अनुज ने अपने जेब से वे चार सौ रुपये निकाले जो उसने सुबह अलका से मांगे थे, और उसमें अपनी तरफ से पांच हजार रुपये मिलाकर अम्मा के हाथों में रखते हुए कहा, “अम्मा, ये पैसे आपकी पेंशन के नहीं, आपके स्वाभिमान के हैं। और आज से इस घर का नियम बदलेगा। हर महीने हमारी तनख्वाह आते ही सबसे पहले आपके और बाबूजी के नाम की राशि अलग रखी जाएगी, जिसका हिसाब मांगने का हक इस घर में किसी को नहीं होगा।”
सावन की तीज को बस चार दिन ही बचे थे। बाजारों में घेवर की मिठास और हरी चूड़ियों की खनक अभी से महसूस होने लगी थी। घर के कोने वाले कमरे से आती दवाइयों की तीखी गंध के बीच, अड़सठ वर्षीय शारदा देवी ने अपने संदूक की तह से अपनी इकलौती हरी सूती साड़ी निकाली।
धूप में लाकर देखा तो मन कसैला हो गया। साड़ी के किनारे जगह-जगह से छितर गए थे और बीच में से कपड़ा इतना झीना हो चुका था कि उंगलियां आर-पार दिखती थीं। पिछले पांच सालों से वह हर तीज पर इसी साड़ी को रफू करके पहनती आ रही थीं। उनके पति, केशव प्रसाद जी, पिछले चार महीनों से लकवे के दौरे के कारण बिस्तर पर थे। बोलने की शक्ति क्षीण हो चुकी थी, बस आंखें थीं जो हर वक्त अपनी जीवनसंगिनी शारदा को ही निहारती रहती थीं।
शारदा देवी ने एक गहरी सांस ली और साड़ी को सीने से लगाए रसोई की तरफ बढ़ीं। रसोई में बड़ी बहू अलका और छोटी बहू मानसी नाश्ते की तैयारी में जुटी थीं। कड़ाही में छन-छन करती पूरियों की आवाज के बीच शारदा देवी दरवाजे की चौखट पर ठिठक गईं। अपनी ही संतान के घर में कुछ मांगने में जो संकोच होता है, वह उनकी झुकी हुई कमर और कांपते होंठों पर साफ दिख रहा था।
“अलका बहू… सुन तो बेटा,” शारदा जी की आवाज में एक अजीब सी झिझक थी।
अलका ने बिना पलटे ही कलछी चलाते हुए कहा, “हां अम्मा जी, बोलिए ना, हाथ रुका नहीं है मेरा।”
शारदा देवी ने अपनी पुरानी साड़ी को थोड़ा आगे करते हुए धीमे स्वर में कहा, “बेटा, इस बार तीज पर बाजार जाओ तो मेरे लिए भी एक सादे से हरे रंग की साड़ी लेती आना। देखो ना, ये वाली तो अब पहनने लायक ही नहीं बची है। हर तीज पर हरा रंग पहनकर ही तुम्हारे बाबूजी की लंबी उम्र की पूजा करती हूं… इस बार इसे पहनूंगी तो अपशकुन सा लगेगा।”
इतना सुनते ही रसोई में जैसे सन्नाटा पसर गया। अलका ने गैस की आंच धीमी की और मानसी की तरफ एक तीखी नजर डाली। दोनों बहुओं के चेहरे के भाव ऐसे बदले मानो सास ने कोई अनहोनी मांग रख दी हो।
अलका ने माथे पर पसीना पोंछने का बहाना करते हुए तंज कसा, “हद है मानसी! यहां बाबूजी चार महीने से खाट से नहीं उठे हैं, घर में डॉक्टर और दवाइयों का मीटर चौबीसों घंटे चालू है, और अम्मा जी को तीज के सिंगार की पड़ी है। अरे, अब इस उम्र में कौन सा सुहाग का मेला लूटना है? भगवान का नाम लें और बाबूजी की सेवा करें, पर नहीं… शौक तो देखो, अभी भी जवान बहुओं से कम नहीं हैं।”
छोटी बहू मानसी, जो हमेशा से ही पाई-पाई का हिसाब रखने में माहिर थी, तुरंत तपाक से बोली, “वही तो दीदी! इस महीने मेरे बच्चों की स्कूल की फीस गई है, ऊपर से त्योहार का इतना खर्च सिर पर है। राशन का बिल ही इतना लंबा चौड़ा हो जाता है कि सांस लेने की फुर्सत नहीं। अम्मा जी को तो लगता है कि घर में पैसों का पेड़ लगा है। अब बिस्तर पर पड़े इंसान के लिए हरे रंग की साड़ी पहनने से कौन सा वो दौड़ने लगेंगे?”
