबरा गया। वह बिना एक पल भी गँवाए पुष्पा को लेकर शहर के सबसे बड़े अस्पताल की ओर भागा। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते पुष्पा बेहोश हो चुकी थी।
डॉक्टरों ने उसे तुरंत आईसीयू में शिफ्ट किया। कुछ ही देर बाद सीनियर डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं। उन्होंने समर से कहा, “देखिए, मरीज की हालत बहुत नाजुक है। उनका ब्लड प्रेशर कंट्रोल नहीं हो रहा है और अंदरूनी ब्लीडिंग का खतरा बना हुआ है। हमें तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा, लेकिन हम न तो माँ की और न ही बच्चे की कोई गारंटी ले सकते हैं। उन्हें बहुत गहरा मानसिक तनाव भी है, वह बेहोशी में भी बार-बार अपनी माँ और पिता को पुकार रही हैं। आप प्लीज पेपर्स पर साइन कर दीजिए।”
समर के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जिस पुष्पा ने उसके लिए अपनी पूरी दुनिया छोड़ दी थी, आज वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी। वह आईसीयू के शीशे से पुष्पा के पीले पड़ चुके चेहरे को देख रहा था। उसे समझ आ गया कि दवाइयों से ज्यादा पुष्पा को इस वक्त अपनों के स्पर्श की जरूरत है। समर ने तय कर लिया कि आज वह किसी भी आत्मसम्मान या गुरूर को पुष्पा की सांसों के बीच नहीं आने देगा।
उसने पुष्पा के फोन से उसके भाई कुणाल का नंबर निकाला, जो पुष्पा से छुपकर कभी-कभार अपनी बहन की खैरियत ले लिया करता था। समर ने कुणाल को फोन किया और पूरी स्थिति बता दी। कुणाल यह सुनते ही रो पड़ा। उसने समर से कहा कि वह पिताजी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता, लेकिन वह माँ को लेकर किसी तरह निकलने की कोशिश करेगा।
लेकिन समर को पता था कि पुष्पा की आत्मा की शांति उसके पिता की माफी में ही है। उसने एक बड़ा फैसला लिया। उसने सूर्यप्रताप सिंह का नंबर डायल किया। दो-तीन बार घंटी बजने के बाद उधर से एक भारी और रुतबेदार आवाज आई, “हेलो।”
समर ने एक गहरी सांस ली और कहा, “मैं समर बोल रहा हूँ।”
फोन के दूसरी तरफ एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, जैसे किसी ने वक्त को रोक दिया हो। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे फोन करने की?” सूर्यप्रताप की आवाज में क्रोध था।
“मुझे आपकी दौलत या आपके रुतबे से कोई मतलब नहीं है ठाकुर साहब,” समर की आवाज में एक अजीब सी दृढ़ता और दर्द था। “मैं बस इतना बताने के लिए फोन कर रहा हूँ कि जिस बेटी को आपने अपनी झूठी शान के लिए मृत मान लिया था, वो आज सच में मौत के दरवाजे पर खड़ी है। पुष्पा आईसीयू में है। वो बेहोशी में भी आपका और अपनी माँ का हाथ ढूँढ रही है। अगर उसे कुछ हो गया, तो शायद मैं तो पूरी जिंदगी रोऊँगा, लेकिन आपका ये गुरूर आपको एक घूंट पानी भी चैन से नहीं पीने देगा। फैसला आपका है।” समर ने फोन काट दिया।
बनारस की उस विशाल हवेली में समर के कहे शब्द बम के गोलों की तरह गिरे थे। सूर्यप्रताप सिंह के हाथ से फोन छूटकर जमीन पर गिर गया। तभी पीछे से देवकी आ गईं। उन्होंने सब सुन लिया था। आज एक माँ का सब्र टूट गया था। जो देवकी पिछले चार सालों से अपने पति के डर से एक शब्द नहीं बोली थी, आज वह दुर्गा का रूप ले चुकी थी।
“क्या हुआ मेरी बच्ची को?” देवकी की चीख हवेली की दीवारों से टकराई। सूर्यप्रताप चुप रहे।
“मैं आज तक आपकी हर बात मानती आई। आपकी झूठी शान के लिए मैंने अपनी कलेजे के टुकड़े को अपने से दूर कर दिया। लेकिन आज नहीं! अगर आज मेरी बेटी को खरोंच भी आई, तो मैं इसी हवेली के आंगन में अपनी जान दे दूँगी और इसका पाप आपके सिर पर होगा। आप चलें या ना चलें, मैं अभी पुणे जा रही हूँ।” देवकी के ये शब्द सूर्यप्रताप सिंह के सीने को चीर गए। उनके अंदर का वो पिता, जो सालों से अहंकार के बोझ तले दबा हुआ था, अचानक तड़प उठा। उन्होंने तुरंत कुणाल को आवाज दी और पहली फ्लाइट से पुणे निकलने का इंतजाम करने को कहा।