बहुओं के ये कड़वे बोल शारदा देवी के सीने में तीर की तरह चुभ गए। उनकी आंखों के कोरों पर नमी तैर गई, जिसे उन्होंने तुरंत अपनी झुर्रीदार हथेलियों से पोंछ लिया। वह जानती थीं कि केशव जी बीमार हैं, लेकिन जब तक पति की सांसें चल रही हैं, एक पत्नी के लिए उसके सुहाग की निशानी से बढ़कर क्या हो सकता है? पैंतालीस साल का साथ था उनका। जवानी के संघर्षों से लेकर बुढ़ापे की लाचारी तक, केशव जी ने कभी शारदा की आंखों में आंसू नहीं आने दिए थे। आज जब वह बोल नहीं सकते थे, तो शारदा का मन और भी ज्यादा उनके प्रति ममता और प्रेम से भर उठा था। उन्हें लगता था कि उनका सिंदूर और तीज का यह हरा रंग ही केशव जी की सांसों की डोर को बांधे हुए है।
अपमान के घूंट को पीते हुए शारदा देवी ने अपने पल्लू के कोने में बंधी एक छोटी सी गांठ खोली। उसमें से सौ-सौ के चार मुड़े-तुड़े नोट निकाले, जो उन्होंने अपनी और केशव जी की वृद्धावस्था पेंशन में से दवाइयों के बाद किसी तरह बचाए थे।
उन्होंने कांपते हाथों से वे चार सौ रुपये रसोई के स्लैब पर आटे के डिब्बे के पास रख दिए। “बहू, तुम लोग अपने बजट की चिंता मत करो। ये चार सौ रुपये मेरे पास रखे थे… इसमें कोई सस्ती सी सूती साड़ी ही ले आना। बस रंग हरा हो…” इतना कहकर वह बिना रुके अपने कमरे की तरफ लौट गईं, क्योंकि एक पल और वहां रुकना उनके स्वाभिमान को तार-तार कर देता।
उनके जाते ही अलका ने स्लैब पर रखे उन नोटों को ऐसे उठाया जैसे कोई अछूत चीज हो। “देखा मानसी? अम्मा जी का नाटक! जब दो दिन पहले विकास जी ने बाबूजी के इंजेक्शन के लिए पैसे मांगे थे, तब तो हाथ झाड़ दिए थे कि पेंशन खत्म हो गई। और आज अपनी साड़ी के लिए झट से पल्लू से पैसे निकल आए! वाह री ममता!”
मानसी ने मुंह बिचकाते हुए कहा, “दीदी, बुढ़ापे में इंसान बड़ा स्वार्थी हो जाता है। इन्हें तो बस अपनी पड़ी है। आप रख लो ये पैसे, घर के किसी काम में आ जाएंगे। कौन सा इन्हें कहीं बाहर जाना है, पुरानी साड़ी पहन लेंगी तो कोई देखने थोड़ी आ रहा है।” अलका ने सहमति में सिर हिलाया और वे पैसे अपने आंचल में खोंस लिए।
कमरे में लौटकर शारदा देवी केशव जी के पास बैठ गईं। केशव जी ने अपनी कमजोर उंगलियों से शारदा का हाथ छूने की कोशिश की। उनके गले से एक अस्पष्ट सी आवाज निकली। रसोई की आवाजें उनके कमरे तक साफ पहुंच रही थीं। एक बेबस पति की आंखों से दो गर्म आंसू लुढ़के और तकिए में जज्ब हो गए। शारदा देवी ने तुरंत अपने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाई और पति के माथे पर हाथ फेरते हुए बोलीं, “अरे, आप क्यों चिंता करते हो जी? अलका कह रही थी कि इस बार बहुत बढ़िया साड़ी लाएगी मेरे लिए। आप बस जल्दी से ठीक हो जाओ।” केशव जी ने आंखें मूंद लीं, वह अपनी पत्नी के इस पवित्र झूठ की पीड़ा को भली-भांति समझ रहे थे।
तीज से एक दिन पहले दोनों बहुएं बाजार गईं। शाम को जब वे लौटीं, तो उनके हाथों में रंग-बिरंगे शॉपिंग बैग थे। दोनों ने अपनी-अपनी महंगी जरी की साड़ियां, मैचिंग चूड़ियां और बच्चों के कपड़े बैठक में फैला दिए। शारदा देवी अपने कमरे के दरवाजे की ओट से टकटकी लगाए देख रही थीं कि शायद किसी थैले से उनकी भी सादगी भरी हरी साड़ी निकलेगी।
लेकिन सारा सामान सिमट गया, बहुएं अपने-अपने कमरों में चली गईं, और शारदा देवी को किसी ने आवाज तक नहीं दी। उनकी उम्मीद की डोर टूट चुकी थी। रात को जब पूरा घर सो गया, तो शारदा देवी ने चुपचाप अपनी वही पुरानी, फटी हुई हरी साड़ी निकाली। पीले बल्ब की मद्धिम रोशनी में वह सुई-धागा लेकर बैठ गईं। मोतियाबिंद की वजह से धुंधली पड़ चुकी आंखों से सुई के छेद में धागा पिरोना किसी कठिन तपस्या जैसा लग रहा था। बार-बार हाथ कांपते, धागा मुड़ जाता और आंखों से आंसू टपक कर साड़ी पर गिरने लगते।
तभी कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला। उनकी ग्यारह साल की पोती, पंखुड़ी, पानी की बोतल भरने उठी थी। दादी को आधी रात में यूं जमीन पर बैठकर रोते और सुई से जूझते देख वह पास चली आई।
“दादी, आप इतनी रात को क्या कर रही हो? और आप रो क्यों रही हो?” पंखुड़ी ने मासूमियत से पूछा।
शारदा देवी ने झट से आंसू पोंछे, “कुछ नहीं मेरी लाड़ो, वो कल तीज है ना, तो अपनी साड़ी ठीक कर रही थी। मेरी आंखें काम नहीं कर रहीं, जरा इस सुई में धागा तो डाल दे बिटिया।”
पंखुड़ी ने धागा तो डाल दिया, लेकिन उसकी नजर साड़ी के बड़े-बड़े छेदों पर पड़ गई। वह उस दोपहर रसोई के बाहर से गुजरते हुए अपनी मम्मी और चाची की बातें सुन चुकी थी। एक ग्यारह साल की बच्ची के कोमल मन को यह समझते देर नहीं लगी कि उसकी दादी के साथ कितना बड़ा अन्याय हुआ है। वह चुपचाप वहां से निकली और सीधे अपने पापा विकास के कमरे में गई।
विकास उस वक्त ऑफिस की किसी फाइल में उलझे हुए थे। पंखुड़ी ने उनका हाथ पकड़ा और बिना कुछ कहे उन्हें खींचकर दादी के कमरे की दहलीज तक ले आई। अधखुले दरवाजे से विकास ने जो दृश्य देखा, उसने उनके पैरों तले से जमीन खिसका दी।
उनकी बूढ़ी माँ, जिन्होंने कभी विकास के फटे जूतों को सिलवाकर खुद नंगे पांव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ी थीं, जिन्होंने अपने गहने गिरवी रखकर दोनों बेटों को पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया, आज वही माँ अपनी एक फटी हुई साड़ी को कच्चे टांकों से जोड़ रही थीं। बगल में लेटे बाबूजी की बेबस आंखें छत को घूर रही थीं और उनके गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें चमक रही थीं।
विकास के सीने में जैसे कोई हथौड़ा सा लगा। पंखुड़ी ने धीमे से पापा के कान में फुसफुसाकर रसोई वाली सारी बात बता दी और यह भी बताया कि कैसे दादी ने अपने चार सौ रुपये मम्मी को दिए थे, लेकिन मम्मी साड़ी नहीं लाईं।
विकास की आंखें शर्म और ग्लानि से झुक गईं। उन्होंने तुरंत अपने छोटे भाई अनुज को जगाया और उसे भी वह दृश्य दिखाया। दोनों भाइयों की आंखों में आंसू थे। वे पैसे कमाने की दौड़ में इतने अंधे हो गए थे कि उन्होंने यह देखना ही छोड़ दिया था कि जिस छत के नीचे वे चैन की नींद सोते हैं, उस छत के स्तंभ किस कदर अकेलेपन और अपमान की दीमक से खोखले हो रहे हैं।
अगली सुबह तीज का त्योहार था। घर में पकवानों की खुशबू फैल रही थी। अलका और मानसी अपनी नई-नवेली जरीदार साड़ियों में सज-धज कर आंगन में रंगोली बना रही थीं। शारदा देवी ने नहा-धोकर वही रफू की हुई, बदरंग हरी साड़ी पहनी और सिर पर पल्लू ढककर केशव जी के पास बैठ गईं। उन्होंने पति के चरण छुए और उनके माथे पर तिलक लगाया।
तभी विकास और अनुज कमरे में दाखिल हुए। उनके पीछे अलका, मानसी और नन्ही पंखुड़ी भी थीं। विकास के हाथ में एक बेहद खूबसूरत थाल था, जिस पर मखमली हरे रंग की, सुनहरे बॉर्डर वाली एक बेहद मुलायम चंदेरी साड़ी, हरी कांच की चूड़ियां और सुहाग का सारा सामान सजा हुआ था।
इससे पहले कि शारदा देवी कुछ समझ पातीं, विकास और अनुज दोनों ने अपनी माँ के कदमों में घुटने टेक दिए और अपना सिर उनकी गोद में रखकर फूट-फूट कर रो पड़े।