करीब छह घंटे बाद सूर्यप्रताप, देवकी और कुणाल पुणे के उस अस्पताल के आईसीयू वॉर्ड के बाहर खड़े थे। सूर्यप्रताप ने देखा कि सामने एक लड़का जिसके बाल बिखरे हुए हैं, जिसकी आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी हैं और जिसके कपड़ों पर खून के निशान हैं, वह कभी ब्लड बैंक की तरफ भाग रहा है तो कभी डॉक्टरों के सामने हाथ जोड़कर खड़ा है। वह समर था।
जब समर ने उन लोगों को देखा, तो वह चुपचाप उनके पास आया। उसने सूर्यप्रताप की आँखों में देखा। उन आँखों में अब क्रोध नहीं था, बल्कि एक लाचारी थी।
“डॉक्टर कह रहे हैं कि ऑपरेशन सफल रहा… पुष्पा ने एक बेटी को जन्म दिया है, लेकिन पुष्पा को अभी होश नहीं आया है। वो अब भी खतरे में है।” इतना कहते ही समर फफक-फफक कर रो पड़ा। सूर्यप्रताप का दिल उस लड़के को देखकर पसीज गया जिसे उन्होंने हमेशा हिकारत की नजर से देखा था। आज वही लड़का उनकी बेटी की जान बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगाए हुए था।
डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने कहा, “मरीज को होश आ रहा है, लेकिन उनका बीपी अभी भी अस्थिर है। आप लोग एक-एक करके मिल सकते हैं, लेकिन उन्हें कोई सदमा मत दीजिएगा।”
सबसे पहले सूर्यप्रताप सिंह आईसीयू के अंदर गए। पुष्पा मशीनों और तारों के बीच घिरी लेटी थी। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था। जैसे ही उसने आँखें खोलीं और अपने पिता को सामने देखा, उसकी आँखों में एक डर सा तैर गया। उसे वही हवेली की चौखट और पिता के कठोर शब्द याद आ गए। उसने अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे।
यह देखकर सूर्यप्रताप सिंह का कलेजा फट गया। उनका सारा रुतबा, सारा गुरूर आंसुओं में बहकर पुष्पा के बिस्तर के पास गिर गया। वह पुष्पा के बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गए और उसके कांपते हुए ठंडे हाथ को अपने माथे से लगा लिया।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची,” सूर्यप्रताप सिंह फूट-फूट कर रो रहे थे। “तेरा बाप एक मूर्ख इंसान था जो समाज के झूठे दिखावे और जाति-पाति के जहर में अपनी असली दौलत को दांव पर लगा बैठा था। मुझे तो वो लड़का भी माफ नहीं करेगा जिसने आज मुझे एक असली पति और इंसान होने का मतलब सिखाया है। लौट आ बेटा, अपनी उस मनहूस चौखट को मैंने आज हमेशा के लिए तोड़ दिया है।”
पुष्पा ने धीरे से अपना हाथ पिता के गालों पर रखा। उसके चेहरे पर एक शांति और सुकून भरी मुस्कान आ गई, जैसे उसके सीने से कोई सदियों पुराना बोझ हट गया हो। थोड़ी देर में देवकी और कुणाल भी आ गए। देवकी ने बेटी को गले लगा लिया।
बाहर कांच से यह सब देखकर समर की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। आज जीत सिर्फ प्यार की नहीं हुई थी, बल्कि उस क्षमा और पश्चाताप की हुई थी जिसने एक टूटते हुए परिवार को हमेशा के लिए जोड़ दिया था। कुछ ही दिनों में पुष्पा पूरी तरह स्वस्थ हो गई। अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद, समर और पुष्पा अपने फ्लैट में नहीं, बल्कि सूर्यप्रताप सिंह के साथ बनारस की उस हवेली की ओर जा रहे थे, जिसकी चौखट आज अपनी बेटी और दामाद के स्वागत के लिए फूलों से सजी थी।
पाठकों से एक सवाल:
दोस्तों, क्या आपको लगता है कि समाज की झूठी शान और जाति-पाति का दिखावा आज भी हमारे समाज में खून के रिश्तों पर भारी पड़ता है? अगर समर उस दिन अपना आत्मसम्मान किनारे रखकर पुष्पा के पिता को फोन न करता, तो क्या सूर्यप्रताप सिंह को कभी अपनी गलती का अहसास हो पाता? इस विषय पर आपके क्या विचार हैं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।
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#अधूरी चौखट
लेखिका : निधि गुप्ता