“हमें माफ कर दो अम्मा… हमें माफ कर दो बाबूजी!” विकास की आवाज भर्रा गई थी। “हम इतने नालायक बेटे निकले कि अपनी गृहस्थी में उलझकर आपकी छोटी-छोटी खुशियों का ही गला घोंट बैठे। जिस माँ ने हमारी हर जिद को अपना धर्म समझा, आज उसी माँ को अपने ही घर में चार सौ रुपये की साड़ी के लिए हाथ फैलाना पड़ा और फिर भी निराशा मिली।”
अनुज ने अपने जेब से वे चार सौ रुपये निकाले जो उसने सुबह अलका से मांगे थे, और उसमें अपनी तरफ से पांच हजार रुपये मिलाकर अम्मा के हाथों में रखते हुए कहा, “अम्मा, ये पैसे आपकी पेंशन के नहीं, आपके स्वाभिमान के हैं। और आज से इस घर का नियम बदलेगा। हर महीने हमारी तनख्वाह आते ही सबसे पहले आपके और बाबूजी के नाम की राशि अलग रखी जाएगी, जिसका हिसाब मांगने का हक इस घर में किसी को नहीं होगा।”
विकास ने सख्त और गंभीर नजरों से अलका और मानसी की तरफ देखा। “तुम दोनों आज तीज का व्रत रख रही हो ना हमारे लिए? लेकिन याद रखना, जिस घर में सास-ससुर के आंसू गिरते हों, वहां की किसी भी पूजा को भगवान स्वीकार नहीं करते। कल को हम भी बूढ़े होंगे, हम भी बिस्तर पर पड़ेंगे… आज जो बीज तुम दोनों ने बोया है, कल पंखुड़ी और हमारे बच्चे हमें वही फल देंगे। क्या तब तुम सह पाओगी?”
पतियों के ये शब्द और रात की अपनी करनी का सच सामने आते ही अलका और मानसी का सिर शर्म से झुक गया। उनके अंतर्मन को जैसे किसी ने झकझोर कर जगा दिया था। अपनी नई साड़ियों की चमक उन्हें अचानक फीकी लगने लगी। दोनों की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले।
अलका आगे बढ़ी और उसने शारदा देवी के पैर पकड़ लिए, “अम्मा जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं गृहस्थी के खर्चों के हिसाब में इतनी अंधी हो गई थी कि आपके प्रेम और भावनाओं का मोल ही भूल गई। मैंने बहुत बड़ा पाप किया है।” मानसी ने भी रोते हुए सास के हाथ चूम लिए और अपनी गलती की क्षमा मांगी।
ममता तो आखिर ममता होती है। बच्चों के दो आंसुओं ने शारदा देवी के महीनों के घाव धो दिए। उन्होंने दोनों बहुओं को गले से लगा लिया। अलका और मानसी ने मिलकर अम्मा को वह नई हरी साड़ी पहनाई, उनके हाथों में हरी चूड़ियां सजाईं और उनकी मांग में सिंदूर भरा।
जब शारदा देवी वह नई हरी साड़ी पहनकर केशव जी के सामने आईं, तो चार महीने से पत्थर बनी केशव जी की आंखों में एक अद्भुत चमक दौड़ गई। उनके कांपते होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान खिल उठी और उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ उठाकर अपने बेटों और बहुओं को आशीर्वाद दिया। आज उस हवेली में सचमुच तीज का त्योहार मनाया जा रहा था, जहां सिर्फ रस्मों की नहीं, बल्कि दिलों की हरियाली लौट आई थी।
दोस्तों, हमारे माता-पिता कभी हमसे ताजमहल नहीं मांगते, उन्हें तो बस हमारे वक्त का एक छोटा सा हिस्सा, थोड़ा सा सम्मान और उनके जज्बातों की कद्र चाहिए होती है। क्या आपके घर में भी बुजुर्गों की छोटी-छोटी ख्वाहिशों का ऐसे ही ख्याल रखा जाता है? इस कहानी के किस हिस्से ने आपकी आंखों को नम किया और आज के बेटों-बहुओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगे? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके एक विचार से किसी का टूटा हुआ परिवार फिर से जुड़ सकता है।
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लेखिका : आरती देवी